Tuesday, May 31, 2016

तम्बाकु से मुंह, जीभ, होठ, गला, फेफडों के साथ अन्य अंगो मे भी केंसर का खतरा

श्रीगंगानगर, 31 मई। अन्तर्राष्ट्रीय तम्बाकु निषेध दिवस के अवसर पर जिला पुलिस अधीक्षक श्री राहुल कोटकी के निर्देशानुसार पुलिस थाना करणपुर के माध्यम से पंचायती धर्मशाला श्री करणपुर मे नशा मुक्ति शिविर का आयोजन किया गया। 
मुख्य वक्ता के रुप मे राजकीय नशा मुक्ति परामर्श एवम उपचार केन्द्र के प्रभारी डा. रविकान्त गोयल ने कहा कि तम्बाकु का सेवन चाहे धुम्रपान के रुप बीडी, सिगरेट, हुक्का या खाने चबाने के रुप जर्दा गुटखा, खैनी इत्यादी हर रुप मे स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध होता है। तम्बाकु के सेवन ने मुंह, जीभ, होठ, गला, फेफडों के साथ-साथ शरीर के अन्य अंगो मे भी केंसर का खतरा तेजी से बढता है, जो कि मनुष्य की मौत का कारण होता है। तम्बाकु के सेवन से हाथो, पैरो की नाड़ियों मे खून का दौरा कम हो जाता है, जिससे बरगर रोग हो जाता है, हार्ट अटेक की संभावनाएं भी काफी हद तक बढ जाती है। 

Sunday, May 29, 2016

क्या कांग्रेस गैरगांधीवादी थर्मल रेलमार्ग,पानी स्टोरेज बंद करने में साथ देगी?



गंगाजल मील,पृथ्वीराज मील व कांग्रेस पार्टी गैर गांधीवादी वाले इन कदमों में साथ है या नहीं है?
क्या भाषण देने वाले स्थानीय बड़े नेता व दल खुद पहली पंक्ति में होंगे और इसकी सूची पहले तैयार कर जारी करेंगे?
थर्मल का रेलमार्ग और पानी स्टोरेज बंद करने की चेतावनी
- करणीदानसिंह राजपूत -

Thursday, May 26, 2016

पवन शर्मा को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले क्यों नहीं हुए गिरफ्तार?


सवालों में पुलिस-तीन खून चूंसने वाले फाइनेन्सरों को कब पकड़ेगी पुलिस?
7 दिन में गिरफ्तार करने का दिया गया था आश्वासन:
सूरतगढ़ 26 मई।
रेलवे के ठेकेदार सूरतगढ़ निवासी पवन शर्मा की लाश इंदिरागांधी नहर में 13 अप्रेल को मिली और उसके कपड़ों में मिला था सुसाइड नोट। सुसाइड नोट में पावन शर्मा ने 3 लोगों के नाम दिए जिन्होंने उसे फाइनेन्स तो किया मगर इतना सूद वसूलते रहे कि उसे आत्महत्या को मजबूर होना पड़ा। राजियासर थाने में यह प्रकरण दर्ज हुआ। परिवार जनों व अन्य लोगों ने पुलिस उप अधीक्षक कार्यालय के आगे 14 अप्रेल को धरना लगाया। किसी तरह से धरना उठवाया गया। जब पुलिस ने आरोपितों की गिरफ्तारी नहीं की तब पुलिस उप अधीक्षक कार्यालय के आगे चेतावनी देकर धरना शुरू किया गया। कई दिनों के बाद पुलिस ने आश्वासन दिया कि सात दिन में आरोपितों को पकड़ लिया जाएगा लेकिन डेढ़ माह हो गया अभी तक एक भी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया जा सका।
पुलिस सवालों के घेरे में है कि आखिर आरोपित अभी तक क्यों नहीं पकड़े जा सके?

Thursday, May 19, 2016

रामचन्द्र पोटलिया एसडीएम सूरतगढ़ की कुर्सी पर पुन: विराजमान:


सरकार के 6 मई के तबादला एपीओ आदेश पर 18 मई को स्थगन:
स्पेशल रिपोर्ट- करणीदानसिंह राजपूत
सूरतगढ़ 19 मई 2016.
राजस्थान सरकार के स्थानान्तरण आदेश को उच्च न्यायालय की ओर से स्थगित कर दिए जाने के बाद रामचन्द्र पोटलिया एसडीएम के पद पर पुन: विराजमान हो गए। पोटलिया ने आज एसडीएम पद पर रिज्यूम किया। उच्च न्यायालय के आदेश की प्रति व कार्यभार ग्रहण किए जाने की रिपोर्टंे तत्काल ही श्रीगंगानगर जिला कलक्टर कार्यालय मेल कर भेज दी गई। पोटलिया ने कार्यभार ग्रहण करने के बाद कुछ पत्रावलियों का निपटारा किया। 


Tuesday, May 17, 2016

थर्मल की रेल लाइन बंद का प्रयास आत्मघाती न हो जाए:सोचे आंदोलनकारी:


