गुरुवार, 19 मार्च 2015

फर्जी अंकतालिका:सरपंच की पहली गिरफ्तारी:जगदीश गिरफ्तार:


भैरूंपुरा उर्फ सीलवानी का सरपंच:पंचायत समिति सूरतगढ़:
मोहाली से लाया था दसवीं की अंक तालिका:सूरतगढ़ सदर थाना पुलिस ने गिरफ्तार किया:
सूरतगढ़, 16 मार्च 2015.
पंचायत समिति सूरतगढ़ की ग्राम पंचायत भैरूंपुरा उर्फ सीलवानी के नव निर्वाचित सरपंच जगदीश प्रसाद पुत्र नानुराम जाति नायक को सदर थाना पुलिस ने दसवीं उत्तीर्ण की फर्जी अंक तालिका से चुनाव लडऩे के आरोप में गिरफ्तार किया है। भैरूंपुरा उर्फ सीलवानी ग्राम पंचायत के सरपंच पद का चुनाव  18 जनवरी 2015 को हुआ जिसमें जगदीश विजयी हुआ। उसने निकटतम प्रत्याशी श्रवणकुमार कानाराम मेघवाल को 492 वोटों से हराया था।
इसके बाद श्रवणकुमार ने अदालत एसीजेएम सूरतगढ़ की अदालत में इस्तगासा प्रस्तुत किया जिसमें आरोप लगाया कि जगदीश ने फर्जी अंक तालिका पेश कर चुनाव लड़ा है। उसने कई तथ्य पेश किए। अदालत के आदेश पर सदर थाना पुलिस ने मुकद्दमा दर्ज कर जांच शुरू की तथा जगदीश को गिरफ्तार किया।
अदालत में श्रवणकुमार की ओर से जगदीश पर फर्जी अंक तालिका का आरोप लगाते हुए कई सबूत प्रस्तुत किए थे।
जगदीश ने अपनी दसवीं उत्तीर्ण की शैक्षणिक योग्यता के लिए काऊंसिल ऑफ सैकेंडरी एज्यूकेशन मोहाली द्वारा 2009-10 की जारी अंक तालिका पेश की थी। जगदीश ने स्वयंपाठी और स्वयं को जिला पटियाला का निवासी बतलाया था।
नामंाकन पत्रों की जांच के समय श्रवणकुमार ने जगदीश की अंक तालिका पर आपत्ति प्रगट की लेकिन निर्वाचन अधिकारी ने आपत्ति पर विचार नहीं किया। इस पर जगदीश का नामांकन पत्र स्वीकार कर लिया गया।
18 जनवरी 2015 को चुनाव हुआ जिसमें जगदीश को निर्वाचित घोषित कर दिया गया। आरोप लगाया गया कि पंजाब का सैकेंडरी परीक्षा का बोर्ड रोपड़  में है लेकिन अंक तालिका में इसका कोई उल्लेख नहीं है।
जगदीश राजस्थान का मूल निवासी है तथा बीस वर्षों से अमरपुरा जाटान गांव में निवास कर रहा है। उसने राजकीय माध्यमिक विद्यालय भगवानसर  तहसील सूरतगढ़ से 26-4-1997 में कक्षा 4 उत्तीर्ण की थी तथा कक्षा 5 की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी। जगदीश ने दिनांक 3-10-2013 को इसी विद्यालय से उक्त परीक्षा की टीसी प्राप्त की थी।
फर्जी अंक तालिका से चुनाव लडऩे के आरोप में इस इलाके में राजस्थान में संभवत: यह पहली गिरफ्तारी है।

भैरूंपुरा के सरपंच जगदीश की जमानत अस्वीकार:
अदालत ने जेल भिजवाया:
सूरतगढ़, 19 मार्च। सदर थाना पुलिस ने फर्जी अंक तालिका आदि के आरोप में गिरफ्तार किया था।
अदालत में पुलिस ने रिमांड पूरा होने के बाद पेश किया। अदालत में जमानत की अर्जी दी गई लेकिन अदालत ने अस्वीकार कर दी।
अदालत ने  18 मार्च को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भिजवा दिया।
 

