गुरुवार, 4 अगस्त 2016

ये राजे ये मोदी कल न होंगे,पत्रकार रहेंगे पत्रकारिता रहेगी: करणीदानसिंह राजपूत:


विज्ञापन बंद करना आपातकाल जैसा:राजस्थान पत्रिका में गुलाब कोठारी का मुखपृष्ठ लेख:
 
- करणीदानसिंह राजपूत -
देश भर में स्वतंत्रता दिवस समारोह मनाए जाने की तैयारियों की बैठकें चल रही है और इसी दौरान स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त से ठीक 11 दिन पूर्व आज 4 अगस्त को राजस्थान पत्रिका के मुखपृष्ठ पर विज्ञापन बंद कर आपातकाल जैसे हालात पैदा किए जाने का सारगर्भित लेख छपा है। 

लेख की एक एक पंक्ति पर ध्यान दिया जाए तो सच्च में लगता है कि आपातकाल और अब की जा रही कार्यवाहियों में कोई अंतर नहीं लगता। कांग्रेस राज में प्रधानमंत्री इंदिरागांधी ने 1975 में आपातकाल लगवाया और जनता की अभिव्यक्ति पर रोक लगाई। अब देश में भाजपा का राज है व कुछ प्रदेशों में भी भाजपा का राज है,जहां के सत्तानशीन गलत सलत कुछ भी करते रहें। बस अखबारों में वह सब नहीं छपना चाहिए और उनकी स्तुति ही छापी जानी चाहिए। यह भाजपा का अघोषित आपातकाल है।
राजनैतिक दल और नेता जब सत्ताविहीन होते हैं तब अखबार और उनके संपादक संवाददाता पत्रकार बड़े अच्छे मित्र से परिजन से लगते हें और सत्ता मिलने के बाद यही मित्र व परिजन आसपास गंदगी फैलने फैलाने की खबरें छापने लगते हैं तब खारे और दुश्मन सरीखे हो जाते हैं।
दुश्मन को तो सीधा कर नहीं पाएं मगर अखबार वालों को सीधा करने के लिए उसको दिए जाने वाले विज्ञापन जरूर बंद कर देते हैं। हालांकि विज्ञापन में सरकार की ही पब्लिसिटी होती है और अखबार से सस्ता कोई साधन नहीं है जो सरकार की बात आम जनता तक पहुंचा सके। सरकार को खुद को नुकसान होता है मगर फिर भी कुछ चापलूसों के कारण ऐसे घिन आने वाले कदम उठाए जाते रहे हैं।
राजस्थान पत्रिका ने विज्ञापन बंद किए जाने का छाप दिया और लाखों लोगों ने पढ़ भी लिया लेकिन सरकार की विज्ञापन नीति छोटे साप्ताहिक पाक्षिक अखबारों के लिए भी घातक बन गई है।
भारत सरकार व राजस्थान सरकार दोनों ही मंझले,लघु व साप्ताहिक पाक्षिक अखबारों के लिए दानवी रूप लिए हुए हैं। किसी भी अखबार वाले से जानकारी ले लें वह यही कहता हुआ मिलता है कि विज्ञापन बहुत कम हो गए हैं तथा भुगतान भी देरी से मिलता है। कुछ खास पर्वों के विज्ञापन भी एक बार रोक दिए गए थे। महापुरूषों की जयंतियों आदि वाले विज्ञापन तो बिल्कुल ही बंद कर दिए गए हैं। अखबार गड़बड़ी करे फर्जीवाड़ा करे तो उसकी जाँच करवाने में किसी की भी मनाही नहीं हो सकती और न प्रशासन जाँच कराने से रूकता है,लेकिन आजकल तो सभी को विज्ञापन बंद कर या कम करके सीधा करने में सरकारें लगी है।
मोदी जी ने तो अपने विदेशी दौरों में पत्रकारों को लेजाना तक बंद कर दिया। जो पत्रकार जाना चाहें वे अपने खर्च पर जाऐं। वाह। मोदी जी ने माना कि पत्रकार विदेशी दौरों में तफरी मौज मस्ती के लिए जाते हैं। विदेशी दौरों की समीक्षा पत्रकार करते रहे हैं वैसी समीक्षा सरकार के अधिकारी नहीं कर सकते।
सरकारों को जो कार्य करने चाहिए वे तो कर नहीं रही,उल्टे मार्ग पर चल पड़ी हैं तथा इस प्रकार की नीति से जनता से दूर जा रही है। अखबार सरकार और जनता के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करते हैं। ऐसा नहीं है कि सरकारें समझती नहीं है। राजे भी समझती हैं और मोदी भी समझते हैं,लेकिन राजहठ है।
मैं एक महत्वपूर्ण प्रमाण यहां पर देना चाहता हूं। लाला जगत नारायण जैसा सादगीपूर्ण जीवन वाला व संपूर्ण पत्रकार देश को मिलना मुश्किल है। उनके और पंजाब सरकार के बीच में ऐसा ही विवाद शुरू हुआ। पंजाब केसरी में सरकार के गलत कार्यों की नीतियों की आलोचना होती थी। पंजाब सरकार ने उनकी प्रेस की बिजली काट दी। लालाजी अपनी लगन के पक्के थे। पे्रस में एक ट्रेकटर लाया गया और उससे प्रेस चलाई गई। अखबार रूका नहीं अखबार झुका नहीं। एक इतिहास बन गया जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। राजस्थान पत्रिका भी न झुकेगा न रूकेगा।
प्रजातंत्र में यह तो हो नहीं सकता कि सरकारें गलत करें और उसकी खबर भी न छपे,आलोचना भी न हो।
सरकारों की रीति नीति के कारण जनता में न तो राजे की छवि बरकरार है और न मोदी की छवि बरकरार है। यहां पर मैं एक तथ्य की ओर भी ध्यान दिलवाना चाहता हूं कि केवल मोदी व राजे ही नहीं हरेक जगह स्थानीय स्तर पर भी हालात खराब हैं। स्थानीय संवाददाता अपने स्थानीय संबंधों के कारण स्थानीय भ्रष्टाचारों पर लिखने से परहेज करते हैं जब सब कुछ जनता देख रही है तब वह छापा जाना चाहिए। ऐसे निर्देश स्थानीय संवाददाताओं को दिए जाने चाहिए कि सामने आ रहे भ्रष्टाचार और कूनीति को किसी भी हालत में न रोंके न दबाने की कोशिश करें।
देश में प्रजातंत्र को जीवित रखने के लिए पत्रकारिता को स्वतंत्र व दबावमुक्त रखना आवश्यक है।


- करणीदानसिंह राजपूत,
पत्रकार,
सूरतगढ़।
94143 81356.

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