ऐटा सिंगरासर माइनर आँदोलन जाट आरक्षण व गुर्जर आरक्षण आँदोलन जैसा नहीं है और न बनाया जा सकता है:
सरकारी कार्यवाही का इंतजार करते हुए सुलह का रास्ता अभी खुला है:
- करणीदानसिंह राजपूत -
सूरतगढ़ 17 मई 2016.
ऐटा सिंगरासर माइनर आँदोलनकारियों की समिति ने 26 मई को सूरतगढ़ थर्मल पावर स्टेशन की कोयला पहुंचाने वाली रेल लाइन को जाम करने व थर्मल में पहुंचने वाले पानी को रोकने की चेतावनी दी हुई है। आँदोलनकारियों के दिमाग में संभवत: यह बात है कि थर्मल का कोयला पानी बंद कर देने से सफलता मिल जाएगी जैसे आरक्षण आँदोलन में जाटों व गुर्जरों को रेल मार्ग जाम करने से मिली थी। नेताओं के भाषण ग्रामीणों को गुमराह करने वाले रहेंगे। ऐटा सिंगरासर माइनर आँदोलन जाट आरक्षण व गुर्जर आरक्षण आँदोलन जैसा नहीं है और इस आँदोलन को वैसा बनाया भी नहीं जा सकता। जाट आरक्षण आँदोलन व गुर्जर आरक्षण आँदोलन में जातिगत बल था और उनका प्रभाव कोई दो चार दिन में पैदा नहीं हुआ था। उन दोनों आंदोलनों में संख्या बल को देखना भी जरूरी है। ऐटा सिंगरासर माइनर आँदोलन में संख्याबल अभी तक प्रभावी दिखाई नहीं दिया है। सभी 54 ग्रामों की औसत से जनसंख्या मानें तो करीब 54 हजार तो होगी। इनमें बच्चे और बुड्ढे आधे तो जरूर होंगे जो सभाओं में नहीं पहुंच सकते।
अभी तक सभाओं में अधिकत्तम भीड़ पाँच हजार के लगभग रही है। इससे कुछ अधिक भी मान लें तो भी मानव बल इतना नहीं पहुंचा। थर्मल गेट का महापड़ाव की घोषणा,थर्मल कूच की घोषणा,सूरतगढ़ उपखंड कार्यालय के घेराव की घोषणा और पल्लू में मेघा हाईवे जाम की घोषणा में से एक भी पूरी नहीं हुई।
आँदोलनकारियों ने जो धमकियां या चेतावनियां दी थी वे पूरी क्यों नहीं हो पाई? इसकी समीक्षा की जानी चाहिए थी लेकिन समीक्षा में अपनी समस्त शक्तियों का भी मालूम पड़ता है और समस्त कमजोरियों का भी मालूम पड़ता है।
आरक्षण आँदोलनों में ललकारने औा वार्ता करने के निर्णय एक दो नेताओं के हाथ में रहे हैं लेकिन ऐटा सिंगरासर माइनर आँदोलन में कई नेता हैं जो विभिन्न राजनैतिक दलों के हैं। सभी नेताओं के भाषण और भूमिकाएं तथा प्रत्येक नेता द्वारा जुटाई गई भीड़ का आकलन करना चाहिए।
कई असलीयतें हैं जिनको देखा परखा जाना चाहिए था जो अब तक नहीं हुआ। लेकिन एक सच्च यह भी है कि यह कार्य कौन करे? आँदोलन में भाग लेने वाले नेताओं दिल एक नहीं है। आँदोलन में भाषण देने वाले नेता इलाके के कम हैं और बाहर से पहुंचे नेताओं के भाषण तो गरमागरम रहे मगर वे भीड़ कहां से लाते? औसत एक ग्राम से 100 आदमी ही रहे यानि कि अधिकत्तम भीड़ पांच छह हजार। एक बात और विचारणीय है कि 54 ग्रामों में सभी किसान नहीं होंगे और सभी के पास में जमीनें भी नहीं होंगी। तब अन्य कार्य करने वाले इस आँदोलन में सीधे कैसे और क्यों जुड़ जाऐंगे? उनको सीधे रूप में क्या लाभ होगा? वे लोग भी सोचते तो होंगे। बाहर से पहुंचे नेताओं के भरोसे कोई कदम उठ गया तो भविष्य में किसके पीछे लगेंगे। ग्राम का आदमी यह जरूर सोचता है और जुडऩे से पहले हजार बार सोचता है।
इसी सोच विचार में सभाओं में और चेतावनियों के पूरा करने में लोग हिचकिचाए हुए रहे और कुछ पूर्व के नेताओं व सत्ताधारियों के कार्यकाल में जो कुछ होता रहा,उस पर विचार करते रहे।
ऐटा सिंगरासर माइनर की मांग जायज है। सभी नेता कह रहे हैं और सरकार के मंत्री विधायक भी कह रहे हैं। सुलह समझौतों के अवसर आते रहे हैं जो बंद नहीं हुए हैं।
थर्मल का कोयला रेल मार्ग जाम करना और पानी बंद करने की चेतावनी का पूरा होना असंभव लग रहा है जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है कि इस आँदोलन को आरक्षण आँदोलन जैसा समझने की भूल हो रही है।
