मंगलवार, 13 जून 2017

शारीरिक विरोध नहीं होने का मतलब, महिला की सहमति होना नहीं है

नई दिल्ली 13-6-2017.
दिल्ली हाई कोर्ट ने बलात्कार के एक मामले में टिप्पणी करते हुए कहा है कि शारीरिक विरोध नहीं करने का मतलब यह नहीं कि महिला की सहमति हो।
कोर्ट ने कहा कि सहमति मर्जी से बिना किसी दबाव के होती है। कोर्ट ने यह टिप्पणी 2013 के एक रेप मामले को लेकर निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए की है। 20 मार्च 2013 को दिल्ली के लाल किले में यह मामला सामने आया था।
 खबरों के मुताबिक पुलिस लाल किले इलाके में गश्त कर रही थी तब एक  लड़की के चिल्लाने की आवाज पुलिस को सुनाई दी। आवाज सुनकर पुलिस तुरंत मौके पर पहुंची जहां लड़का-लड़की को आपत्तिजनक अवस्था में पाया गया।

पुलिस को देखकर लड़का भागने की कोशिश करने लगा लेकिन पुलिस ने उसे पकड़ लिया।
निचली अदालत ने इस मामले में राहुल को दोषी करार देते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी। सजा दिसंबर 2013 में सुनाई गई थी।  हाई कोर्ट में अपील करते हुए राहुल ने दावा किया था कि उसने लड़की से संबंध सहमति से बनाए थे। आरोपी ने अपने बयान में कहा था कि वह लाल किला इलाके से गुजर रहा था जहां उसे दो लड़के मिले थे जिन्होंने उसे लड़की से संबंध बनाने का ऑफर किया था। 300 रुपये में संबंध बनाने की बात तय हुई थी जिसके लिए राहुल तैयार हो गया लेकिन बाद में पैसों को लेकर लड़ाई हो गई और पुलिस मौके पर पहुंची।

दिल्ली हाई कोर्ट ने आरोपी के इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि एमएलसी रिपोर्ट से यह साफ होता है कि लड़की से संबंध बनाए गए थे लेकिन जांच का विषय यह है कि संबंध सहमति से बने थे या नहीं।
कोर्ट ने आगे कहा- “रेप के मामले में सहमति का अर्थ है मर्जी से जो बोलकर या फिर इशारे से व्यक्त की जा सकती है।
 इस मामले में लड़की चिल्लाई थी और जद्दोजहद के चलते उसके सिर पर चोट भी लग गई थी। ऐसे में इस मामले को सहमति से संबंध बनाने का नहीं माना जा सकता।”

 दूसरी तरफ लड़की ने अपने बयान में कहा था कि उसने सहमति से कोई संबंध नहीं बनाए थे और वह इलाके में रास्ता भटक गई थी जिसके बाद उसके साथ इस वारदात को अंजाम दिया गया।



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

यह ब्लॉग खोजें