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बुधवार, 18 मार्च 2015

अच्छे फंसे .जुगाड़ के सर्टिफिकेट से सरपंच


गांव की सरपंची का मजा ही अनोखा होता है और सरपंच कहलाना तथा सरपंची का ताज पहनना हर कोई चाहता है मगर हरेक की किस्मत में यह ताज पहनना लिखा नहीं होता।
 पंजाबी फिल्मों के सरपंचों की तो टोर ही गजब की होती। सालों पहले देखा करते थे। कम राजस्थान के सरपंच भी नहीं होते। राजस्थान में भी सरपंची की गजब की टोर हो गई। हरेक सरपंच बनने को उत्साहित था। यहां तक की पहले विधायक रह गए लोग भी अपने यार दोस्तों से चर्चा करते रहे कि सरपंच का चुनाव लड़ लेने में क्या बुराई है?
राजस्थान सरकार ने सन् 2015 के सरपंच चुनाव में पंगा डाल दिया।
सरकार ने अधिसूचना जारी करवा दी कि सरपंच कमसे कम आठवीं तक पढ़ा लिखा जरूर होना चाहिए।
अचानक हुई इस घोषणा ने अनेक लोगों की नींद हराम करदी।
अब अचानक आठवीं उत्तीर्ण कहां से हो जाएं?
पढ़ाई किसी ने चार के बाद छोड़ दी थी तो कोई पांच के बाद स्कूल नहीं गया।
कई सालों से सरपंची का दावा कर रहे थे लेकिन राजस्थान सरकार ने सब पर पानी फेर दिया।
सारी उम्मीदें मिट्टी में भी मिला दी। अचानक क्या किया जाए?
अपने हिन्दुस्तान में एक खास बात है।
अपने यहां पर बीमार की दवा बताने वाले सैंकड़ों डाक्टर वैद्य हकीम एक मिनट में पैदा हो जाते हैं।
बस आठवीं तक की परीक्षा उत्तीर्ण का सर्टीफिकेट चाहिए।
सोचा जाने लगा।
मित्र दोस्तों ने दिन रात एक किया और भाग दौड़ कर स्थानीय स्कूल वालों से अतापता किया कि कोई जुगाड़ बैठ जाए।
अपने यहां जुगाड़ तो हर बात का हर सामान का हो जाता है सो आठवी उत्तीर्ण का एक सर्टिफिकेट कबाडऩा कोई मुश्किल कैसे होता?
दोस्तों ने एक ही राय दी कि पैसा तैयार रहे।
धोती की गांठ में हजारों की गड्डीे हो।
राजस्थान से बाहर के इलाके तलाशे गए।
अपने तो सात समंदर पार खोज लें और पाताल में खोज लें।
पंजाब,हरियाणा,उत्तर प्रदेश, बिहार प्रदेशों में एक ही नहीं कई स्कूल वाले और उनके बिचौलिए तैयार।
काम बन गया।
मजा आ गया। जुगाड़ से सरपंची का चुनाव लड़ा और जीत भी गए।
हार जाने वालों का और विरोध करने वालों का दिमाग तो सदा से ही घमसाण मचाने में रहा हे।
सो अपनी सरपंची का ताज उनको नहीं सुहाया।
अदालतों में इस्तगासे दायर कर पुलिस में मुकद्दमें करवा दिए।
बस। एक बात का डर हो गया।
अपन खुद सरपंच होते हुए जेल चले भी जाते तो कोई बात नहीं थी।
इस बार सीट ओरत के नाम थी सो यार दोस्तों के दबाव देने से और अपने दिल में भी हिलोरें उठने से अपन ने पत्नी जी को चुनाव लड़ा दिया।
पत्नी जी जुगाड़ के सर्टिफिकेट से सरपंच बन गई।
अब जुगाड़ यार दोस्तों का दबाव। कौन पूछता है? सारी बातें हवा हो गई।
दोस्तों अपने ही पैसों से जेल का प्रबंध कर लिया।

जिन लोगों ने जुगाड़ का सटिफिकेट लाकर दिया वे किनारा कर गए।
वे लोग यार दोस्त परिचित इस तरह के जुगाड़ में जुट गए ताकि पुलिस उन तक न पहुंचे।
सभी चाहते हैं कि पुलिस सरपंच जी तक ही रहे।
ऐसा हो भी रहा है। पुलिस नहीं पूछ रही कि सरपंच बना व्यक्ति अपने जीवन में गांव के आसपास से दूर नहीं गया तो वह दूसरे प्रदेशों से कैसे ले आया आठवीं का सर्टिफिकेट?
बिचौलियों ने अच्छे खासे पैसे बटोरे और अब सरपंच जी अकेले फंसे हैं और जमानत तक नहीं हो रही।
बिचौलियों ने जरूर इतना जुगाड़ कर लिया है कि पुलिस कोई ऐसा बयान ही जांच में रिकार्ड न करे जिसमें किसी बिचौलिए द्वारा सर्टिफिकेट लाकर देने,सहयोग देने आदि का उल्लेख हो।
सरपंची तो यार दोस्त रिश्तेदार सांझा घोटते लेकिन अब जेल जाने में सरपंचजी के साथ कोई साझेदार नहीं।
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रविवार, 15 मार्च 2015