इस चेतावनी के पीछे की गंभीरता को नेताओं ने समझा नहीं है कि इसके आगे के परिणाम क्या हो सकते हैं?
नागरिक प्रशासन और पुलिस प्रशासन ने थर्मल प्रशासन से वार्ता कर सभी प्रकार की रिपार्टें लेकर सुरक्षा प्रबंध शुरू कर दिए हैं।
26 मई के लिए जो डर है वह भयानक है। ऐसा नहीं है कि यह पंक्तियां आँदोलनकारियों में भय पैदा करने के लिए लिखी जा रही हो।
कानौर हैड और पल्लू में भीड़ की ओर से कुछ भी हुआ हो पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा जिसे कानूनी भाषा में चाहे हल्का बल प्रयोग कहें चाहे तीतर बीतर करना कहें। पुलिस ने पीछा किया और लोग भागे जिधर जगह मिली। रेल लाइन को जाम करने पानी को बंद करने जैसे कदम उठाते ही अगर पुलिस बल का इस्तेमाल होगा तक भीड़ जहां जगह मिलेगी उधर भागेगी। इस मौसम में जहां पारा 48 डिग्री के करीब चल रहा है और आसपास केवल रेत के टिब्बे हैं। वहां पर जो जंगल में भाग निकलेंगे उनका क्या हाल होगा? भयानक गर्मी और लू में पांच दस मिनट रेत में भागते हुए निकालना मुश्किल होगा। आँदोलनकारियों के उकसावे की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता और पुलिस कार्यवाही से भी इन्कार नहीं किया जा सकता और इस प्रकार की कोई घटना हो जाने से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। अगर इस प्रकार की कोई घटना हो गई तब किसे दोष दिया जाएगा?
जैसे नेता बाहर से पहुंचे हुए हैं वेसे ही प्रशासनिक व पुलिस अधिकारी भी बाहर के हैं और अपनी अपनी अवधि पूर्ण कर इलाके से तबादले पर चले जाऐंगे।
इस रूह कांपने वाले डर के अलावा एक डर है मुकद्दमों का जो भी व्यक्ति फंसता है। उसे अपना मुकद्दमा खुद को ही खुद के ही धन से और समय से लडऩा पड़ता है। उसमें कोई नेता सहयोगी नहीं होता और कोई समिति भी सहयोगी नहीं होती। आजतक के मुकद्दमों में तो यही हुआ है और व्यक्ति पीड़ाएं सुनाने वाला हो जाता है। आजकल राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की धाराएं सबसे खतरनाक होती है और वह लगती है।
अभी 26 मई तक आँदोलनकारी लोग समिति नेता गंभीरता से सोच सकते हैं और निर्णय ले सकते हैं।
किसी आँदोलन में सुलह और समझौते को पीछे हटना नहीं माना जाता। जायज मांग के लिए भी बहुत सोच समझ कर सरकार से वार्ता करते हुए आगे बढ़ा जा सकता है। क्योंकि यह मांग तो सरकार के द्वारा ही पूरी की जाने वाली है इसलिए सरकारी प्रयास को एकदम से इन्कार करना भी समझदारी नहीं कही जा सकती।
आँदोलनकारियों की एक मांग है कि सरकार पहले 54 ग्रामों की भूमि को कमांड यानि कि सिंचित घोषित करदे। यह इलाके की भौगोलिक हालत की चप्पे चप्पे की खोज कराए बिना और पानी उपलब्धि के बिना संभव नहीं है। इसके लिए नियम बने हुए हैं।
यहां पर एक तथ्य रखना चाहता हूं कि इस मांग में 3 स्थानों पर लिफ्ट की बात चर्चा में आ रही है। पहले कोलायत क्षेत्र में 6 लिफ्टों की योजना थी जो सरकारों ने नहीं बनाई कि खर्च अधिक होगा व लाभ कम होगा। वे करीब पैंतीस चालीस साल बाद में जाकर शुरू हो पाई थी।
ऐटा सिंगरासर माइनर का मुद्दा सबसे पहले उठाने वाले राजेन्द्रसिंह भादू इस समय विधायक हैं और वे बार बार कह चुके हैं कि सरकार प्रास कर रही है। पूर्व राज्यमंत्री रामप्रताप कासनिया भी आँदोलनकारियों के बीच में ठुकराना पड़ाव में पहुंचे हैं तथा मांग को जायज बतलाया है। अब सभी प्रकार की संभावनाओं पर विचार कर सभी प्रकार के लाभ हानि की बातें भी सोचते हुए कार्य करना चाहिए।
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Monday, May 16, 2016

