सोमवार, 1 मार्च 2021

* सारा देश तुम्हारा फिर भी, रो रहे तुम भीतर भीतर- काव्य करणीदानसिंह राजपूत.

 


- सारा देश तुम्हारा फिर भी,
रो रहे तुम भीतर भीतर-

* गैस पेट्रोल की बढती कीमतें
और बढे रेल किराए से
रो तुम भी रहे हो और
तुम्हारे परिवार भी।

* लोग बाहर रो रहे हैं।
तुम और तुम्हारे परिवार
छुप छुप कर भीतर रो रहे हैं।

तुम बाहर निकलने से पहले
आंसू पोंछ कर मुंह धोकर
चाहे निकलने लगे हो।

* मगर मुखड़े की हालत से
असलियत छिप नहीं सकती।
* मुस्कुराते मुखड़े के बजाय
उतरा मलीन थोबड़ा
नजर आने लगा है।
* लोग आडाना अंबाना चाहे
नहीं बने।
मुंह तो पहचानना अच्छे से
आता है।
* इसमें सभी माहिर
फस्ट डिवीजन हैं।
कोई यह डिग्री छुपाता भी
नहीं है।

* गैस पेट्रोल की बढती कीमतें
और बढे रेल किराए से
रो तुम भी रहे हो और
तुम्हारे परिवार भी।

- सारा देश तुम्हारा फिर भी,
रो रहे तुम भीतर भीतर-

दि. 1 मार्च 2021.



करणीदानसिंह राजपूत,
पत्रकार,
सूरतगढ़।
94143 81356.
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