मंगलवार, 26 जून 2018

घनश्याम तिवाड़ी के अचानक इस्तीफे से भाजपा में आपातकाल

- करणीदानसिंह राजपूत -

घनश्याम तिवाड़ी के आपातकाल की बरसी से ठीक एक दिन पहले पार्टी छोड़ने के बाद प्रदेश की राजनीति में लाभ हानि के अनुमान शुरू हो गए हैं।


 तिवाड़ी का विरोध तो जयपुर से दिल्ली तक सब को मालूम था लेकिन निष्कासित होने का इंतजार किए बिना ही उनके पार्टी छोड़ देने की संभावना किसी को नहीं थी।

 वे छह बार विधायक और प्रदेश की भैरोंसिंह शेखावत व वसुधंरा राजे के नेतृत्व वाली सरकारों में दो बार विधायक रहे हैं।

घनश्याम तिवाड़ी का आखिरी नमस्कार इस्तीफे से हुआ है जो भाजपा के लिए एक बड़े झटके के तौर पर माना जा रहा है। 

हालांकि भाजपा नेता इसे तवज्जो नहीं दे रहे हैं और मामूली सी बात बताने मे लगे हुए हैं लेकिन यह फीकी हंसी जैसा है।

 केंद्रीय नेतृत्व के साथ प्रांतीय नेतृत्व की रस्साकस्सी के चलते तिवाड़ी के पार्टी छोड़ने से राजनीति जयपुर से गांवों तक गरमाई हुई साफ दिख रही है।

 

तिवाड़ी ने पार्टी छोड़ते हुए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को सीधे निशाने पर लिया है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व व राजे के बीच नए प्रदेशाध्यक्ष को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है। लगभग दो महीने से प्रदेशाध्यक्ष का पद खाली है और राज्य में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं।


चार साल से वसुंधरा का विरोध


राजे के खिलाफ तिवाड़ी का विरोध तो चार साल पहले शुरू हो गया था। 

 तिवाड़ी जब वर्ष 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में प्रदेश में सर्वाधिक मतों से जीते मगर इसके बावजूद उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया। क्या इसमें केंद्र की कोई भूमिका नहीं थी?

इसके बाद से तिवाड़ी व राजे के बीच छत्तीस का आंकड़ा सदन से सड़क तक दिखा। इसके लिए उन्हें कारण बताओ नोटिस भी दिया गया, लेकिन पार्टी उन्हें निष्कासित करने से इसलिए भी कतराती रही। भाजपा डर रही थी कि तिवाड़ी खुद को शहीद बताते हुए सहानुभूति बटोर लेंगे।

इस बात की पुष्टि पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी के उस बयान से भी होती है, जिसमें उन्होंने कहा कि पार्टी ने धैर्य रखा, तिवाड़ी ने स्वतः इस्तीफा दे दिया।

जातिगत गणित और चुनावी समीकरण

तिवाड़ी के पार्टी छोड़ने को गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया भी तवज्जो नहीं दे रहे और कह रहे हैं कि तिवाड़ी कौनसी बड़ी तुरूप हैं। उनके जाने से पार्टी को कोई नुकसान नहीं होगा। लेकिन प्रदेश के 9 विधानसभा सीटें ब्राह्मण बाहुल्य हैं। इसके अलावा 18 से ज्यादा सीटों पर वोटर संख्या के हिसाब से दूसरे या तीसरे नम्बर पर आने वाले ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका अदा करते हैं।

 राजे के विरोध के साथ दीनदयाल वाहिनी के गठन अपने बेटे की नई पार्टी भारत वाहिनी के पंजीकरण से पहले तिवाड़ी ब्राह्मण संगठनों में भी सक्रिय रहे हैं। इस स्थिति में तिवाड़ी भले ही जातिगत मतों का फायदा न ले सकें, लेकिन भाजपा सरकार के खिलाफ एंटी इनकमबेंसी के चलते उन्होंने जिस तरह से भ्रष्टाचार, अघोषित आपातकाल व आंतरिक लोकतंत्र के सवाल उठाए हैं, उससे लगता है कि वे अपने नाम से सहानुभूति का लाभ लेने में सफल हो सकते हैं।

 

भाजपा नेता नहीं मानते नुकसान


भाजपा के नेता कहते हैं कि तिवाड़ी के जाने से पार्टी को कोई नुकसान नहीं होगा, बल्कि इनकमबेंसी में जो वोट कांग्रेस के खाते में जाने थे, वे वोट तिवाड़ी खींचेंगे तो पार्टी को तो फायदा ही होगा। लेकिन, तिवाड़ी की संघ से नजदीकी और राजे की संघ से दूरी का फैक्टर भी आज की स्थिति में अहम साबित हो सकता है।

यदि बात तिवाड़ी के जाने से सम्भावित तीसरे मोर्चे की की जाए तो जाट-ब्राह्मण गठजोड़ भी भाजपा पर भारी पड़ सकता है। प्रदेश में भले ही तीसरा मोर्चा कभी सफल नहीं रहा और कांग्रेस-भाजपा की ही पांच पांच साल में सरकार बनती रही है, लेकिन पिछले दो चुनावों में भाजपा से बगावत कर अलग अलग चुनाव लड़ने वाले देवीसिंह भाटी व किरोड़ीलाल मीणा को पार्टियों के मिले चार फीसदी से ज्यादा मत जातिगत मतों का प्रभाव बढ़ने का संकेत तो कर ही रहे हैं।

 इस बीच, इनकमबेंसी कम करने के चक्कर में भाजपा कई विधायकों के टिकट काटकर नए विधायकों को मैदान में उतारेगी। इससे होने वाली अन्तरकलह भी भाजपा के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है।


कहीं दिल्ली का इशारा तो नहीं


तिवाड़ी के इस्तीफे को कई लोग नए प्रदेशाध्यक्ष पद को लेकर भाजपा आलाकमान की राजे से रस्साकस्सी से जोड़कर भी देख रहे हैं। तिवाड़ी के इस्तीफे के बाद केंद्रीय नेतृत्व को राजे पर दबाव बनाने का मौका मिल सकता है। कुछ लोग केंद्र में सक्रिय राजे विरोधी तिवाड़ी के पुराने मित्रों की भूमिका भी इस प्रकरण में मान रहे हैं कि उनकी सलाह पर ही निष्कासन का इंतजार कर रहे तिवाड़ी ने अचानक पार्टी छोड़ने का ऐलान किया है, ताकि राजे पर प्रदेशाध्यक्ष मुद्दे पर दबाव की राजनीति की जा सके। लेकिन यह अनुमान सही नहीं लग रहा क्योंकि न ई पार्टी भारत वाहिनी के आने के बाद फिर इंतजार संभव नहीं था। इस पार्टी को भी चुनाव से पहले चार पांच माह का समय तो चाहिए था।

 

इसलिए माने जाते हैं सियासी 'दिग्गज' 


- 7वीं, 8वीं, 10वीं, 12वीं, 13वीं तथा 14वीं विधानसभा के सदस्य रहे हैं तिवाड़ी

- तिवाड़ी 1980 से 1989 तक सीकर से तीन बार चुने गए थे विधायक

- शेखावत सरकार में ऊर्जा मंत्री बने

- तिवाड़ी राजे सरकार में भी 2003 से 2008 तक रहे काबिना मंत्री

- पिछले विस चुनाव में सबसे ज्यादा वोटों से सांगानेर से जीते थे तिवाड़ी


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