शनिवार, 16 अक्तूबर 2021

रीट परीक्षा विशेष ट्रेन ग्वालियर-जयपुर व जयपुर-गंगानगर को मर्ज कर चलाया जाए

 



   * करणीदानसिंह राजपूत *  

श्रीगंगानगर,16 अक्टूबर 2021.

आरटीआई और सामाजिक कार्यकर्ता कपिल मेहरा ने 26 सितंबर को रीट परीक्षा के उपलक्ष्य में  चलाई गई 04173 ग्वालियर-जयपुर और 04706 जयपुर-श्रीगंगानगर को मर्ज कर नियमित ग्वालियर-श्रीगंगानगर-ग्वालियर ट्रेन  चलाने के लिए रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव सहित संबन्धित सभी रेल अधिकारियों को पत्र भेजा है।

 पूर्व में भेजे गए झाँसी-श्रीगंगानगर ट्रेन  वाया मथुरा-अलवर  के प्रस्ताव को उत्तर पश्चिम रेलवे ने बेहतरीन बताया था परन्तु श्रीगंगानगर अनुरक्षण क्षमता के अभाव के कारण संचालन में  असमर्थता जताई थी। 

 भविष्य में कोचिंग सुविधा बढ़ने या उत्तर मध्य रेलवे से प्रस्ताव प्राप्त होने पर सकारात्मक विचार की बात कही थी।  अतः  मथुरा-अलवर-अलवर  रेलखंड पर रेलसेवाओं में कमी, जनसुविधा एवं यात्री सुविधा विस्तार हेतु एक अतिरिक्त रेलसेवा की आवश्यकता को देखते हुए हमारा सुझाव/प्रस्ताव है कि उपरोक्त परीक्षा स्पेशल ट्रेन में शयनयान एवं वातानुकूलित कोच जोड़कर  ग्वालियर-झाँसी-आगरा से श्रीगंगानगर के मध्य  वाया जयपुर,सीकर,सादुलपुर,हनुमानगढ मेल/एक्सप्रेस/सुपरफास्ट रेलसेवा का संचालन उत्तर-मध्य/पश्चिम-मध्य रेलवे द्वारा किया जाए  और अनुरक्षण झाँसी अथवा आगरा मंडल में हो तो सबसे बेहतर रहेगा 

क्यूंकि आगरा-मथुरा-अलवर से श्रीगंगानगर के लिए रेलसेवा की माँग लगभग आठ साल पुरानी है लेकिन श्रीगंगानगर-हनुमानगढ-सादुलपुर रेलखंड और चुरू-रींगस रेलखंड के आमान परिवर्तन कार्य प्रगति पर होने के कारण संभव नही हो सका। 

वहीं मेहरा ने  निम्न बिन्दुओं के कारण भी  संचालन की आवश्यकता बताई  है कि  हनुमानगढ़ में गोगामेड़ी , गोगाजी महाराज को समर्पित प्रसिद्ध धाम है जहाँ पर्यटकों का आना-जाना रहता है एवं अलवर-मथुरा रूट पर भगवान श्री कृष्ण जी से जुड़े हुए तीर्थ  स्थल हैं  अतः इन क्षेत्रों का जुड़ाव श्रद्धालुओं की सुविधा की दृष्टि से बेहद आवश्यक है अतः इतने सारे पर्यटक स्थलों के जुड़ाव के कारण इस ट्रेन का त्रिसाप्ताहिक अथवा नियमित संचालन आवश्यक हो जाता है।

इसके अलावा अलवर , हनुमानगढ़ , श्रीगंगानगर में एक दूसरे शहरों के बहुत  लोग रोजगार एवं व्यवसाय के सिलसिले में रहते हैं जिसका पता इस बात से चलता है कि दो जोड़ी ट्रैवल्स और दो राजस्थान परिवहन निगम की बस नियमित संचालित हो रही हैं। अतः उपरोक्त शहरों के मध्य एक त्रिसाप्ताहिक अथवा नियमित रेलसेवा का संचालन बेहद आवशयक है ना केवल इन शहरों के लोगों को सुविधा प्रदान करेगी बल्कि बीच के शहरों और रेलवे के लिए राजस्व कि दृष्टि से फायदेमंद भी होगी।

