Sunday, June 4, 2017

सूरतगढ़ में कोचिंग ले रहे बच्चों के परिजन सावधान रहें



- विशेष रिपोर्ट-


 सूरतगढ़ में कोचिंग ले रहे बाहर से आए बच्चों के परिजनों को अपने बच्चों पर निगाह रखने और सार-संभाल करते रहने की जरूरत है। खासकर पंकज यादव की संदिग्ध मौत के बाद कि उसने फांसी लगायी या  हत्या का शिकार हुआ? पंकज यादव ने बाहर से आई और यहां कोचिंग ले रही लड़की कोमल पर हत्या का मुकदमा कर दिया।लड़की ने उसे सग्गा भाई प्रचारित कर रखा था।जबकि वे भाई बहन नहीं थे और घटना लड़की के किराए के कमरे में हुई।लड़की पंकज यादव को बेहोशी​ की हालत में चिकित्सालय ले गई थी और मौत होने तक उसकी बेहोशी नहीं टूटी।कोमल के बाद में गायब होने से शक और गहरा गया।
बच्चे जहां हॉस्टल में रहते हैं उनका वातावरण कैसा है?चाहे वे कोचिंग सेंटरों के हॉस्टल भी हो तो भी देखभाल करते रहने की जरूरत है। बच्चे जहां किराए के कमरे में रहते हैं वहां और साथ में बच्चे भी रहते हैं तो उनका नेचर कैसा है? संगत का असर हो जाता है या कहें कि किसी न किसी चक्कर में बच्चा फंस जाता है। छात्र जीवन विशेषकर 15 से लेकर 25 वर्ष तक बहुत ही संवेदनशील होता है और अन्य साथी प्रभावित कर सकते हैं या प्रभावित कर देते हैं।
पिछले 30-40 सालों का इतिहास देखें तो परिवार में पति-पत्नी एक बच्चा चाहते हैं। किसी के दो बच्चे होते हैं। अब मानलें की कोचिंग कर रहा बच्चा या बच्ची परिवार में इकलौते हैं और वह किसी गलती में घिर जाए, किसी अपराध के शिकार हो जाएं तो माता-पिता का जीवन क्या होगा? पंकज यादव 20 वर्ष का था और इकलौता पुत्र था जिसकी मृत्यु संदिग्ध हो गई, और बाहर से आई एक कोचिंग ले रही लड़की पर हत्या का मुकदमा दर्ज हो गया।

सूरतगढ़ कोचिंग के नाम पर सोशल साइट पर प्रसिद्ध हो गया मगर जिस प्रकार के  सेंटर यहां है वैसे बाहर से आने वाले छात्र-छात्राओं को अपने इलाके में भी सुलभ हो सकते हैं। सूरतगढ के कोचिंग सेंटरों में जो शिक्षा देने वाले हैं उनका व्यवहार कैसा है और वे प्रशिक्षित हैं या नहीं है? इसकी पूछताछ परिजन नहीं करते। कोचिंग सेंटर का नाम बड़ा हो लेकिन वहां पर वातावरण कैसा है इसकी पूछताछ परिजन नहीं कर पाते। कोचिंग सेंटर से सरकारी व्याख्याता का नाम जुड़ा हो तो परिजन प्रभावित हो जाते हैं।
 बाहर के बच्चे अभिभावकों द्वारा प्रवेश कराने के बाद प्राय बाद में संभाले ही नहीं जाते। कोचिंग देने वाली संस्थाएं किसी भी बच्चे पर क्यों सोचे और विचार,यदि कोई बच्चा किसी चक्कर में या अपराध में फंसता है तो कोचिंग सेंटर तो यही कहेगा कि उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है। बच्चे ने जो कुछ किया वह संस्था के बाहर किया।
 किराएदार रखने वाले मकान मालिक भी देखते नहीं कि किराए के कमरे में कौन आ रहा है कौन जा रहा है? किराए का कमरा किसी एक के नाम होता है उसमें एक से अधिक तीन चार बच्चे तक रहते हैं।यह खर्च बचाने के लिए होता है।
 परिजन सूरतगढ़ का नाम सुनकर अपने बच्चे को सूरतगढ़ भेजना चाहते हैं लेकिन कभी समीक्षा नहीं करते कि सूरतगढ़ की कोचिंग सेंटर की असलियत क्या है? सच्चाई क्या है?
बाहर से आने वाले बच्चे अक्सर हुड़दंग करते रहते हैं और उसकी शिकायत अनेक बार विभिन्न मामलों से उठी है और पुलिस तक पहुंची है।बच्चे भी घर से बाहर सूरतगढ़ में आने के बाद खुद स्वतंत्र हो जाते हैं।
विभिन्न प्रकार के अपराध बढे हैं और बच्चे मोबाइल चैटिंग, मैसेज आदान-प्रदान में  संगत का शिकार हो जाते हैं या फुसला लिए जाते हैं। अपराध में हंस जाने पर कानूनी चक्कर से निकलना बहुत असंभव होता है और बच्चा सच्चा होता है तब भी बचाव में सही सिद्ध होने में सालों लग जाते हैं।
ऐसी स्थिति में बाहर से आने वाले बच्चों पर उनके परिजन ही नजर रखें,सार-संभाल समय-समय पर करते रहें तो अधिक उचित होगा। एक सवाल है परिजनों से के बच्चे को बाहर कोचिंग में भेजने के बाद उन्होंने कितनी बार सार-संभाल की मौके पर पहुंचे और देखभाल की?






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