वसुंधरा की दारू बेचती सरकार:नहीं सुनती पानी का हाहाकार: पुतलों साथ दारू फूंक दो



54 ग्रामों में 19 मई को सीएम के पुतले फूंके जाने का आह्वान है:
- करणीदानसिंह राजपूत -
सूरतगढ़, 16 मई 2016.
इंदिरागांधी नहर से ऐटा सिंगरासर माइनर निर्माण की मांग कर रहे आँदोलनकारियों की संघर्ष समिति की ओर से 19 मई को सभी 54 ग्रामों में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पुतले फूंकने की घोषणा की हुई है। समस्त राजस्थान में पानी के लिए हाहाकार मचा है। पानी के लिए लोग तरस रहे हैं। पीने को पानी नहीं मिल रहा है मगर गांव गांव ढाणी ढाणी तक दारू मिलने में कोई संकट परेशानी नहीं है। सरकार पानी नहीं पहुंचा सकती लेकिन दारू हर जगह पहुंचा रही है। राजस्थान में कई स्थानों पर दारू का विरोध हो रहा है।
दारू पीकर अपना स्वास्थ्य नष्ट करना,परिवार का विकास ठुकराना और सरकार की तिजोरी भरने से कोई लाभ नहीं। जो पानी नहीं पिला सकती उस सरकार का खजाना भरना मूर्खता ही है।
ऐटा सिंगरासर माइनर के आँदोलनकारियों ने 54 ग्रामों में वसुंधरा के पुतले फूंकने की घोषणा की हुई है वहीं पर केवल इतना ही करना है कि पुतलों के साथ में दारू को भी फूंक दिया जाए और आगे न पीने की सौगंध भी खाई जाए।
सूरतगढ़ के पूर्व विधायक गुरूशरण छाबड़ा ने दारू बंद करवाने के लिए आमरण अनशन करते हुए अपने प्राण 3 नवम्बर 2015 को त्याग दिए थे और अपनी देह चिकित्सालय को दान करदी थी। उनकी पुत्र वधुएं पूजा छाबड़ा व पूनम छाबड़ा शराबबंदी का आँदोलन चलाने में लगी हुई हैं।
बिहार में दारू बंद कर दी गई है और वहां अपराधों में कमी आ गई है।
दारू बंद करने का संकल्प लेंगे तो हर सफलता मिलेगी।



देश का असली हकदार कौन? 25 वर्ष पहले गंगा में छपा:आज भी यह सवाल जिंदा है- प्रस्तुतकर्ता- करणीदानसिंह राजपूत:


यह लेख दिल्ली से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका गंगा में जून 1987 में प्रकाशित हुआ था। 

लेख में जो सवाल यानि कि प्रश्र थे वे आज भी उसी हालत में पड़े हैं। संपूर्ण देश को लूटने वाले अधिक प्रभावशाली ही हुए हैं। यह पत्रिका मेरे रिकार्ड में थी। प्रबुध पाठकों के लिए यह महत्वपूर्ण लेख प्रस्तुत किया जा रहा है। इसे पढ़ कर तथा अन्य को बता कर पढ़ा कर इस पर चर्चा और गोष्ठियां आयोजित कराने का कार्य शुरू किया जा सकता है। सच तो यह है कि उस समय भी इस विषय पर देश में गोष्ठियां आयोजित हुई थी और जन मानस को जगाने वाले विचार आते रहे थे। इतने वर्षों के बाद दूसरी तीसरी पीढ़ी के नौ जवान और नवयुवतियां आ चुके हैं। उनको तो इस सवाल पर दिन रात एक कर देना चाहिए। वैसे यह विषय हर उम्र के लोगों के लिए है और उनको सजगता से यह सवाल उठाना ही नहीं चाहिए बल्कि असली हकदार को देश मिले इस का पूरा प्रयास करना चाहिए।
up date 16-5-1016

वसुंधरा के भतूळिये के बाद देखना:उड़े हुए नेता कोई झाड़ में कोई नाल में गिरे मिलेंगे:



सामयिक टिप्पणी- करदानसिंह राजपूत:

वसुंधरा राजे की सुराज संकल्प यात्रा ने राजस्थान के मरणासन्न भाजपा नेताओं में जान डाल दी  और कल्याण भूमि की ओर जाता हुआ मरता मरता नेता भी एक बार अंतिम ईच्छा में विधायक बनने के लिए टिकट मांगने को आतुर हो उठा । बस कैसे भी हो। एक बार टिकट मिल जाए। टिकट मांगने वालों के हर जगह टोले बन गए ।

वसुंधरा के नजदीक से नजदीक दिखलाने को सब कुछ करने को तैयार होते हुए सबने अपनी अपनी अंटी ढ़ीली कर लाखों लाखों रूपए लगा दिए । बड़े बड़े होर्डिंग्स,बैनर,फ्लैक्स बोर्ड,अखबारों में रंगीन विज्ञापन। शहर और कस्बे सब भरे कोई सडक़ कोई चौराहा खाली नहीं बचा।

     सब में नेता की फोटो वसुंधरा की फोटो के साथ साथ। कोई वसुंधरा की यात्रा को आंधी बतला रहा  तो कोई तूफान बतला रहा ।

वसुंधरा की  यात्रा को नेता आंधी और तूफान बतला रहे ,ना जाने इसके बाद क्या क्या हो जाएगा?

