रविवार, 16 नवंबर 2025

जिला कलेक्टर और जिला एसपी. कैसे हो?* करणीदानसिंह राजपूत *

 

जिला कलेक्टर के पद का पूर्व नाम जिलाधीश था। लोगों का कहना था कि इस पदनाम से राजशाही परिदर्शित होती है और अधिकारी राजशाही व्यवहार करते हैं जो प्रजातंत्र में उचित नहीं है। जिलाधीश अपने को जिले का राजा समझें और वैसा ही उनका व्यवहार नजर आए तो बदलाव का निश्चित हुआ। जनता के बीच से उठती हुई आवाज को राजस्थान सरकार ने सुना और  जिलाधीश पद नाम को बदल कर जिला कलेक्टर कर दिया था। काफी साल हो गये पदनाम बदले हुए। जिला कलेक्टर का  मतलब जिले की सरकार जो सीधे मुख्यमंत्री और मुख्यसचिव से संपर्क रखते हुए प्रशासन चलाए। ऐसा ही पद है कानून और शांति व्यवस्था संभालने वाला'जिला पुलिस अधीक्षक'। दोनों ही पद संवेदनशील जिनके हर कार्य का असर होता है और उनका कामकाज मतलब सीधा सरकार का कामकाज होता है। जिले में कुछभी  गड़बड़ हुई तो इन दोनों पदों की जिम्मेदारी होती है। 

इन संवेदनशील पदों पर अधिकारी कैसे हो? उनका कामकाज का तरीका स्फूर्ति वाला हो, ढील वाला न हो। जनता की सुनवाई तुरंत और हर वक्त पर हो तथा जिले में हर कार्यालय पर नियंत्रण हो ताकि हर जगह लोग बिना परेशानी के अपने कामकाज करवा सकें और सरकार की योजनाओं का लाभ उठा सकें। हर कार्य समय पर हो। अमन चैन हो अपराध न हों और उनपर नियंत्रण हो। दोनों ही पद शांति व्यवस्था से जुड़े हैं। जिलाकलेक्टर और जिला पुलिस अधीक्षक पदों पर अधिकारी डेढ दो साल तक ही रह पाते हैं या समझें सरकार प्रशासनिक कारणों से बदल देती है। 

वर्तमान में इन दोनों ही पदों पर महिला अधिकारी हैं।

जिलाकलेक्टर पद पर डा.मंजू और  जिला पुलिस अधीक्षक पद पर अमृता दोहन हैं। दोनों आम जनता और अपनी ड्युटी और सरकारी योजनाएं व कार्यों के प्रति कितनी गंभीर हैं? ये सरकार के प्रतिनिधि पद हैं। वहां चुने हुए जनप्रतिनिधि भी स्वयं सरकार हैं जो नियम बनाते हैं और उनके बनाए नियम और योजनाओं को जिलाकलेक्टर और जिलापुलिस अधीक्षक लागू करते हैं। यहां सरकार में जनप्रतिनिधि का पद कद दोनों ही अधिकारियों से ऊंचे हैं। संविधान में जनप्रतिनिधि की हैसियत पावर शक्ति सभी की जानकारी समझी जा सकती है। 

जिलाकलेक्टर डा.मंजु का श्रीगंगानगर में पदस्थापन सितंबर 2024 के प्रथम सप्ताह में हुआ था। इस गणना के अनुसार उनको यहां करीब 14 महीने से अधिक बीत गए हैं। मतलब यह कि सरकार चाहे तो दूसरा जिला सौंप सकती है या किसी अन्य पद पर स्थानांतरण कर सकती है। जिलाकलेक्टर डा.मंजु और श्रीगंगानगर के विधायक जयदीप बिहाणी के बीच में सरदार पटेल की 150 वीं जयंती कार्यक्रम में 15 नवंबर 2025 को विवाद हुआ। कार्यक्रम सरकारी था और उसमें जिला प्रशासन को यानि जिलाकलेक्टर डा.मंजु और अतिरिक्त जिला कलेक्टर श्री सुभाष को उचित समय पहले से उपस्थित रहना चाहिए था और जनप्रतिनिधि जयदीप बिहाणी से प्रोटोकॉल के हिसाब से उचित व्यवहार करना चाहिए था। यह त्रुटि क्यों रही या नहीं रही लेकिन इससे पहले भी एक घटना सूरतगढ़ में हुई। बालू रेत के टिब्बों पर जिला प्रशासन का कार्यक्रम था। जिले के जनप्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया हुआ था। जनप्रतिनिधि पहुंचे तो पाया कि उनकी सीटें पीछे और अधिकारियों की सीटें आगे की पंक्ति में लगी थी। जिलाकलेक्टर डा.मंजु भी उस कार्यक्रम में थी। विधायक जयदीप बिहाणी ने उस समय भी प्रोटोकॉल के लिए चेताया था। उनकी चेतावनी के बाद जनप्रतिनिधियों की सीटें आगे की प्रथम पंक्ति में की गई थी। यह प्रोटोकॉल की चूक बार बार प्रशासन से कैसे और क्यों हो रही है? इस प्रश्न पर प्रशासन को विचार करना चाहिए। जिलापुलिस अधीक्षक और प्रेस का सामंजस्य भी आवश्यक है। जिलापुलिस अधीक्षक अमृता दोहन का व्यवहार प्रेसकान्फ्रेंस में विनम्रता से उत्तर का होना चाहिए। पत्रकार तो प्रश्न करेंगे वे सीधे न होकर अनेक बार घुमा कर भी होते हैं। हर पत्रकार की अपनी शैली अपना तरीका। एसपी उसका जवाब दे और स्थिति स्पष्ट करे लेकिन उसके व्यवहार में उखड़ापन होगा तो प्रेस से सांमजस्य नहीं होगा। सरकार की शांति कानून व्यवस्था को लागू कराने आम लोगों तक पहुंचाने की एक बड़ी महत्वपूर्ण कड़ी है प्रेस। राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय से अधिस्वीकृत पत्रकारों के नाम पते मोबाइल नं तक जिलापुलिस अधीक्षक कार्यालय में नहीं है और न पुलिस थानों में हैं। पुलिस के अधिकांश कार्यों शांति बैठकों की खबर ही लोगों तक उचित ढंग से पहुंच नहीं पाती। ऐसा ही हाल जिलाकलेक्टर व जिले के अन्य प्रशासनिक कार्यालयों का है।

सरकार के दोनों पद जिलाकलेक्टर और जिलापुलिस अधीक्षक अधिकारियों को अपने कार्य को सुव्यवस्थित करना जनता के लिए अच्छा रहता है।०0०

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