गुरुवार, 13 अगस्त 2026

कट गए हजारों बिना पेच लड़़े: कविता-करणीदानसिंह राजपूत


कट गए हजारों
बिना पेच लड़े।
आकाश में उड़ने के सपने
धरती पर ढेर हो गए।
हर शहर में
हर गली में
मिलेंगे बिलखते
कोई नहीं उनके
आंसू पोंछने वाला।
कितने रंगों से सजे
कितने संपर्क बनाए
कितने रिश्ते जोड़े
कितने हाथ जोड़े
कितने चरण दबाए।
मगर कट गए हजारों
बिना पेच लड़े।
सोचते थे
हम ही उड़ेंगे
मगर आरक्षण के
धागे से
बिना उड़े ही
कट गए।
बड़े भी नहीं बचे
जो ढाल कहलाते थे
बड़े का गुमान था
बड़े की ताकत थी
वे भी कट गए।
ये तो चुनाव का
खेल था
बिना लड़े ही 
आरक्षण से कट गए।
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प्रथम 25 सितंबर 2019
अपडेट 13 अगस्त 2026.

करणीदानसिंह राजपूत,
स्वतंत्र पत्रकार,
( पत्रकारिता 63 वर्ष)
सूरतगढ़।
94143 81356.

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