पालिका बोर्ड अध्यक्षों की धौंस-90 दिनों में संचालन समितियों का गठन नहीं किया:

नगरपालिकाओं में संचालन समितियां गठित करने की पावर राज्य सरकार के पास:
पालिका बोर्ड अध्यक्षों की धौंस-चुनाव के 90 दिनों में संचालन समितियों का गठन नहीं किया:
विशेष रिपोर्ट - करणीदानसिंह राजपूत -

राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 2009 में धारा 55 में स्पष्ट निर्देश है कि संचालन समितियां बोर्ड के गठन के 90 दिनों के भीतर गठित कर दी जानी चाहिए। ऐसा नहीं होने पर राज्य सरकार इन समितियों का गठन करने को सक्षम है।
राजस्थान की 46 नगरपालिकाओं में 22 नवम्बर 2014 को चुनाव हुए और 25 को परिणाम घोषित हुए। इसके अगले दिन अध्यक्षों व उसके अगले दिन उपाध्यक्षों के चुनाव हुए। इसके बाद 90 दिनों में यानि कि 25 फरवरी 2015 तक 90 दिनों में प्रत्येक नगरपालिका बोर्ड में कार्य संचालन समितियों का गठन कर दिया जाना चाहिए था। लेकिन अधिनियम में स्पष्ट निर्देश होते हुए भी समितियों का गठन नहीं किया गया तथा जहां पर मांग हुई वहां भी अध्यक्ष की धींगामस्ती के निजी पावर चलाए जाने के कारण मांग को ठुकरा दिया गया।
नियम की अवहेलना इतनी हुई कि जिला कलक्टर ने अधिशाषी अधिकारी को निर्देश दिया तब भी पालना नहीं की गई।
ऐसी सूरत में नगरपालिकाओं में कार्य संचालन समितियां गठित कराने का कानून के साथ प्रथम दायित्व सरकार का बन जाता है तथा सरकार को इसके बाद कोई देरी नहीं करनी चाहिए।
सच्चाई यह है कि नगरपालिकाओं में अध्यक्ष व अधिशाषी अधिकारी दोनों ही तथा वहां के चुने हुए जन प्रतिनिधि तक इन संचालन समितियों के गठन को उत्सुक नहीं होते। काय्र संचालन समितियों के गठन के बाद अध्यक्ष व अधिशाषी अधिकारी अपनी मनमानियां नहीं कर पाते। नगरपालिकाओं में इन समितियों के नहीं होने पर खुल कर भ्रष्टाचार होने की व करने की संभावना रहती है। सालों का अनुभव यही बतलाता है कि करोड़ों रूपयों का भ्रष्टाचार होता है। नगरपालिकाओं में भ्रष्टाचार न हो सके व कार्य तेजी से भी हो सके इसलिए इन समितियों के गठन का कानून बनाया हुआ है।
नगरपालिका अधिनियम 2009 की धारा 55 के अनुसार निम्र समितियां बनाई जानी चाहिए।

कार्यपालक समिति-
इसमें निम्र शामिल होंगे।
1.नगरपालिका का अध्यक्ष,
2. नगरपालिका का उपाध्यक्ष,
3.विपक्ष का नेता,
4.नगरपालिका बोर्ड के निर्वाचित सदस्य जिनकी संख्या 5 से अधिक ना हो।
5.नगर परिषद व नगर निगम के मामले में चुनी हुई 2 महिला सदस्यों सहित संख्या 7 हो।
इसके अलावा नगरपालिका में निम्र समितियों का गठन भी होगा।
1.वित्त समिति
2.स्वास्थ्य एवं स्वच्छता समिति
3.भवन अनुज्ञा एवं संकर्म समिति
4.गंदी बस्ती सुधार समिति
5.नियम और उप नियम समिति
6. अपराधों का शमन और समझौता समिति
इनके अलावा भी समितियों का गठन किया जा सकता है।
इन समितियों की अलग से बैठक होने व निर्णय लेने का नियम है जो बोर्ड को सामान्य रूप से बोर्ड के हित में मानना ही पड़ता है।
वित्त,भवन,कच्ची बस्ती सुधर आदि समितियां काफी पावर फुल होती है और इसलिए अध्यक्ष वा अधिशाषी अधिकारी समितियों गठन को टालते रहते हैं।
इसलिए अधिनियम में स्पष्ट उल्लेख है कि बोर्ड द्वारा 90 दिनों में गठन नहीं किए जाने पर राज्य सरकार समितियों का गठन कर सकती है।
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शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