मैं इस आंधी और तूफान को भतूळिया बतला रहा हूं। रेगिस्तान में रहने वाला हर नर नारी बालक बालिका जानता है कि भतूळिया क्या होता है? किसे कहते हैं भतूळिया? गर्मियों में ऊंची ऊंची रेत की बहुत तेज गति से घूमती आकाश छूती धूल भरी चोटी सी दिखाई देती है और आसपास से निकलती है तो उसके घेरे में कागज पत्तर कपड़े और सामान तक उड़ कर दूर दूर जा गिरते हैं। ये सामान उड़ते हुए दिखलाई भी पड़ते हैं। हम सभी ये नजारे देखते हैं। भतूळिये में उड़ा सामान बाद में दूर दूर किसी झाड़ में अटका हुआ या कांटों में फंसा हुआ मिलता है या फिर किसी खड्डे नाले या खाळ में गिरा हुआ मिलता है। किस बदसूरती में मिलता है,उसका वर्णन मैं यहां नहीं करता। कारण कि आगे बात नेताऔ की है और  जो दशा

नेताओं होने वाली है। वो छिपाए तो भी छिपने वाली नहीं होगी।

वसुंधरा के भतूळिये में जो ये नेता उड़ रहे हैं। बड़ी शान समझ रहे हैं। इतरा रहे हैं। किसी को कुछ समझना नहीं चाहते। बस एक ही ध्येय है कि वसुंधरा राजे एक बार देखले। एक बार निहार ले। किसने कितनी मेहनत की है। वसुंधरा राजे के राज को वापस लाने के लिए। बस जैसे तैसे टिकट मिल जाए। यात्रा के प्रभारियों की जी हजूरी करके जैसे तैसे भतूळिये में उड़ जाएं। बस भगवान यह ईच्छा पूरी करदे। वसुंधरा के भतूळिये में उड़ा दे। बस उड़ता हुआ लोग देखलें।

नेता लगे हुए हैं। उडऩे दो नेताओं को। करने दो ईच्छा पूरी। भतूळिया समझदार है और पूरा समझदार। यह मैं लिख रहा हूं कि भतूळिया समझदार है। वो किसको कहां गिराना है। वहीं गिराएगा। किसको झाड़ में गिराना है। किसको नाळे में गिराना है। किसको खाळे में गिराना है।बस भतूळिया निकल जाए तब देख लेना कौन कौन कहां कहां गिरा हुआ मिलता है। बस। मेरा एक निवेदन है। किसी कि हालत पर हंसना मत।

कौन कौन कहां कहां गिरा हुआ है।

 

update 16-5-2016


सुराज लाऐंगे:सुरा राज लाए। राजस्थान में वसुंधरा का सुराज संकल्प ऐसा निभाया:


= करणीदानसिंह राजपूत =

वसुंधरा राजे ने राजस्थान की जनता को वचन दिया था कि राज्य में सुराज की स्थापना की जाएगी। इसके लिए विधानसभा चुनाव 2013 से पूर्व प्रदेश में सुराज संकल्प यात्राएं निकाली गई। भयानक गर्मी में भूखे प्यासे रह कर प्रदेश की जनता ने आम सभाओं में पहुंच कर वसुंधरा राजे को सुना और विश्वास करते हुए सत्ता में बदलाव किया जिससे भारतीय जनता पार्टी का वसुंधरा राजे का राज कायम हुआ। राज भी ऐसा कायम किया ऐसी जीत दी जो इतिहास में एक मिसाल रहेगी।
मगर जनता ने जो विश्वास किया उसे क्या मिला?
वादा किया गया था सुराज लाने का,लेकिन सुराज के बदले सुरा राज थोप दिया। अब संपूर्ण प्रदेश में जगह जगह से दारू ठेके की दुकानें  बंद कराने और बस्ती से बाहर किए जानें की मागें उठ रही है। महिलाओं के आंदोलन हो रहे हैं। बस्तियों में से औरतों का लड़कियों का गुजरना मुश्किल हो रहा है।
सुराज तो तभी स्थापित हो सकता है जब दारू नशा बंद किया जाए। लेकिन दारू बंद कराने के बजाय घनी बस्तियों में,शिक्षण सस्थाओं के पास,धार्मिक स्थलों के पास और राष्ट्रीय उच्च मार्गों के पास में खोल दिए गए। इनका विरोध बढ़ रहा है।
कितनी दुर्भाग्र्यपूर्ण हालत है कि एक महिला के राज मे महिलाओं को दारू ठेकों को हटाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। 
दारू ठेकों के लिए नियम बने हुए हैं। तब आबकारी अधिकारियों ने जगहों की स्वीकृति देते हुए ध्यान क्यों नहीं रखा? असल में ऐसे अधिकारियों के विरूद्ध भी कार्यवाही की जानी चाहिए।
भारतीय जनता पार्टी राम राज्य लाने का वादा करती है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ उसे संरक्षण प्रदान करता है। तो ऐसा क्यों हो रहा है?
सुराज तो तभी माना जाता है जहां अपराध ना हों। मगर दारू होगी तो अपराध भी होंगे। यह निश्चित है। दारू तो अपराधों की जननी मानी जाती है।
राजस्थान को गुजरात जैसा बनाना चाहते हैं तो दारू बंद होनी ही चाहिए। गुजरात में दारू बंद है। वहां भाजपा की नरेन्द्र मोदी सरकार दारू की आय के बिना चल रही है। गुजरात की उन्नति और विकास के कसीदे काढ़े जा रहे हैं, तब राजस्थान में दारू बंद करके  सरकार क्यों नहीं चलाई जा सकती?
पूर्व विधायक गुरूशरण छाबड़ा जयपुर में 1 अप्रेल 2014 से आमरण अनशन पर हैं। उनकी मांग है राजस्थान में संपूर्ण शराब बंदी लागू की जाए। उनका यह अनशन राजकीय चिकित्सालय एसएमएस के गहन चिकित्सा इकाई में भी जारी है।
राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार ने इतने दिन बाद भी कोई ध्यान तक नहीं दिया है।

