गुरुवार, 2 जनवरी 2020

सुंदरता को जी भर चूमा धूप ने-काव्य शब्द- करणीदानसिंह राजपूत


धूप खिली और सुंदरता मुस्कुराई,
धूप में छत पर घूमी आनंदित हुई
धूप को भी मौका मिला छूने का,
और धूप ने सारे तन को चूम लिया।
सुंदरता के कपोल लाल सुर्ख हुए
धूप के स्पर्श से मन खिला
होंठ प्रेम गीत गुनगुनाने लगे
गौरे गौरे पैर नाचने लगे।
सुंदरता के मन में कुछ कुछ
होने लगा कि उनके नयन भी
निहारलें सिर से पांव तक,
रसपान रूप का करलें
जितना चाहे जी भर कर।
धूप ने जी भर चूमा,
वे भी आलिंगन करलें जी भर कर।
मैं नहीं झिझकूंगी नहीं शर्माउंगी,
वे झिझके रुक गए तो
आगे बढ मैं कर लूंगी आलिंगन
ऐसी धूप फिर न जाने कब खिले।
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काव्य शब्द- करणीदानसिंह राजपूत,
सूरतगढ़.
94143 81356.
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