Monday, January 14, 2013

पुस्तक चर्चा: अतिमानव -चर्चाकार: करणीदानसिंह राजपूत






पुस्तक चर्चा:

अतिमानव


-चर्चाकार: करणीदानसिंह राजपूत

अति मानव के लिए काल की गणना कुछ भी नहीं होगी। वह जब चाहेगा अपनी सोच से ही एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर बिना किसी साधन के पहुंच सकेगा। मानव की उत्पति स्त्री पुरूष के संसर्ग से होती है,मगर अति मानव अपने विचार से ही दूसरे को जन्म दे देगा। अति मानव का जन्म उस लोक में हो चुका है जो लोगों से गुप्त है। एक बार में नहीं कितनी बार इसे ध्यान से पढऩे से ही आभास होगा कि अतिमानव बस आने ही वाला है।

तीर्थों के पवित्र सरोवरों में श्रद्धालु कितनी ही बार स्नान ध्यान करते हुए पानी में डुबकी लगाते हैं फिर भी मकर संक्रांति के पावन पर्व पर वही डुबकी और लगाने को तत्पर रहते हैं। कुछ पाने को। बस। यही हालत मेरी हुई है। अतिमानव पुस्तक कितनी ही बार बड़ी उत्सुकता से पढऩे के बावजूद आज मकर संक्रांति पर मैं इसमें एक बार फिर डुबकी लगाने के बाद इसकी चर्चा की शुरूआत कर रहा हूं। यह चर्चा भी इसलिए कि इसमें आध्यात्म,विज्ञान,धर्म के साथ मानवीयता को बहुत गहरे मनन चिंतन अनुभव से दार्शनिकता के स्वरूप में हजारों वर्षों के काल को समेटा हुआ है,जिन्हें हम सतयुग,त्रेता,द्वापर और कलयुग कहते हैं।प्रलय में पृथ्वी नष्ट हो जाएगी तब इस मानव जाति का क्या होगा? इतनी गर्म होती हुई जल जाएगी। तब? क्योंकि यह मानव हर युग में अपने स्वभाव से किसी की बात मानता नहीं। उस असीम शक्ति की भी नहीं मानता जिसने जन्म दिया। बस। यही गूढ़ रहस्य है इस पुस्तक में क्या होगा मानव का? पुस्तक एक जिज्ञासा उत्पन्न करती है कि मानव का विकसित स्वरूप अति मानव बन कर तैयार हो चुका है और वह स्वरूप खत्म नहीं होगा और वह अतिमानव अपने भाव से स्वभाव से मानव को अति मानव में बदल देगा। अति मानव के लिए काल की गणना कुछ भी नहीं होगी। वह जब चाहेगा अपनी सोच से ही एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर बिना किसी साधन के पहुंच सकेगा। मानव की उत्पति स्त्री पुरूष के संसर्ग से होती है,मगर अति मानव अपने विचार से ही दूसरे को जन्म दे देगा। अति मानव का जन्म उस लोक में हो चुका है जो लोगों से गुप्त है।

द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण को यह अहसास हो गया कि मानव समझाने से भी समझता नहीं है,सो आगे ऐसी प्रजाति होनी चाहिए जो केवल इशारे से ही समझ जाए। श्री कृष्ण का यह अनुभव आगे महर्षि अरविन्द की अंत:चेतना में उतरा और उन्होंने बहुत कुछ जानकर उसको नाम दिया अति मानव। अति मानव कैसा होगा? कैसा दिखाई देगा? काम कैसे करेगा?

अतिमानव पुस्तक में जो कुछ है वह लिखा नहीं गया। प्रख्यात दार्शनिक डा.छगन मोहता के पौत्र रविदत्त मोहता के मुंह से जो उच्चारित हुआ वह पुस्तक आकार में दर्शन का आभास देता आ गया। रविदत्त आचार्य अवधेशानन्द जी के शिष्य हैं,इसलिए उनके मंथन चिंतन में आध्यात्मिक बल प्रदर्शित होता है।
अति मानव पुस्तक में जो हे उसे कथा नहीं कह सकते। उसे कविता भी नहीं कह सकते। यह लेख भी नहीं है। ये सारे चिंतन हैं जो सरल शब्दों में बहुत गांभीर्य लिए हुए हैं। इन्हें जल्दी से समझ पाना आसान नहीं कहा जा सकता। मैं इस पुस्तक की समीक्षा करने के बजाय पुस्तक चर्चा करना चाहता हूं ,क्योंकि जो है उस पर आगे सालों तक चर्चा होगी और होती रहेगी। यह मेरा प्रबल विश्वास है।

मैंने आधी आधी रात के बाद तक इसको बार बार पढ़ा और पढ़ता गया। जो अहसास हुआ वह अलौकिक सा है।

मेरे आसपास धीमी धीमी हवा में एक महक सी उठी जो पहले कभी जानी हुई सी नहीं लगी। उसी के साथ ही एक सुरीली सी आवाज वातावरण में आई हुई नहीं लगी, लगा आवाज उतरी है ...तुम.. अति मानव की समीक्षा लिख पाओगे..मेरा मन बोल उठा तत्काल हां। उसी की तैयार में ही तो पुस्तक पढ़ रहा था। लेकिन आवाज फिर उतरी...सच्च..। आसपास कोई नहीं था। मेरे मुंह से निकला तुम कौन हो? उतर मिला...अति मानव।