अपना बजट:अपनी सरकार:अपना सिर और अपनी दीवार:


टिप्पणी-करणीदानसिंह राजपूत
अपनी यानि की भारतीय जनता पार्टी यानि अपनी जनता की सरकार और अपना बजट पेश हुआ। अब अपना सिर है और अपनी ही दीवार है, जितनी देर तक भिड़ा सकते हैं भिड़ाएं और फोड़ कर लहुलुहान करना चाहते हैं तो वह भी करलें। अपनी सरकार के लिए अब यही करना बाकी रहा है। इसे मोदी सरकार का बजट कहें चाहे अपनी सरकार का बजट कहें। अपनी सरकार की यह तो खूबी माननी ही चाहिए कि उसने हमारा सिर नहीं फोड़ा। अपराध का आरोप भी उस पर नहीं लगाया जा सकता। सरकार ने यह हालात कर दिए कि अपना सिर खुद ही फोड़ें चाहे आज फोड़ लें चाहे दो दिन बाद या उसके बाद फोड़ लें।
सरकार ने कह दिया कि मध्यम वर्ग अपना प्रबंध स्वयं ही करले। यही बात मैं लिख रहा हूं कि अपना सिर अपनी ही दीवार से फोड़ लें।
टीवी चैनलों पर अनुमान किए जा रहे थे कि आयकर का स्लैब बदल कर बढ़ाया जा सकता है। यही बात अखबारों के माध्यम से भी उठ रही थी। आशा की जा रही थी कि जनता को प्रभावित करने के लिए स्लैब में परिवर्तन करके टैक्स लगाए जाने की सीमा बढ़ाई जा सकती है। अपनी सरकार ने यह स्लैब परिवर्तन नहीं किया।
सरकार को मालूम है कि हम रोते रहेंगे और दो चार दिन बाद चुप्प हो जाऐंगे। सरकार को यह भी मालूम है कि देश की आजादी के बाद से अब तक हम पर भार लादा जाता रहा और हमने कभी विरोध नहीं किया। सरकार को मालूम है कि इन पांच सालों में जो अवधि बची है उसमें ीाी हमारी सोच में ताकत में कोई परिवर्तन आने वाला नहीं है। सो सरकार ने पूरी सोच समझ से कर भार वहीं रख दिया। सरकार को मालूम है कि जो वेतन बढ़े हैं और आगे अभी बढऩे वाले हैं,उसका प्रबंध पहले से ही कर लिया है।
सरकार ने कर्मचारियों का ध्यान रखा है कि वेतन आयोग की रिपोर्ट आने वाली है और कर्मचारियों को बढ़ा वेतन देना होगा।
लेकिन इस देश में संगठित नहीं है तो वह है आम जनता। उसमें मध्यम वर्ग शामिल है। इसमें आम जनता जिसमें दिहाड़ी मजदूर,खेत मजदूर,होटल ढाबों में काम करने वाले या अन्य मजदूर हैं। ये यानि कि अपन ना संगठित हैं ना आनी कोई सोच है कि कोई मांग कर सकें। ललकार देना चुनौति देना तो अलग बात है।
हां वोट देने के लिए अपन संगठित हो जाते हैं जैसे अपनी मोदी सरकार के लिए संगठित हुए।
अपन ने पहली बार इतना तो सोचा ही था कि अपना चाय वाला भायला पीएम बना है तो अपना ध्यान जरूर जरूर रखेगा। सच में ध्यान रखा या नहीं रखा। अपन हिसाब से तो जरा भी ध्यान नहीं रखा।
हां एक बात का ध्यान तो रखा कि मनरेगा को बंद नहीं करेंगे उसे चालू रखेंगे तथा उसके लिए धन का प्रबंध भी करेंगे। मोदी जी ने भाषण में कहा कि उसे कांग्रेस की विफलता के रूप में ढ़ोल पीटते हुए चालू रखेंगे। वाह अपने चाय वाले भायले की सोच का जवाब नहीं। गरीबों को आजीविका चलाने के लिए चालू कार्यक्रम को वह इसलिए चालू रखेंगे ताकि कांग्रेस की विफलताओं के रूप में उसे जाना जाता रहे।
मोदी जो कहें। अपनी सोच तो यह है कि महात्मा गांधी का नाम ले लेकर मोदी सरकार भी चलेगी सो महात्मा गांधी के नाम से जुड़ी मनरेगा योजना किसी भी हालत में बंद नहीं होगी।
अपनी सरकार बोली है कि बजट में महिलाओं की सुरक्षा व संबल के लिए बहुत कुछ किया जाएगा। वह अपन सभी आगे देखते रहेंगे।
अपनी सरकार के अपने बजट पर आशाएं लगाए थे। यह ध्यान में रखना चाहिए था कि रेल बजट जिस प्रकार का पेश हुआ उसी की तर्ज पर यह बजट भी आएगा और पक्का आएगा।
खैर। अब अपना सिर है और अपनी दीवार है।


शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

पीएम को पत्र:आपका दौरा जनता की कमर तोडऩे वाला-पूर्व विधायक सिद्धु:


भाजपा की वसुंधरा सरकार में भ्रष्टाचार बेलगाम-आप धृतराष्ट्र:
करोड़ों रूपए आनन फानन में खर्च आपकी खुशफहमी वास्ते:
स्पेशल रिपोर्ट: करणीदानसिंह राजपूत
सूरतगढ़,
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 19 फरवरी के सूरतगढ़ दौरे पर आनन फानन में करोड़ों रूपए खर्च किए जाने पर पूर्व विधायक स.हरचंदसिंह सिद्धु ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है जिसमें उनके दौरे को जनता की कमर तोडऩे वाला बताया है। सिद्धु ने लिखा है कि आपने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए घोषणा की थी कि न खाऊंगा और न किसी को खाने दूंगा,मगर राजस्थान की भाजपा सरकार में भ्रष्टाचार बेलगाम हो रहा है। मोदी को लिखा है कि आप धृतराष्ट्र की तरह महसूस कर रहे हैं। आपकी आँखें धोखा खा रही हैं। पत्र में आशा की गई है कि सत्ता में मदांध न होकर विचार करें,अगर ईमानदार हैं तो इसे रूकवाएं।



गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

सर्वत्र उठा रहा सवाल-क्या दे गए मोदी? क्या दे गई वसुंधरा?

 

मोदी बाबा का ठुल्लू:सूरतगढ़ सभा 1 आदमी 25 हजार का पड़ा होगा:

सरकारी खजाने पर 50 करोड़ से अधिक का खर्च पर दिल्ली  राजनैतिक मृत्यु  का बारहवां किया।

टिप्पणी- करणीदानसिंह राजपूत


दिल्ली में 7 फरवरी को चुनाव मतदान के ठीक 12 वें दिन सूरतगढ़ में मोदी जी की सभा और उसमें वसुंधरा राजे के उदगार। मोदी के नाम पर हमने विधानसभा,लोकसभा,स्थानीय निकाय और पंचायतों के चुनाव जीते। दिल्ली में हुई राजनैतिक मृत्यु के बारहवें को मानो इन शब्दों के साथ भुलाया जा रहा हो। जनता का धन खुले रूप में बरबाद करने या दुरूपयोग करने का इससे बड़ा कोई उदाहरण नहीं हो सकता।

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

पीएम मोदी सूरतगढ़ सभा:सुरक्षा का जबरदस्त प्रबंध पहली बार:


सूरतगढ़ में रोडवेज बसें व भारी वाहनों को 40-50 किमी दूर से ही दूसरे रास्तों से जाना होगा।
सभा के लिए आने वाली बसों व छोटे वाहनों को ही सूरतगढ़ में प्रवेश की सुविधा:
प्रधानमंत्री का भाषण सुनने को कोई रोडवेज बस से पहुंचना चाहेगा तो वह नहीं पहुंच सकेगा।
स्पेशल रिपोर्ट- करणीदानसिंह राजपूत
सूरतगढ़, 18 फरवरी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सूरतगढ़ सभा के लिए सुरक्षा के लिए जो प्रबंध किए गए हैं। वह पहली बार इतने व्यापक रूप में देखे गए हैं। इतपे व्यापक प्रबंध पूर्व में आए प्रधानमंत्रियों की सभाओं में नहीं देखे गए कि सूरतगढ़ में प्रवेश ही न किया जा सके। सूरतगढ़ से होकर निकलने वाले वहनों को दूर से ही दूसरे रास्तों से आगे निकलना होगा। राष्ट्रीय उच्च मार्ग तक प्रभावित रहेगा। पीएम और आने वालों की सुरक्षा के लिए अन्य हजारों लोग प्रभावित होंगे।
यह सभा श्रीगंगानगर या शहर से बाहर कहीं की जाती तो इतने रास्ते बदलने मोडऩे की व्यवस्था नहीं करनी पड़ती और लोग प्रभावित नहीं होते।
यह व्यवस्था 19 फरवरी को सुबह 7 बजे से ही लागू हो जाएगी। दिल्ली,जोधपुर,जयपुर से प्राइ्रवेट बसों से आने वाले यात्रियों को भी सूरतगढ़ में प्रवेश किस प्रकार होगा? लोग रेल से सूरतगढ़ तक आ सकते हैं।
यहां पर श्रीगंगानगर जिला पुलिस अधीक्षक की सूचना हम दे रहे हें ताकि लोग इसके अनुरूप अपना आना कर सकें।



सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

हारे योद्धा के स्वागत की तैयारियों पर करोड़ों का खर्च:


 - करणीदानसिंह राजपूत -
महान देश का महान सम्राट अपनी विशाल सेना और युद्ध के अति आधुनिक संसाधनों तरीकों के होते हुए साधारण से सिपाही से युद्ध में पराजित हो गया। पराजय भी इतनी दुखदाई कि इतिहासकार विशेष उल्लेख करने से चूकेंगे नही। युद्ध से पहले बड़बोलेपन से की गई घोषणाएं धूल धूसरित हो गई।
युद्ध में मात खाकर लौटे सम्राट का स्वागत करने को चाहे जो बहाना किया जाए तरीका निकाला जाए।
गरीब देश की गरीब जनता पर यह बोझ कितना कैसे डाला जाएगाï? जनधन सम्राट के हाथ में उसके प्रांतीय हाकिमों के हाथ में चाहे जितना उड़ाए। यह शायद इस सोच से किया जा रहा हो कि अभी और युद्ध करने हैं और इस पराजय किसी तरह से लोगों के दिल दिमाग से मिटाया नहीं जाएगा तो दूसरे युद्धों में भी बुरी गत बन सकती है। 
दिल्ली पर राज करने का सपना मुगलों के काल से आज तक चल ही रहा है। देश में राज आ जाए और दिल्ली में राज ना आए तो सब कुछ बेकार। सारे सपने चकनाचूर। ये सारे सपने एक साधारण सैनिक ने चूर चूर कर डाले।
सैनिक कह रहा है कि वह दिल्ली में ही रहेगा। यह सच्च होगा लेकिन दूसरी जगह दूसरा सैनिक नहीं होगा यह कहां गारंटी है। दूसरे युद्ध में दूसरा सैनिक भी तो पटखनी दे सकता है।
बस।
यही सोच खाए जा रही है। अब सम्राट का राज जितने सूबों में है कम से कम उन सूबों में तो स्वागत किया जा सकता है।
इसी स्वागत नीति से बड़े बड़े ठेके दिए जा चुके हैं। कभी कोई ऑडिट होगी नहीं।
आम जनता की परवाह करने वाले आधुनिक तकनीकी अपनाने का दावा करने वाले बता रहे हैं कि सभा स्थल पर बड़े बड़े स्क्रीन भी लगेंगे। जब यह साधन है तो लाखों लोगों को यहां लाने की जरूरत ही नहीं लोग टीवी स्क्रीन पर देख लेंगे और अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री व मंत्री आदि स्क्रीनों पर आपसी बातचीत के साथ भाग ले लेंगे।
लेकिन ऐसा नहीं होगा।
सोचलें कि जिनका राज होता है वे चाहे जैसा कर सकते हैं। बात बजट उपलब्ध की सो रसोई गैस के एक सिलेंडर में ही 25 रूपए का भार जनता पर डाल ही दिया है। बस ऐसा ही होता रहेगा। ऐसे ही बजट बनता रहेगा और खर्च होता रहेगा। ऐसे ही स्वागत होते रहेंगे।
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बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

किसान मांगे पानी खाद:मोदी राजे देंगे कार्ड:


पानी मांगने पर दे गोली:यूरिया मांगने पर पुलिस के डंडे धक्के:




