रविवार, 10 मई 2020

पीने पिलाने वाले सरकारी खाते में रोटी मांगने वाले समाजसेवियों के खाते में- करणीदानसिंह राजपूत. सामयिक व्यंग्य लेख -



सरकार ने पीने पिलाने वालों को अपने खाते में जोड़ लिया है और भूखे ,रोटी मांगने वाले,जरूरतमंदों, सामान्य लोगों को धर्म प्रेमियों समाजसेवियों संगठनों के खाते में डाल दिया है।
सरकार की सोच बहुत बड़ी है। जो लोग मांगते रहते हैं उनको धर्म प्रेमियों समाजसेवियों के खाते में डाला है ताकि सरकार का खर्च कुछ नहीं लगे और धर्म प्रेमी समाजसेवी भी खुश होते रहें।
अब बात रही पीने पिलाने वालों की। ये पीने वाले लोग सरकार से कभी मांगते नहीं और नहीं पीने वालों की मांगें खत्म होती नहीं।  इतना अंतर है पीने वालों में और न पीने वालों में। नहीं पीने वाले मांगते हैं और पीने वाले सरकार को देना चाहते हैं। वे सरकार के खजाने को भरना चाहते हैं।
ऐसी स्थिति में आप हम सभी सोचें कि सरकार कहां गलत कर रही है?
वे सरकार को देना चाहते हैं। उनको सरकार क्यों खोए और क्यों छोड़े?
फिर मामूली सौ दो सौ वाली बात भी नहीं है। करोड़ों रूपये का खेल है।
न पीने वाले सरकार से लेते रह कर भी उसकी आलोचना करते हैं,गालियां तक भी निकाल देते हैं।  पीने पिलाने वाले सरकार का खजाना भी भरते हैं और कभी भी सरकार को कोसते नहीं गाली नहीं निकालते।
वे तो हर समय कहते हैं कि सरकार उनका पैसा लेती रहे। उनका तो सरकार को सुझाव है कहना है कि समय की भी पाबंदी क्यों है? सुबह 10 बजे खोलो रात के 8:00 बजे बंद करो। इसके अलावा सूखा दिवस ! यह क्या चक्कर डाल रखा है? अरे!सरकार 24 घंटे चाहे तो वे तो सरकार को 24 घंटे देना चाहते हैं। वे शहर में भी देना चाहते हैं गांव में भी देना चाहते हैं। नेशनल हाईवे पर भी सरकार का खजाना भरना चाहते हैं। सरकार ने नेशनल हाईवे पर दुकान स्टोर ठेके दूर दूर कर दिए।वे जो पीने पिलाने वाले भाई बंधु ट्रैक्टर चलाने वाले और भी अनेक लोग हैं जो नेशनल हाईवे पर भी दिन रात सरकार का खजाना भरना चाहते हैं, उनकी सुनवाई होनी चाहिए।
सरकार को काम धाम चलाने के लिए जो करोड़ों रुपए चाहिए। करोड़ों रुपए कौन देता है? ये पीने पिलाने वाले देते हैं। सरकार की आबकारी नीति में इनके सुझाव शामिल हों बल्कि इनका प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इनका दावा है की पीने वालों का प्रतिनिधित्व रहेगा तो सरकार पर कभी भी आर्थिक संकट नहीं आ सकता बल्कि खजाने में करोड़ों रूपये फालतू से पड़े रहेंगे।
सरकार से जो आटा दाल मांगने वाले हैं वे तो एक पैसा भी देते नहीं और सरकार से लेते हैं तो लेते ही भूल जाते हैं। कभी भी साक्षात्कार लेलो एक ही आवाज मिलती है की सरकार ने कुछ नहीं किया। जनप्रतिनिधि तो इलाके में चुने जाने के बाद आया ही नहीं। टीवी चैनलों के साक्षात्कार यों लगते हैं मानो सभी को एक जैसा ही जवाब देने की ट्रेनिंग दी गई हो। ये साक्षात्कार ऐसे बनाए जाते हैं या रोते बिलखते से होते हैं कि देखने वाले को सच्च में लगने लगता है कि इनसे सचमुच अन्याय हो रहा है।
सबसे बड़ी बात छूट न जाए।
कोरोना वायरस के लोकडाउन चक्कर में इतने दिन से बंदी के कारण कुछ करोड़ लोगों का तो दिमाग चलना ही बंद हो गया। जिन लोगों के दिमाग के कपाट पीने से ही खुलते हैं और तेज भी चलते हैं उनके लिए भी सरकार की पोजीटिव सोच की सराहना की जाए वह भी कम ही होगी। सरकार द्वारा उनकी चिंता करना भी गलत नहीं है। इतने लोग पगला जाएं तो बुद्धि का अकाल पड़ जाए।
कई दिनों के बंद के बाद शराब की दुकानें खुली तो एक ही दिन में करोड़ों रूपये का बढाया हुआ कर सरकारों के खाते में जमा हो गया। ऐसी दुकानदारी और कोई नहीं है।
अब बताओ सरकार की गलती कहां है? संविधान ने सबको बराबर का दर्जा दिया है। सरकार को तो हर व्यक्ति के लिए सोचना होता है इसलिए तो लोकतांत्रिक सरकारें कहलाती हैं।00
सामयिक लेख-

करणीदानसिंह राजपूत,
स्वतंत्र पत्रकार,( राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय से अधिस्वीकृत)
सूरतगढ़ जिला श्रीगंगानगर( राजस्थान)
संपर्क- 94143 81356.
E mail.  karnidansinghrajput@gmail.com
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