गुरुवार, 28 मई 2026

सूरतगढ़ के पूर्व विधायक गुरूशरण छाबड़ा के स्मारक की दुर्दशा क्यो?

  




* करणीदानसिंह राजपूत *

सूरतगढ़ 28 मई 2026. यहां के पूर्व विधायक गुरूशरण छाबड़ा (सन् 1977) का स्मारक स्थल राजकीय उपजिला चिकित्सालय के मुख्य द्वार के आगे मुख्य सड़क पर है जिसमें उनकी आदमकद प्रतिमा लगी है जिसकी नियमित सार संभाल के अभाव में दुर्दशा हो रही है। स्मारक बगीची अब पूरी सूख चुकी है। पुष्प पौधै एक भी नहीं रह पाए और दूब के बजाय सूखी जमीन है। 

शहीद गुररूशरण छाबड़ा समिति की ओर से छाबड़ा की जयंती 9 जून और पुण्यतिथि 3 नवंबर मनाई जाती है तब यहां नजदीकी व परिवार के लोग एकत्रित होते हैं। एक दो घंटे के कार्यक्रम के अलावा कभी कोई पहुंचता हो,ऐसा नहीं लगता। पिछले तीन सालों से स्मारक की संभाल नहीं हुई। पहले छाबड़ा के एक साथी बलदेव राज तनेजा हर रोज सुबह से शाम तक बगीची में रहते हुए संभालते। तनेजा की सार संभाल के समय फूलों के पौधे और हरियाली दूब का आकर्षण था। पक्षियों के लिए पानी भी रखा जाता था। तनेजे से पिछले वर्ष  पूछने पर उन्होंने बताया था कि बगीची के गेट के ताले की चाबी दो साल पहले उनकी पुत्र वधु पूजा छाबड़ा को सौंप दी थी। 



पिछले 9 जून 2026 पर बहुत कम लोग स्मारक पर आए थे। उस समय स्मारक की अनदेखी लोगों के सामने आई थी। उस दिन भी लोगों ने सूखती बगीची देखी थी। इस बात का दुख भी कुछ लोगों ने प्रगट किया था कि स्मारक को नियमित रूप से रोजाना संभाला नहीं जा रहा। उस समय यही सोचा जा रहा था कि स्मारक की सारसंभाल शुरू हो जाएगी लेकिन यह सोच गलत साबित हो गई है। एक साल बीत गया है लेकिन स्मारक की सार संभाल न तो स्मारक समिति ने की है और न गुरूशरण छाबड़ा के किसी परिजन ने की। किसी के पास न समय है न रूपये हैं कि यहां चौकीदार माली पारिश्रमिक पर रखा जा सके। कहने को समिति के लोग और नजदीकी व परिवार जन सभी धनियों में है और करोड़़ों की संपत्ति के मालिक हैं। 

 अब 9 जून 2026 को गुरूशरण छाबड़ा की जयंती है और बगीची उजड़ी हुई सूखी हुई पड़ी है। 

* गुररूशरण छाबड़ा स्मृति समिति के अध्यक्ष व पदाधिकारियों को स्मारक को लगातार रोजाना संभालना चाहिए चाहे घूमने के लिए ही पहुंचे। 

* गुरूशरण छाबड़ा सन् 1977 में सूरतगढ़ से विधायक चुने गए थे। राजस्थान में संपूर्ण शराबबंदी के लिए जयपुर में आमरण अनशन में सन् 2016 में 3 नवंबर को उनके प्राण चले गए थे। उनकी देह चिकित्सालय को दान कर दी गई थी। गुररूशरण छाबड़ा की स्मृति में राजकीय महाविद्यालय का नाम किया गया। एक सैकेंडरी स्कूल का नाम भी उनकी स्मृति में कर दिया गया। गुरूशरण छाबड़ा की ईमानदारी को याद किया जाता है लेकिन स्मारक की सार संभाल नहीं किया जाना निकृष्टता दर्शाता है। ०0०















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