 वर्तमान में अलवर के रेल यात्रियों को 151 किमी दूर जयपुर और 75 किमी दूर रेवाड़ी से हनुमानगढ़ , गंगानगर जाने के लिए ट्रेन बदलनी पड़ती है जिससे यात्रियों के बहुमूल्य समय और धन का अपव्यय होता है।अतः इस ट्रेन का संचालन यात्रियों की  सुविधा के लिए बेहद आवश्यक है।

अलवर सांसद ने श्रीगंगानगर , हनुमानगढ़ और अलवर को ट्रेन से जोड़ने हेतु पत्र लिखे है अलवर , राजस्थान का जनसंख्या की दृष्टि से तीसरा सबसे बड़ा जिला है एवं प्रमुख शहर है और अलवर-मथुरा  सेक्शन में ट्रेनों की कमी और अनेक स्थलों के पहली बार जुडने के कारण ट्रेन का संचालन रेलवे और यात्रियों को  लाभकारी होगा

 साथ ही मेहरा ने लिखा कि श्रीगंगानगर-हनुमानगढ की जनता द्वारा भी लगातार उत्तर-पश्चिम रेलवे से श्रीगंगानगर-अलवर-मथुरा-आगरा-झाँसी  के लिए दैनिक रेलसेवा की माँग की जा रही है इस रेलसेवा के लिए दिये गये सुझाव का मुख्य मकसद आगरा-मथुरा-अलवर  से गोगामेङी आने वाले लाखों श्रद्दालुओं को सीधी रेलसेवा उपलब्ध करवाना ,श्रीगंगानगर-हनुमानगढ से अलवर आवागमन करने वाले हजारों यात्रीयों के लिए रेल संपर्क स्थापित करना है।

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गुरुवार, 14 अक्तूबर 2021

सूरतगढ़:शारदीय नवरात्रों पर करणी माता मंदिर में राजपूत सरदारों ने सपत्नी हवन किया

 




* करणीदानसिंह राजपूत *

सूरतगढ़ 14 अक्टूबर 2021.


शारदीय नवरात्रा के शुभ अवसर पर बाई पास रोड सूरतगढ़ स्थित करणी माता मंदिर में नवरात्रा स्थापना से नवमी तक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित हुए। यजमानों द्वारा प्रतिदिन सुबह मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की  और मां करणी जी की विधिवत पूजा अर्चना हुई। मां करणी की प्रतिमा का विशेष शृंगार किया गया।


नवमी के अवसर पर मन्दिर परिसर में हवन का आयोजन हुआ। मल सिंह भाटी, करणीदान सिंह राजपूत, छत्रपाल सिंह बीका, राजेन्द्र सिंह पड़िहार, उम्मेद सिंह शेखावत, एवं लाल सिंह बीका ने सपत्नीक हवन किया।। श्रद्धालुओं व उपस्थित राजपूत परिवारों ने हवन में पूर्णाहुति डाली। मंदिर में स्थापित सभी देवी देवताओं के धूप अर्चना की गई।








हवन सम्पन्न होने के बाद मां करणी की आरती की गई और मां करणी को विभिन्न पकवानों का भोग लगाया गया। पूजन कार्यक्रम पंडित भगवती प्रसाद शर्मा, दीपक शर्मा ने सम्पन्न करवाया।


 कंजक पूजन कर उन्हें प्रसाद भोजन कराया गया। भंडारे का आयोजन हुआ जिसमें सभी धर्मप्रेमियों को प्रसाद वितरित किया गया। 


इस मंगल अवसर पर राजपूत क्षत्रिय संस्था के  अध्यक्ष प्रहलाद सिंह राठौड़, उपाध्यक्ष भीम सिंह राठौड़, महासचिव अजय सिंह चौहान,, राम कुमार सिंह परमार, नारायण सिंह राठौड़, वीरेन्द्र सिंह सिसोदिया, गणपत सिंह भाटी, बजरंग सिंह परमार, शायर सिंह गौड़़, सूरज सिंह भाटी, वीरेन्द्र सिंह राठौड़, राम सिंह शेखावत, महेन्द्र सिंह निर्वाण, सुरजन सिंह राठौड़, हेम सिंह शेखावत, गजेन्द्र सिंह शेखावत उपस्थित रहे।०0०

