* करणीदानसिंह राजपूत *
आपके स्कूल में बच्चों को किसी भी प्रकार से प्रताड़ित किया जाता है तो समझ लें कि किसी भी दिन बच्चे ने शिकायत कर दी तो स्कूल धड़ाम से
गिर जाएगा। शिक्षक,प्रिंसिपल,संचालक और मामले को दबाने में सहयोग देने वाले शिक्षक व अन्य स्टाफ जेल में होंगे। छोटेछोटे बच्चों को न पढने पर,होमवर्क नहीं करने पर,उत्तर याद नहीं होने पर किसी भी प्रकार की मारपीट, डांट डपट, मुर्गा बनाना, खडे़ करना, दूसरे बच्चे से थप्पड़ मरवाना,लड़कों को चूडिय़ां पहना कर हंसी उड़ाना क्रूरता मे आते हैं और पुलिस में शिकायत होने पर
जेल निश्चित है। इस लेख को पढ कर यह न सोचें कि कुछ नहीं होता। माता पिता आदि ने ही न पढने पर दंड देने सख्ती करने का कहा था जैसा बहाना पुलिस थानों में नहीं चलता। क्या आपके स्कूल में कोई भी कक्षा में पढाने के लिए लगा दिया जाता है जो टीचर नहीं है और वह भी बच्चों को प्रताड़ित कर देता है। लड़कियों के साथ मारपीट, चोटी पकड़ कर डेस्क पर रगड़ कर दंड देना, हाथ मरोड़कर पिटाई करना होता है तो आप जैसा नालायक दूसरा नहीं हो सकता। लड़की ने प्रताड़ना के बाद शिकायत में बैड टच का आरोप लगा दिया तो क्या होगा?
कभी भी कोई भी बच्चा शारीरक दंड से डांट से परेशान हुआ घायल हुआ किसी का हाथ पैर काम करना बंद हुआ या कोई गड़बड़ी हुई तो गुरूजी की गुरूआई क्षण भर में खत्म हो जाएगी।
छोटे छोटे बच्चों को बाल वाहन में भेड़ बकरियों की तरह भरना और स्कूल में शारीरक मानसिक दंड देना, पीटना और पिटवाने की शिकायतें हैं मगर संचालकों को मालुम है और मालुम नहीं भी है। स्कूल संचालकों की जानकारी में होती है ये सब अनियमितताएं साधारण में,सब चलता है,कुछ नहीं होता, जैसी सोच से हल्के में लेते हैं और फंसने पर सब बरबाद हो जाता है।
* छोटे छोटे बच्चे भी दंड से डांट से आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं तब संचालक ऐसे फंसता है कि केस में से निकल नहीं पाता। अभिभावक कह दें कि डराओ धमकाओ थप्पड़ मार दो तब भी शिक्षक को ऐसा नहीं करना चाहिए।
* मेरी जानकारी में स्कूली छात्र की आत्महत्या का एक मामला सूरतगढ़ राजस्थान का है जिसमें उच्च माध्यमिक स्कूल के संचालक पर मुकदमा है तथा गिरफ्तारी आदेश पर उच्च न्यायालय जोधपुर से स्टे लेकर फिलहाल बचे हुए हैं।*
* अभी एक अत्याचार का बहुत ही घिनौना मामला सामने आया है जिसमें पुलिस केस हुआ है। बच्चे ने अध्यापिका से पेशाब करने के लिए अनुमति मांगी। अध्यापिका ने अनुमति नहीं दी। बच्चे का पेंट में पेशाब निकल गया। अध्यापिका ने डांटा पीटा और दूसरे कमरे में ले जाकर दंड दिया। अध्यापिका ने चाकू गर्म कर बच्चे की पेशाब नली पर दाग दिया। बच्चे के दर्द होने पर मां बाप ने पूछा तब यह घटना सामने आई। पुलिस केस हुआ। बच्चों को दंड देने का कोई अधिकार नहीं है। शिक्षक अपनी घर की परेशानियों की क्रूरता स्कूल में निकालते हैं।
* बाल वाहन का रंग पीला होना चाहिए और भी कड़े नियम हैं जिनका पालन नहीं किया जाता। वाहन किराए पर और उसमें क्षमता से अधिक बच्चे। लेखक ने अनेक बार छोटी बालवाहिनी में बच्चों को ठूंसा हुआ और सीट से नीचे बैठे हुए भी देखा है। इसमें अभिभावकों की भी गलती है कि जब वे वाहन का शुल्क देते हैं तो अपने बच्चे से ऐसा व्यवहार स्वीकार क्यों करते हैं। इसमें यातायात विभाग, पुलिस भी दोषी है जो जांच नहीं करते। अच्छे स्कूल के चक्कर में अपने कोमल अंग बच्चों को यातनाओं के हवाले कर देते हैं।
* स्कूल संचालक, प्रधानाचार्य, शिक्षक दंड देने की और वाहन में ठूंसने की गलत हरकतें करते हैं तो अभिभावकों को पुलिस में शिकायत कर देनी चाहिए। बच्चे का जीवन स्कूल के संचालक की कार्वाईयों से अधिक महत्वपूर्ण है इसलिए बच्चों से वाहन,कक्षा में दंड आदि के बारे में जानकारी लेते रहना चाहिए। अभिभावकों द्वारा बच्चों से पूछते रहना चाहिए कि स्कूल में मारपीट या किसी भी प्रकार की प्रताड़ना तो नहीं हो रही। यदि स्कूल में कुछ भी गलत हो रहा है तो कोई भी क्षमा के लायक नहीं। ऐसे में शिकायत हुई तो स्कूल बंद और जेल खुली होगी।( यदि आप स्कूल चलाते हैं तो पढने के तुरंत बाद सुधार कर लें तथा अपने मित्रों संचालकों शिक्षकों को समझाएं। ) इस लेख को मजाक में न लें और गंभीरता से सोच लें कि समय खराब हो सकता है और पुलिस मुकदमा हो सकता है।
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31 जुलाई 2026.
* करणीदानसिंह राजपूत,
स्वतंत्र पत्रकार,( राजस्थान सरकार से अधिस्वीकृत)
पत्रकारिता अनुभव 62 वर्ष,
94143 81356.
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