शनिवार, 21 अप्रैल 2018

क्या बददुआ सच्च में लग जाती है? वैज्ञानिक युग में क्या सोचते हैं?

* करणीदानसिंह राजपूत *

अनेक बार कई लोग खुद के बारे में,अपने ही लोगों के लिए या दूसरों के बारे में नकारात्मक सोच रखते हुए या अचानक गुस्सा आने पर,किसी प्रकार से दुखी होने पर बददुआ कह डालते हैं। 

लोग अपने ही घर परिवार के लोगों या दोस्तों के बारे में गलत सोचते या बोलते वक्त सोचते नहीं। लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम रहता है कि  किसी समय में निकले बोल या सोच विनाशकारी हो सकती है। इसका बुरा असर खुद पर भी हो जाए।

प्राचीनकाल में ऋषि मुनि किसी व्यक्ति या देवताओं को शाप या आशीर्वाद दे देते थे जो तत्काल ही फलीभूत हो जाता था। 

 वे शाप देते मगर क्षमा मांगने पर या अन्य कारण से मुक्ति का समाधान भी बता देते थे। 

ऐसा माना जाता है कि आज भी आशीर्वाद और शाप फलीभूत होते हैं।

 सामान्य मनुष्य के शाप या आशीर्वाद असामान्य असाधारण रुप में  फलीभूत हो जाए तो आश्चर्य नहीं।

हालांकि एक समय विशेष में दिए गए शाप निश्चित ही फलीभूत हो जाते हैं इसलिए कहा जाता है कि निर्बल की हाय मत लो। सब कुछ होते हुए भी व्यक्ति निर्बल हो सकता है,पीड़ित लाचार हो सकता है।


आप मानें कि परिवार के ही व्यक्ति के मुंह से या मन के भीतर से  किसी तरह से दुखी पीड़ित होने पर अपमानित होने पर परिवार के ही किसी भाई बंधु बहन या अन्य सदस्य के प्रति निकली बददुआ,हाय,दुराशीस का फल अनेक बार बहुत जल्दी प्रगट हो जाता है कि पुरानी घटना से नई घटना अपने आप जुड़ जाती है। ऐसी घटनाओं पर सत्ताधारी नेता,अपार संपत्ति के मालिक और उच्च पदाधिकारी सरकारी गैरसरकारी अधिकारी नजदीकी संगी साथी भी कुछ नहीं कर पाते। ऐसी हालत या घटना पर कहा जाता है। भगवान को यही मंजूर था। विधि के विधान को कोई टाल नहीं सकता। भगवान के आगे किसी की नहीं चलती। बस! इन शब्दों से दिलासा सांत्वना दी जाती है। सभी जाधते हैं कि यह सब कुछ दिन चलता है और प्रभावित को तो जीवन भर भोगना पड़ता है।पने या दूसरों के बच्चों को गालियां न दें, ना ही कोसें। 

 माता-पिता भी अनेक बार बच्चों को कहना न मानने पर, न पढ़ने पर कह देते हैं कि तू न ही होता तो अच्छा था, या घर से चला जा, मर जा।

घर परिवार में वाद विवाद पर मर जाने तक का कह देना।

नाश हो जाने या विनाश हो जाने की कल्पना करना, इसके बारे में सोचना या अपने ही घर परिवार के विनाश का शाप देना बहुत ही विनाशकारी साबित होता है। आप जो कहते हैं वही आपकी ओर लौट कर आता है।

बहुत ज्यादा गंभीर बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति के बारे में कुछ लोग यह भी बोलते रहते हैं कि अच्छे है कि भगवन इसे जल्दी उपर उठा ले। 

ऐसे लोगों को 'काली जुबान' का कहा जाता है जो अक्सर दूसरों के बारे में बुरा-बुरा ही बोलते रहते हैं। ऐसे लोगों से यदि आपका विवाद हो जाए तो वे तुरंत ही आपको शाप देने लगेंगे। 

वे अक्सर कहते हैं कि फलां  फलां  व्यक्ति का कभी भला नहीं होगा, वो तो तड़फ-तड़फ कर मरेगा, वो तो कुत्ते की मौत मरेगा। अरे वो तो जिंदगी में कुछ नहीं कर सकता। ऐसे लोगों की सोच नकारात्मक होती है। लोग खुद शापित होते हैं और दूसरों को भी शाप देते रहते हैं।

 तूझे तेरे किए का दंड अवश्य मिलेगा।भयानक दंड मिलने की चेतावनी दे दी जाती है।

यदि आपने किसी गरीब, भिखारी, अबला या बच्चे का दिल दुखाया है तो उसके दिल से आपके लिए जो बद्दुआ निकलेगी उससे आपको कोई नहीं बचा सकता।

जितना असर उसकी दुआ में होता है उतना ही असर उसकी बद्दुआ में होता है। 

ऐसा भी माना जाता है कि कई बार बददुआ उलट कर लौटती है और बददुआ देने वाले पर ही लग जाती है। दूसरों को गड्ढे में गिराने के लिए अपने ही घर के आगे खोदे गड्ढे में दूसरा गिरे या न गिरे खुद गिर जाते हैं।

कभी सोच कर देखा जाए किसी को पति मरने की बददुआ उलटी लौटे तब क्या होता है? किसी को भी बददुआ देने से पहले सोचा जाए और यह भी किसी को पीड़ित न किया जाए।

वैसे तो विज्ञान का युग है। शब्द की शक्ति को इस तरह से माना जाए या न माना जाए।

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