मैंने आसपास फिर देखा और बोला लेकिन दिखाई क्यों नहीं दे रहे?....अभी वह काल नहीं आया।...और निस्तब्धता। बस,यही सच्च है कि यह जो  आप पढ़ रहे हैं। आप पुस्तक की समीक्षा मानेंगे और में इसे पुस्तक चर्चा कहता हूं जो निरंतर आगे से आगे बढ़ती रहेगी... और तब तक अतिमानव के सामने आने का काल आ जाएगा।

इस पुस्तक में नाना प्रकार का विचार मंथन है। यह पुस्तक सन् 2011 इसवी में प्रकाशित हो चुकी थी। इसमें बहुत सी बातें जो आज हो रही है,उन पर चिंतन शामिल है।

.....भगवान श्री कृष्ण ने धरती पर विष पैदा करने वाली समस्त बुराईयों को मारा,लेकिन शरीर मर गया और वे बुराईयां और अधिक विकृत रूप में विस्तृत रूप में सामने आ खड़ी हुई हैं। श्री कृष्ण अपनी बहन द्रौपदी को साड़ी पहनाने पहुंचे। उसी धरती पर घरों में और सरे राह बेटी के साथ बलात्कार होता है। क्यो? कुछ नहीं हुआ? महाभारत के युद्ध ने बलात्कारी को मार दिया लेकिन बलात्कार नहीं मार सका।

इस प्रकार के हालात के कारण ही वो अतिमानव  चेतना अंतरिक्ष से उतर आई है। उसका कार्य संपूर्ण ब्रह्मांड को ध्यान में रखते हुए होगा। उनके बारे में अभी आम जन नहीं जानते,मगर वे सब जानते हैं। उनका आना संक्रांति होगी।

अति मानव पुस्तक में विभिन्न प्रकार के कथन तथ्य भरे पड़े हैं,जिनको अलग अलग अध्याय में समझाया गया है।

शून्य अध्याय में बताया गया है अतिमानव का स्वभाव। विश्व चेतना अध्याय में आने वाले समय के खतरनाक संकेत हैं और साथ में ही अतिमानव के प्रगट होने की सूचना जैसी बातें। नित्य और निमित अवतार अध्याय में धरती की पुकार को माध्यम बनाते हुए धरती को अमृतलोक में बदल जाने के विचार हैं। युद्ध और बनवास अध्याय में काल के रूपान्तरण की व्याख्या है। एक ऐसी सत्ता का जो धरती पर प्रेम स्थापित करेगी।

प्रतिज्ञा और प्रतीक्षा अध्याय में बताया गया है कि जो ज्ञात है,उसी में सभी खोज करने में लगे हैं,जबकि खोज अज्ञात में की जानी चाहिए। सृजन समर्पण और समर्थन में महत्वपूर्ण तथ्य हे कि अंतरिक्ष में किसने करोड़ों करोड़ों ग्रहों को तारों को रोशन किया है? प्रणव प्रणाम परिणाम और प्रमाण में धार्मिक ग्रंथों को अकाल पुरूष की आत्म कथाएं बताया गया है।  चार युग अध्याय में बताया गया है कि चाहे कैसा भी विकट समय आ जाए, प्रभु का कार्य अवश्य ही करना चाहिए। चरण स्पर्श अध्याय में इसकी अपार महिमा और क्षमता बतलाई गई है।

    सुबह दोपहर शाम और रात, स्वाध्याय,गुरू अध्याय में आध्यात्मिकता का मनन है। राजनीति अध्याय में बताया गया है कि प्रजातंत्र के नाम पर एक परिवार की सत्ता को सारा देश भोग रहा है। प्राश्श्चात्य जगत की भोगतंत्र की बातें हैं। भारत के प्रजातंत्र पर गंभीर बात है कि.. बेटी बहु मां पत्नी कोई भी सुरक्षित नहीं है।

    ब्रह्म शब्द है, शब्द ब्रह्म नहीं,अंतरिक्ष में आध्यात्मिक बातें मनन करने को उत्सुकता पैदा करती हैं।

मैं अतिमानव पुस्तक की इस चर्चा को शुरू कर रहा हूं और अब आगे से आगे यह चर्चा स्वयं ही चलती जाएगी। अतिमानव में जो बातें हैं जो कथन हैं जो तथ्य हैं। ये सभी चर्चा को आगे से आगे बढ़ाने की उत्सुकता पैदा करने वाले हैं। मुझे ऐसा लग रहा है कि पुस्तक के जो भी संस्करण भविष्य में प्रकाशित होंगे उनमें और नई बातें होंगी। हां एक बार पुन: कहना चाहता हूं कि एक बार में नहीं कितनी बार इसे ध्यान से पढऩे से ही आभास होगा कि अतिमानव बस आने ही वाला है।

पुस्तक चर्चा- करणीदानसिंह राजपूत
राजस्थान सरकार द्वारा अधिस्वीकृत स्वतंत्र पत्रकार,
विजयश्री करणी भवन,लाइनपार
सूर्यवंशी विद्यालय के पास,
सूरतगढ़, राजस्थान।
मो.91 94143 81356.

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रविदत्त मोहता

पुस्तक- अतिमानव
पुस्तकालय संस्करण
पृष्ठ 152. मूल्य 200 रूपए.

प्रकाशक, राजस्थानी साहित्य संस्थान,यूआईटी के पास,जोधपुर।
लेखक- रविदत्त मोहता,
वर्तमान कार्य क्षेत्र-
प्रसारण अधिकारी,आकाशवाणी केन्द्र,सूरतगढ़।

मो.91 94147 29739
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