रविवार, 1 अप्रैल 2012

गंगाजल मील के नाम से अतिक्रमण आखिर किसने दर्ज करवाए और क्यों करवाए? :खास रिपोर्ट- करणीदानसिंह राजपूत:


मील उस समय तो विधायक भी नहीं थे-
सूरतगढ़ में गुजर रहे राष्ट्रीय उच्च मार्ग न.15 पर मील के नाम की जगह पर अब कौन काबिज है? मील ने अतिक्रमण की जांच करवाने की मांग की है-
सूरतगढ़, 1 अप्रेल 2012. राष्ट्रीय उच्च मार्ग नं 15 पर दोनों ओर अतिक्रमणों की दो सूचियां बनी थी जिनमें मील के अलावा अनेक प्रभावशाली लोगों व राजनीतिज्ञों के नाम से करोड़ों रूपयों की जमीन पर अतिक्रमण बताए गए थे। एक पत्रकार कृष्ण सोनी आजाद की लोकायुक्त को की गई शिकायत पर यह जांच हुई थी। इसमें राजस्व तहसीलदार की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई जिसमें उच्च मार्ग के इंजीनियर, पालिका के इंजीनियर आदि व पटवारी आदि थे।
इस जांच में उच्च मार्ग की परिधि को सीमा माना गया व उसके बीच में से नाप लिया गया था। यह सूची 2007 में बनी थी। उस समय गंगाजल मील विधायक नहीं थे, मगर सूरतगढ़ में निवास शुरू हो चुका था।
इस सूची के बारे में ईओ मनीराम सुथार ने यह कहा था कि वे किसी भी रूप में अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही करके कोई पंगा नहीं लेना चाहते।
यह भी कहा था कि सूची में जिन लोगों के नाम आए हैं उनको पालिका की ओर से नोटिस जारी कर पूछा गया है कि वे किस अधिकार से इस भूमि पर काबिज हैं। ईओ ने बताया था कि कुछ लोगों ने जवाब दिया है, लेकिन दस्तावेज केवल दो जनों ने ही दिए हैं।
अब सवाल यह पैदा हो रहे हैं
1. गंगाजल मील का नाम सूची में था तो नोटिस उनके नाम से आवश्य जारी हुआ होगा?
उस नोटिस का उत्तर क्या आया था? या उत्तर आया नहीं था। इसके अलावा अन्य लोगों के क्या उत्तर आए थे?
2. गंगाजल मील के नाम से जिन स्थानों पर अतिक्रमण बतलाए गए थे, उन स्थानों पर वर्तमान में कौन काबिज हैं? ये लोग कब से काबिज हैं?
3.इस सूची के समाचार आने लगे तब गंगाल मील विधायक बन चुके थे। नगरपालिका कर्मचारियों को मील साहेब के सामने उसी समय यह तथ्य सामने लाए जाने चाहिए थे कि आपके नाम से अतिक्रमण दर्ज हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मील ने चुनाव जीतने के बाद और नगरपालिका में बनवारीलाल का पहला बोर्ड बनने के बाद स्वयं ने घोषणा की थी कि वे अतिक्रमण के खिलाफ हैं। इतना होते हुए भी नगरपालिका ने उनको यह क्यों नहीं बतलाया? यह मामला केवल गंगाजल मील का नहीं अन्य लोगों का भी है? कई लोगों ने तो पालिका में यह लिख कर दिया कि किराएदारों ने अतिक्रमणों पर आने नाम सर्वे में लिखवा दिए थे। कितना महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है कि सरकारी जमीन को लोगों ने अतिक्रमण करके आगे किराए पर भी चढ़ा दिया और जमीन की मालिक नगरपालिका सोई हुई रही।
4. इयहां पर एक और महत्वपूर्ण सवाल मील पर ही पैदा हो रहा है। मील साहेब ने अपने अतिक्रमण के आरोप को असत्य बतलाते हुए जांच की मांग की है। लेकिन उन्होंने अतिक्रमणों को तुरंत तुड़वाने का नहीं लिखा। अगर अतिक्रमणों को तुड़वाने का लिखा होता तो वह पत्र सराहा जाता और उससे मील की शक्ति ही बनती। राष्ट्रीय उच्च मार्ग पर केवल आवासीय अतिक्रमण नहीं हैं जिनके पट्टे जारी किए जा सकें, इंदिरा सर्किल से मानकसर तक करोडों रूपयों के व्यावसायिक शो रूम बने हुए हैं। व्यावसायिक जगह का नियमन करने का कोई प्रावधान नहीं है। इसके अलावा जिनके नाम से अतिक्रमण दिखलाए गए वे लोग वहां रहते भी नहीं थे। उनकी रिहायश अन्यत्र रही और केवल चार दीवारियों को सर्वे में अतिक्रमण माना गया।
इसमें सबसे महत्वपूर्ण वह रिपोर्ट है आखिर किस तरह से अतिक्रमण माने गए या लिखे गए? वह रिपोर्ट कोई एक दो पेज की नहीं होगी। इसका पूरा खुलासा होना चाहिए।

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