Monday, February 16, 2015

हारे योद्धा के स्वागत की तैयारियों पर करोड़ों का खर्च:


 - करणीदानसिंह राजपूत -
महान देश का महान सम्राट अपनी विशाल सेना और युद्ध के अति आधुनिक संसाधनों तरीकों के होते हुए साधारण से सिपाही से युद्ध में पराजित हो गया। पराजय भी इतनी दुखदाई कि इतिहासकार विशेष उल्लेख करने से चूकेंगे नही। युद्ध से पहले बड़बोलेपन से की गई घोषणाएं धूल धूसरित हो गई।
युद्ध में मात खाकर लौटे सम्राट का स्वागत करने को चाहे जो बहाना किया जाए तरीका निकाला जाए।
गरीब देश की गरीब जनता पर यह बोझ कितना कैसे डाला जाएगाï? जनधन सम्राट के हाथ में उसके प्रांतीय हाकिमों के हाथ में चाहे जितना उड़ाए। यह शायद इस सोच से किया जा रहा हो कि अभी और युद्ध करने हैं और इस पराजय किसी तरह से लोगों के दिल दिमाग से मिटाया नहीं जाएगा तो दूसरे युद्धों में भी बुरी गत बन सकती है। 
दिल्ली पर राज करने का सपना मुगलों के काल से आज तक चल ही रहा है। देश में राज आ जाए और दिल्ली में राज ना आए तो सब कुछ बेकार। सारे सपने चकनाचूर। ये सारे सपने एक साधारण सैनिक ने चूर चूर कर डाले।
सैनिक कह रहा है कि वह दिल्ली में ही रहेगा। यह सच्च होगा लेकिन दूसरी जगह दूसरा सैनिक नहीं होगा यह कहां गारंटी है। दूसरे युद्ध में दूसरा सैनिक भी तो पटखनी दे सकता है।
बस।
यही सोच खाए जा रही है। अब सम्राट का राज जितने सूबों में है कम से कम उन सूबों में तो स्वागत किया जा सकता है।
इसी स्वागत नीति से बड़े बड़े ठेके दिए जा चुके हैं। कभी कोई ऑडिट होगी नहीं।
आम जनता की परवाह करने वाले आधुनिक तकनीकी अपनाने का दावा करने वाले बता रहे हैं कि सभा स्थल पर बड़े बड़े स्क्रीन भी लगेंगे। जब यह साधन है तो लाखों लोगों को यहां लाने की जरूरत ही नहीं लोग टीवी स्क्रीन पर देख लेंगे और अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री व मंत्री आदि स्क्रीनों पर आपसी बातचीत के साथ भाग ले लेंगे।
लेकिन ऐसा नहीं होगा।
सोचलें कि जिनका राज होता है वे चाहे जैसा कर सकते हैं। बात बजट उपलब्ध की सो रसोई गैस के एक सिलेंडर में ही 25 रूपए का भार जनता पर डाल ही दिया है। बस ऐसा ही होता रहेगा। ऐसे ही बजट बनता रहेगा और खर्च होता रहेगा। ऐसे ही स्वागत होते रहेंगे।
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