किसान खेतों में फसल पकाने को पानी और यूरिया खाद मांग रहा है। किसान की इन मांगों पर वर्षों से परवाह नहीं और उसकी मांग पर कोई तत्परता की कार्यवाही का न सोच कर दूर की कौड़ी लाई गई है तथा मृदा परीक्षण कार्ड बांटा जाएगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे 19 फरवरी 2015 को सूरतगढ़ में पूरे देश के लिए इसका शुभारंभ करेंगे। इस योजना के तहत प्रत्येक खेत की मिट्टी की जांच होगी और उसका रिकार्ड रहेगा। यह मिट्टी परीक्षण कराने के लिए प्रयोगशालाएं होंगी व मिट्टी परीक्षण करवाना अनिवार्य होगा। राजस्थान में सींचित कृषि जिले श्रीगंगानगर को इसके लिए चुना गया व इसके शुभारंभ के लिए सूरतगढ़ को चुना गया।
    श्रीगंगानगर जिले के किसान पिछले कई सालों से पूरा पानी दिए जाने की मांग को लेकर आंदोलन करते रहे हैं। किसानों को पर्याप्त पानी नहीं दिया जा रहा। किसान ने जब जब पूरे पानी की मांग को लेकर संघर्ष किया तब तब उसे पुलिस के धक्के मिले। भाजपा की पिछली वसुंधरा सरकार के कार्यकाल में तो सरकारी हठ इतना बढ गया था कि निहत्थे किसानों पर पुलिस की गोलियां बरसाई गई और घड़साना रावला पानी आंदोलन में 6 किसान मृत्यु की गोद में धकेल दिए गए। आज भी पानी की कमी है और किसान लगातार मांग पर मांग करने में लगा है।
    खाद के मुद्दे पर भी किसान परेशानियों में जूझ रहा है। यूरिया का संकट बताया जाता है लेकिन उसका उत्पादन कम है तो कालाबाजार में वह कैसे उपलब्ध हो जाती है? सरकार को इतना तो मालूुम होता ही है कि प्रतिवर्ष किन किन फसलों के लिए कब कब कितनी कितनी यूरिया चाहिए और किस प्रदेश को कितनी? लेकिन इसके लिए कोई प्रयास नहीं किए जाते। यूनिया के लिए ीाी किसान को पुलिस के धक्के और डंडे मिलते हैं। सवाल यह है कि पहले से ही यूरिया का उत्पादन और वितरण समय पर किए जाने का प्रबंध हो तो पुलिस की और कृषि विभाग की तथा राजस्व अधिकारियों की ड्यूटी लगाने की जरूरत ही नहीं होगी। पानी खाद के लिए प्रशासन व पुलिस की ड्यूटी लगाने से उनके असली कार्य भी बाधित होते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया को बदलने की परिवर्तन करने की कोशिश ही नहीं की जाती।
जब राज से बाहर होते हैं तब राजनैतिक पार्टियां किसानों के साथ शामिल होती हैं और जब सत्ता में होती हैं तो किसान उनको खारा लगने लगता है। किसानों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है मानो वे किसी गुलाम देश के नागरिक हों। इन शब्दों को समझने के लिए किसान के खेत में पहुंच कर ही सोचा जा सकता है। राजनैतिक मंच या सभा मंच पर भाषण देते वक्त या सुनते सुनाते वक्त यह समझ में नहीं आ सकता। यही देश है जहां अन्नदाता कहलाने वाला किसान राजनेताओं के झांसे और पुलिस की गोलियां खाता है।
किसान खेत के लिए पानी और खाद मांग रहा है सरकार उसे ये नहीं दे रही। किसान को मिट्टी की जाँच का कार्ड देगी। यह मिट्टी जांच का कार्य पहली बार शुरू नहीं किया जा रहा। देश में मिट्टी जांच का कार्य कई सालों से चल रहा है और खेतों में मोबाइल प्रयोगशालाएं तक पहुंचती रही हैं।
पानी खाद की मांग कर रहे किसानों में यह नया शगूफा छोड़ा जा रहा है। कुछ सोच कर ही छोड़ा जा रहा होगा। वैसे भी प्रयोगशाला से भी अधिक किसान स्वयं जानता है कि उसके खेत की मिट्टी किस प्रकार की है तथा उसमें कौनसी अधिक लाभ देने वाली फसल पैदा की जा सकती है।
इस कार्ड देने की योजना में सूरतगढ़ में आम सभा की जाने की तैयारियां हैं तथा उसमें 4 लाख लोग दूर दूर से लाए जाने का निर्देश भाजपा कार्यकर्ताओं को दिया गया है। अभी तो कोई चुनाव भी नहीं हैं कि प्रधानमंत्री की सभा के लिए करोड़ रूपये तक सभा व्यवस्था में सरकार के खर्च कर दिए जाऐं।
श्रीगंगानगर में पानी खाद की मांग करने वाले किसानों को अपनी ओर खींचने के लिए भाजपा ने भी किसान मोर्चा बनाया था। उस किसान मोर्चा को संचालित करने वाले मंत्री और विधायक बने हुए हैं। वे जानते हैं कि किसानों को पानी व खाद चाहिए। वे यह भी जानते हैं कि मिट्टी परीक्षण तो किसानों ने करवाया हुआ है।

