शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

विधायक गंगाजल मील जी के खाते में और जोड़ो शिला पूजन के वोट


गंगाजल मील

 बलराम वर्मा



टिप्पणी- करणीदानसिंह राजपूत

सूरतगढ़। विधायक गंगाजल मील के राज में खूब पत्थर लगाए गए और चुनाव आचार संहिता के लगने के चक्कर में आधे अधूरे निर्माणों पर भी पत्थर लगवा कर नाम दे दिया। शिला पूजन का। पहले पत्थर लगाए जाते थे कार्य शुरू किए जाते समय शिलान्यास के और उसके बाद लगाए जाते थे निर्माण पूरा होने पर उदघाटन के या लोकार्पण के। लेकिन चुनाव आचार संहिता के चक्कर में जब और कोई नाम नहीं सूझा तो पत्थर लगाने की भूख ने नया नाम दिया जो शिला पूजन के नाम से बोला गया लिखा गया। कितनी ही आलोचना करें। मील साहेब की सलाहकार परिषद के रत्नों में अक्ल तो है जो यह नाम सुझाया गया।

पत्थरों से वोटों की गिनती का आंकलन करें तो इन शिला पूजन के पत्थरों के वोट भी मील साहेब के खाते में जोड़ दें। हो सकता है कि पाठकों को यह पढ़ते हुए हँसी आए लेकिन एक एक करके भी कई बार काम बन जाता है। पिछले चुनाव में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष सी.पी.जोशी भाजपा प्रत्याशी से केवल 1 वोट से हार गए थे।

मील साहेब को टिकट मिल जाए तो पत्थरों के वोटों से शिला पूजन से इतनी घोषणा दावा तो किया ही जा सकता है कि मील साहेब की जमानत जब्त नहीं कराई जा सकती।

वैसे तो बलराम वर्मा ओबीसी के नाम पर टिकट का प्रबल दावेदार है और जयपुर दिल्ली के चक्कर मील साहेब से ज्यादा लगा चुका है। बलराम का बल पिछली बार तो काम नहीं कर पाया था,लेकिन इस बार कहते हैं कि बलराम वर्मा ने अपना वजन किया है जो पिछली बार से ज्यादा हुआ है। बलराम वर्मा का खुद का भी दावा है कि उनका वजन इस बार अधिक है।

चलते चलते एक बात लिख दी जाए कि जनता में स्वयं को वरिष्ठ साबित करने के लिए बलराम वर्मा अपने बाल सफेद रखने लगे हैं और गंगाजल मील अपने को जवान साबित करने के लिए बाल काले करने लगे हैं। देखते हैं कि पहले तो पार्टी के दंगल में कौन किसको चित्त करता है?

वैसे मील साहेब को खिलाडिय़ों से थोड़ी शिक्षा ले लेनी चाहिए थी। खिलाड़ी अपने चरम उत्कर्ष काल में मतलब शिखर काल में सन्यास ले लेता है ताकि बाद में हार होने का कोई खतरा ही नहीं रहे। लेकिन होनी को कोई टाल नहीं सकता। वे पहले दावा करते थे कि उनकी टिकट घर चल कर आएगी। फिर दावा किया कि आज वे खुद की ही नहीं तीन चार टिकटें दिलवाने की ताकत रखते हैं। अब वे इतनी ताकत के साथ टिकट लेने की लाइन में लगे हैं और उस लाइन में लगने से पहले आवेदन करना पड़ता है सो वह आवेदन भी किया है। घर आती टिकट में इतनी फाचरें और यह बलराम की एक और फाचर। लेकिन इतना तो मान कर चलना चाहिए कि बल्ले की फाचर वाचर से मील साहेब का कुछ भी बिगडऩे वाला नहीं है। इतने पत्थरों से और शिला पूजन से बढ़ी ताकत से टिकट तो मिल ही जानी चाहिए।


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