राजस्थान में पानी नहीं मिल सकता मगर दारू हर स्थान पर उपलब्ध है। भाजपा का यह सुराज है और संघ की यह कैसी नजर है?
पानी के लिए लोग तरस रहे हैं तथा हाहाकार मचा है।

6-5-2014
up date 16-5-2016
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सीएम वसुंधरा पीएम मोदी का अच्छे दिनों की उम्मीद में पुष्पगुच्छ भेंट:


वसुंधरा अब कैसे करेगी न्याय जो लोगों को लगे एकदम सही:


टिप्पणी- करणीदानसिंह राजपूत
समय बड़ा बलवान। पल में चाहे सो करदे। राजा को रंक और रंक को राजा बनादे। काल का चक्र एक पल के लिए भी नहीं रूकता। मानव उम्मीदों पर जीता है लेकिन कहते हैं कि उम्मीदों पर संकट आता है तो आगे होने वाले हालात का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अच्छे दिनों की उम्मीदों में प्रसन्नता से मुस्कुराते हुए पुष्प गुच्छों को भेंट किया था।



अच्छे दिनों में कोई कमी भी नहीं थी कि एक चींटी जैसे भगोड़े ललित मोदी के नाम ने हाथियों को बेचैन कर दिया। अब क्या होगा और कब होगा?
तुरंत होगा या एक बार आँधी के शांत होने के बाद कुछ होगा ताकि जनता में संदेश दिया जाए कि विपक्ष के दबाव में कुछ भी नहीं किया गया है।
वसुंधरा राजे न्याय दरवाजे दरवाजे पर बांटने निकली थी और अब न्याय उनके ही दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया है।
देखें वसुधरा स्वयं कैसे कर पाती है न्याय? पुत्र मोह भी बीच में है।
पुराने समय में तो सत्यनिष्ठा के धनी राजा पल भर में न्याय कर देते थे और राज सिंहासन छोड़ कमंडल ले निकल जाते थे।
अभी तो चित्रों में देखें आगे क्या होगा?

20-6-2015
up date 16-5-2016




नरेन्द्र मोदी अब राजस्थान में शराब बंद कराओ

राजस्थान में संपूर्ण शराबबंदी की मांग को लेकर पूर्व विधायक गुरूशरण छाबड़ा ने फिर चेतावनी दी है।
इसके लिए
छाबड़ा ने 17 फरवरी 2014 को जयपुर में प्रेस वार्ता की है।
वहां से प्राप्त पूरी विज्ञप्ति महत्वपूर्ण है।
यहां दे रहे हैं।


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भाजपा की जीत का लाभ घर घर पहुंचाओ
टिप्पणी- करणीदानसिंह राजपूत

नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री और राजस्थान में वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री मानते हुए राजस्थान की जनता ने इतनी बड़ी जीत दी है कि उसकी कोई मिसाल अभी तक नहीं है। भाजपा की 162 सीटों पर विजय के बाद अपराध कम किए जाने की ओर पहला कदम यह उठाना होगा कि मोदी के गुजरात की तरह पूरे राज्य में संपूर्ण शराबबंदी लागू की जाए।
सूरतगढ़ के पूर्व विधायक गुरूशरण छाबड़ा ने राजस्थान में संपूर्ण शराब बंदी को लागू करने के लिए कानून बनाने की मांग के लिए अपने जीवन की परवाह नहीं करते हुए जयपुर में दो बार आमरण अनशन किया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उनसे बार बार भेंट कर कुछ बातें मानते हुए अनशन तो तुड़वा दिया था लेकिन राज्य में संपूर्ण शराबबंदी लागू नहीं की थी। छाबड़ा जी अनशन पर थे तब माननीय गुलाबचंद कटारिया व अनेक भाजपा व अन्य दलों के नेता व सामाजिक कार्यकर्ता भी मिलने जाते रहे थे। गुलाबचंद कटारिया जी उनकी मांग के साथ थे।
अब वक्त आ गया है कि राजस्थान में संपूर्ण शराबबंदी का कानून बनाकर लागू करवाया जाए।
राजस्थान में नरेन्द्र मोदी के नाम पर इतनी भारी जीत हुई है,इसलिए मोदी के गुजरात की तरह राजस्थान में भी शराबबंदी लागू की जाए और भाजपा की सरकार अपने 2014 के बजट में इसका प्रावधान करे तो सबसे पहला कदम अनुकरणीय होगा।
एक अनुकरण
एक महिला महात्मा गांधी के पास गई और कहा कि उसका लडक़ा गुड़ बहुत खाता है,लडक़े का गुड़ खाना छुड़वाईए।
गांधी जी ने कहा कि कुछ दिनों बाद आना।
महिला कुछ दिनों के बाद पुन: गांधी जी के पास अपने लडक़े को लेकर गई।
गांधी जी ने बड़े प्यार से उसे कहा कि बेटे गुड़ खाना छोड़ दो। लडक़े ने हांमी भरदी।
महिला ने कहा कि इतनी सी बात तो आप उसी दिन कह सकते थे ,जब पहली बार आई थी।
गांधी जी ने कहा कि उस समय मेरे में भी गुड़ खाने की आदत थी इसलिए बालक पर मेरी बात का असर नहीं होता।
यहां इस बात को प्रस्तुत करने का उद्देश्य यह है कि पहले भारतीय जनता पार्टी के जो पदाधिकारी नेता और कार्यकर्ता शराब पीते हैं,वे शराब छोड़ें और उनकी शराब छुड़वाई जाए। यह कार्य तत्काल ही लागू किया जाए ताकि आगामी बजट 2014 में संपूर्ण शराबबंदी कानून को प्रस्तुत किया जा सके।

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पूरी विज्ञप्ति महत्वपूर्ण है। यहां दे रहे हैं।


 19-2-2014
up date  16-5-2016



Saturday, May 14, 2016

पुलिस प्रशासन ने लाठीचार्ज कर आंदोलन को दबाने का प्रयास किया है~पृथ्वीराज मील


सूरतगढ़13~5~2016
 पूर्व जिला प्रमुख व कांग्रेस के युवा नेता पृथ्वीराज मील ने टिब्बा क्षेत्र की जीवनदायनी ऐटा-सिंगरासर माईनर की मांग को लेकर पिछले ढाई माह से आंदोलन कर रहे लोगों की उपेक्षा करने पर राज्य सरकार की निंदा की है। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन में दो बार पुलिस प्रशासन ने लाठीचार्ज कर आंदोलन को दबाने का प्रयास किया है। लेकिन टिब्बा क्षेत्र के धैर्यशील लोग किसी भी हालत में अपनी मांग पूरी होने तक पीछे नहीं हटेंगे। मील ने कहा कि आंदोलन में शामिल होने वाले कुछ युवाओं ने पल्लू में बैरिकेडस तोड़ दिए। जिसके चलते पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। पूर्व जिलाप्रमुख ने कहा है कि 70 दिनों से आंदोलन कर रहे ग्रामीणों की तरफ सरकार की ओर से कोई ध्यान नहीं देने पर लोगों में जबर्दस्त आक्रोश पनप रहा है। क्षेत्र के काश्तकारों ने फार्म, फायरिंग रैंज, छावनी, वायुसेना, थर्मल, इंदिरा गांधी नहर आदि बड़ी परियोजनाओं के लिए अपनी जमीन सरकार को दी है। ऐसे में यह हक भी बनता है कि इन परियोजनाओं का सबसे पहले लाभ स्थानीय लोगों को मिले। नहर के किनारे बैठे लोग पानी के लिए तरसते हो यह किसी भी रूप में उचित नहीं है। इसलिए जनाक्रोश को भडक़ने से रोकने के लिए सरकार अपनी हठधर्मिता छोडक़र टिब्बा क्षेत्र की वर्षों पुरानी जायज मांग को अतिशीघ्र पूरा करने की दिशा में कदम उठाएं।

Friday, May 13, 2016

सूरतगढ़ थर्मल कोयला रेललाइन जाम करने की चेतावनी:क्या होगा उस दिन?