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

दिल्ली ऐसे मार देती है:मफलर से गला घोट कर:चिल्ला भी नहीं सकी भाजपा कांग्रेस:


- करणीदानसिंह राजपूत-
दिल्ली ऐसे बुरी तरह से मार डालती है मफलर से गला घोट कर कि मरने वालों की चिल्लाहट भी सुनाई नहीं पड़े। मृत्युदंड वाले के लिए जिस तरह से उसके गले के लिए फांसी का फंदा तैयार किया जाता है। खास मजबूत रस्सा मंगवाया जाता है और उसमें गांठ लगा कर कस कर देख परख लिया जाता है। ताकि मृत्युदंड वाला किसी भी हालत में बच न सके। रस्से की खिंचाई के साथ ही तड़पता दम तोड़ दे।
दिल्ली में दनदनाने वाले भाजपा व कांग्रेस के गलों को एक साथ मफलर से कस दिया गया। राजनीति में पहले ऐसी सामूहिक मौत देखी सुनी नहीं। कांग्रेस पूरी साफ हो गई तथा भाजपा के मुंह दिखाने को 3 बचे। कम से कम ये तीन भाजपा नेताओं को समीक्षा के लिए बतला सकते हैं कि किस तरह से साथी मारे गए। एक प्रकार से चश्मदीद गवाह।
    दिल्ली वालों ने ऐसा फैसला क्यों कर ले लिया? अभी तो मोदी का सितारा बुलंदी पर चढ़ रहा था। अभी अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा मित्रता का हाथ मिला कर मोदी जी की चाय पीकर लौटे ही थे। उनके समाचार टिप्पणियां छप ही रही थी।
देश को अभी तो मोदी जी बहुत कुछ देने वाले थे।
सच्च आखिर है क्या?
भाजपा के नेताओं नरेन्द्र मोदी व अन्य तथा कांग्रेस नेताओं ने जिस भाषा का अपने भाषणों में इस्तेमाल किया वो दिल्ली वालों को गाली से कम नहीं लगी। भाषणों में शालीनता नहीं थी।
केजरीवाल को बंदर कहा गया। कलाबाजियां खाने वाला बताया गया।
केजरीवाल को झूठा कहा गया।
केजरीवाल को नौटंकी करने वाला कहा गया।
भाग जाने वाला बताया गया।
केजरीवाल दिल्ली के दिल में था और इस प्रकार के भाषणों से वह दिल्ली के दिल में और भीतर तक समाता चला गया।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लाखों रूपए के कोट के बजाय दिल्ली वालों ने केजरीवाल के मफलर को चुना।
गांधी का नाम लेना और उनकी जेसी दिनचर्या निभाते लंगोटी धारण करने में बहुत अंतर है। भाजपा ने केवल भाषणों में ही गांधी को बयान किया। देश का आम नागरिक भाूखा नंगा सोता है वहां प्रधानमंत्री लाखों का कोट पहने।
नरेन्द्र मोदी अगर रेहड़ी पर से 50 रूपए वाला कमीज खरीद कर पहनते तब भी वे प्रधानमंत्री ही कहलाते। कम कीमत वाली कमीज से उनका पद छोटा नहीं होता। वे और अधिक ऊंचाईयों पर पहुंचते। बीच रास्ते में इस प्रकार मामूली कहे जाने वाले हंसी उड़ाए जाने वाले मफलर से राजनैतिक मौत नहीं होती।
भाजपा और कांग्रेस दोनों ही समझ लें कि दिल्ली ने भ्रष्टाचार को अहम मुद्दा माना है और ईमानदारी की छवि वाली पार्टी को चुना है।
भाजपा और कांग्रेस स्थानीय स्तर पर भी सोच ले कि उनके लीडर केस तरह रहते हैं। उनमें कितनों ने लोगों के अधिकारों पर अतिक्रमण कर रखा है। कितने सरकारी भूमि पर सड़कों पर कोठियां महल बना कर मार्केट काम्पलेक्स बना कर भ्रष्आचार फैला रखा है। जहां आम आदमी को रहने को मकान नहीं और ये लीडर लोग गरीबों के मकान आए दिन तुड़वा देते हैं। अन्य सुविधाएं भी हड़पने वालों को हटाया नहीं गया तो दिल्ली सारे हिन्दुस्तान में गली गली में गांव गांव में बोलेगी।
स्थानीय स्तर पर भी भ्रष्टाचारियों के विरूद्ध मुंह खोलना और लिखित शिकायतें करना जल्दी होगा उतना ही अच्छा होगा।
दिल्ली से सबक लें।

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