Monday, November 11, 2013

लोक सीख:डूंगर पर चढ़ लो



गांव गांव ढ़ाणी ढ़ाणी डूंडी सी पिट गई।
बरखा आवण आली है। अपणी अपणी जान माल बचालो।

 ढ़ोर जिनावरां ने बचालो।
अपणे अपणे घर बचालो। पाणी ते कच्ची बस्तियां तिरिया मिरियां भर जावैली अर कच्चे कोठे मकान ढ़ह जावेंगे। 

 नीची बस्तियां वालां की कुण सुनण वाले। टूटण बाद दुबारा बणावण में सौ सौ पंगे। जमीन खरीद ना सकै अर दुबारा तीबारा किसी एक चौधरी के पांव अर किसी दूसरे चौधरी के पावां में पडऩा पडै़।
 आच्छी आच्छी जमीन चौधरियां के कब्जे में होती जावै। गरीब तो तड़प तड़प मरण के भाग के। गरीब तो जूते खावण के भाग के।
 कोई ना कोई चौधरी झांसा दे दा के ठग ले।
अब गांव गांव डूंडी पिट री है।

 आपणै आपणै टापरै बचालो।
बुड्ढे बडेरे चौपाल चौक पर बातां करण लाग रै। घरां में लुगाईयां टाबरां जवानां में चिंता लागी।
एक बडेरा बोल्या। देखो जवानों मरदों। हम तो चालीस पचास सालां ते पिट रयां हा। कोई सुनण वाला नहीं आया। पण अबकी धरती माता ठूठी है। धरती माता वरदान देण ने अपना रूप बदल्या है। 

आपणै गांवा नेड़ै धरती फाड़ डूंगर निकल्या है। बार बार उजडऩे से बचणा है तो डूंगर ऊपर नुंवा मकान आसरा बना लो अर गांव गांव ढ़ाणी उस पर बसालो। डूंगर चढ़ जावो। डूंगर घणा ऊंचा है। बरखा कितनी आवै बाढ़ कितनी आवै। आपां आपां रा परिवार गांव सारा बस्या बस्या रह जावैगा।
बडेरा बोल्या। म्हारै टैम चालीस पचास सालां पहलै जे डूंगर निकल्या होता तो बार बार उजणना ना पड़ता। हर साल उजड़णा अर बसणा।
चौधरियां से जमीन मांगण वास्तै जाणा नहीं पड़ता। 

हाथा जोड़ी अर बेगारां में पूरी जिंनगानी बीत गई। हम तो सारा चौधरियां नै पितायोड़ा है। सारे एक सूं एक बते। जो भी नई चौधर करै वो बेसी लुटेरा ही निकल्या।
सुनण वालों ने बडेरे की सीख पर हुंकारे भरण लागे। लोग बागां ने बड़ेरे की सीख में दम लाग्या। 

बडेरे की सीख एक से दूजे गांव तीजे गांव अर ढ़ाणी ढ़ाणी पूंचगी।
लोगां नै अक्ल आगी। लोग लुगायां बातां करते करते नुवे मकानां बस्तियां गांवां के जोड़ तोड़ बिठावण लागै। 

सारे अपने अपने ढ़ोर डांगरा ने ले डूंगर चढ़ग्ये अर नुंवा नुंवा मकान बणावण जुट गये।
बरखा आई अर घणी तगड़ी आई। 

चौधरी तो अपने अपने घरां ने अर कोठियां नै बचावण लाग्या।
 बरखा ऐसी आई के चौधरी तो आपस में लड़ पड़्या।
 चौधरी आपस में लड़े जिका गरीबां ने कियां बसावे परोटे।
 आच्छा होया चौधरियां के भरोसे ना रिया अर डूंगर चढ़ ग्या।
 कोई गांव उज्ड़्या ना कोई घर उज्ड़्या।
सारां तै आच्छी बात आ होई कै किसी भी चौधरी के आगै हाथ ना फैलाणा पड्या। 

गरीब गुरबां नै अपणी ताकत का पैली बार मालम होया।
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