ऐटा सिंगरासर माइनर मांग आँदोलनकारियों की घोषणा:
- करणीदानसिंह राजपूत -
इंदिरागांधी नहर से ऐटा सिंगरासर माइनर मांग कर रहे आँदोलनकारियों ने पल्लू में 12 मई को सरकार को चेतावनी दी है कि सूरतगढ़ थर्मल पावर स्टेशन को कोयला पहुंचाने वाली रेल लाइन को जाम कर दिया जाएगा। यह रेल लाइन बीरधवाल स्टेशन से थर्मल के भीतर तक है और आँदोलनकारियों के पड़ाव रहे ठुकराना ग्राम के नजदीक पड़ती है।

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Wednesday, May 4, 2016

राजस्थान के अधिस्वीकृत पत्रकारों के डिजीटल कार्ड:


जिला मुख्यालयों पर बनाए जाएं:
- करणीदानसिंह राजपूत -
सूरतगढ़ 4 मई 2016.
राजस्थान के अधिस्वीकृत पत्रकारों के डिजीटल प्रेस कार्ड जयपुर निदेशालय में बनाए जा रहे हैं जिसके लिए जिले के पीआरओ से प्रपत्र प्रमाणित करवा कर ले जाना अनिवार्य है।
यह कार्ड  बनाने में कोई बहुत बड़ी कार्यवाही नहीं है जो जिला मुख्यालय पर संभव नहीं हो। पत्रकारों ने अभी तक इसकी कोई मांग नहीं की है। मेरा मानना है कि यह कार्य जिला मुख्यालय पर किया जा सकता है। सोफ्टवेयर और कार्ड बनाने की छोटी सी मशीन है बाकी कम्प्यूटर आदि सभी जिला मुख्यालयों पर है।
यदि मशीन आदि जिला मुख्यालय पर अस्थाई शिविर में नहीं लगाई जा सकती तो प्रपत्र प्रमाणित कर तथा फोटो पीआरओ कार्यालय से ऑन लाइन जयपुर भेजी जा सकती है और वहां से कार्ड बनाए जाने के बाद जिला मुख्यालय पर भेजे जा सकते हैं।
आज आधुनिक संसाधनों के होते हुए केवल कार्ड के लिए जयपुर बुलाया जाना कितना उचित है यह विचार किया जाना चाहिए। प्रत्येक पत्रकार के एक बार आने जाने व जयपुर में ठहरने भोजन जलपान तथा वहां पर वाहनों आदि के हजारों रूपए का व्यय हो रहा है। इसके अलावा यह कार्ड अभी 31 दिसम्बर 2016 तक के बनाए जा रहे हैं और आगे के लिए पुन: जयपुर जाना होगा।

पत्रकार जो अभी इस प्रक्रिया से नहीं गुजरे हैं वे यह मांग कर सकते हैं।
मैं यह कार्ड 2 मई को जयपुर में बनवा कर लौटा हूं और मेरे जो विचार हैं वह लिख चुका हूं।
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Sunday, May 1, 2016

मजदूर नेताओं का संस्थानों के सेठों से गठजोड़ कौन तोड़े:


- करणीदानसिंह राजपूत -
मजदूर दिवस 1 मई को सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों में छुट्टी रहती है ताकि मजदूर कामगार इस दिन समारोह आयोजित कर सकें आपस में मिल कर अपनी बात सांझी कर सकें।
कई बार 1 मई को रविवार आ जाता है। सरकार और संस्थानों को अवकाश घोषित नहीं करना पड़ता। छुट्टी पर छुट्टी पड़ जाती है।
इस बार भी ऐसा ही हुआ है। रविवार के कोटे में मनाओ समारोह और करो मजदूर हित की बात।
मजदूरों के अनेक संगठन। राजनैतिक दलों की विचारधारा से बन गए संगठन। नेताओं के आपस में विचार न मिलने से बन गए कितने ही संगठन।
अब अधिकांश संगठन मजदूरों की बात नहीं करते वे अपने बड़े नेताजी की बात करते हैं या फिर संस्थान के मालिक सेठ की।
आज मजदूर अलग अलग है,संगठन अलग अलग है मगर यूनियनों के नेता और संस्थानों के मालिक एक हैं।
यह सच्च है लेकिन इस गठजोड़ को तोड़े कौन?
नेतागण तो चाहते हैं कि यह फूट बनी रहे।
मजदूर एक हो जाएगा तो उसकी ताकत को कोई तोड़ नहीं पाएगा।
पहले ताकत रही जिसके कारण समारोह होते जूलूस निकाले जाते और अखबारों में बड़े बड़े लेख छपते। कई अखबार परिशिष्ठ निकालते। मजदूरों की बातें छपती कहानियां छपती और परेशानियां छपती। बड़ी बड़ी संस्थानों के मालिक प्रबंधक भय खाते और कुछ छप जाता तो सुधार करते।
अब मजदूर दिवस पर कहां छपते हैं लेख और कौन निकालता है परिशिष्ठ।
यही कारण हालात उजागर करते हैं कि मजदूर समझें और एकता का निर्णय करें।



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