 

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बुधवार, 13 अक्तूबर 2021

सरकार वन जमीनों की परिभाषा बदलने की तैयारी में.सुझाव मांगे:विरोध शुरू वन खत्म हो जाएंगे

 

* करणीदानसिंह राजपूत *
वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पिछले सप्ताह वन संरक्षण कानून 1980  में संशोधन से जुड़े विवरण का प्रकाशन किया है. इस संशोधन का उद्देश्य वन भूमियों को परिवर्तन करने को आसान बनाना और विकास कार्यों के लिए कुछ श्रेणी को मंत्रालय से मंजूरी लेने की आवश्यकता से छूट देना है. मंत्रालय ने राज्य सरकारों और आम जनता से 15 दिन के भीतर इस विवरण पर विचार मांगा है. विचार (फीडबैक ) की समीक्षा के बाद सरकार संशोधन का नया विवरण तैयार करेगी, जिस पर एक बार फिर से लोगों की राय ली जाएगी और विवरण को विधेयक के रूप में फिर संसद में पेश किया जाएगा.
मौजूदा कानून के मुताबिक वन की परिभाषा के चलते पूरे देश में जमीनें लॉक हो गई हैं. यहां तक कि निजी मालिकाना हक वाले लोग भी अपनी संपत्ति का उपयोग नहीं पा रहे हैं. मौजूदा कानून के मुताबिक किसी भी उद्देश्य के लिए जंगली जमीन का किसी भी तरह परिवर्तन यहां तक कि लीज पर देने के लिए भी केंद्र सरकार की अनुमति लेनी होती है.
कानून में संशोधन क्यों किया जा रहा है?
इससे पहले वर्ष 1996 में टीएन गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत सरकार केस में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वन भूमि की परिभाषा और दायरे का विस्तार किया था, ताकि स्वामित्व, मान्यता और वर्गीकरण के बावजूद किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में वन के रूप में दर्ज सभी क्षेत्रों को शामिल किया जा सके. पहले ये कानून बड़े पैमाने पर वनों और राष्ट्रीय उद्यानों को आरक्षित करने के लिए लागू किया जाता था, लेकिन कोर्ट ने ‘जंगल के शब्दकोशीय अर्थ’ को शामिल करने के लिए वनों की परिभाषा का भी विस्तार किया, जिसका अर्थ है कि एक वनोच्छादित जगह स्वचालित रूप से ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ बन जाएगी, भले ही इसे संरक्षित जगह के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया हो, भले ही स्वामित्व निजी हो या सार्वजनिक. आदेश की व्याख्या यह मानने के लिए भी की गई थी कि यह अधिनियम गैर-वन भूमि में वृक्षारोपण पर लागू है.
मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि प्रस्तावित संसोधन मौजूदा कानून के नियमों को कारगर बनाने के लिए हैं. यह भी कहा जाता है कि वन भूमि की पहचान व्यक्तिपरक और मनमाना है और अस्पष्टता के चलते लोगों और संगठनों में इसे लेकर नाराजगी है और विरोध भी होता है. मंत्रालय ने यह भी कहा कि रेलवे, सड़क, यातायात और राजमार्ग मंत्रालय ने भी कड़ी आपत्तियां दर्ज कराई हैं. अधिकारियों का कहना है कि अलग-अलग मंत्रालयों को विकास योजनाओं के लिए स्वीकृति हासिल करने में कई साल लग जाते हैं. और परिणामस्वरूप इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में देरी होती है.
क्या हैं प्रस्तावित संशोधन
1. मंत्रालय ने प्रस्ताव दिया है कि 1980 से पहले रेलवे और सड़क मंत्रालय द्वारा अधिग्रहित की गई सभी जमीनों को अधिनियम से छूट दी जाएगी. कहा गया है कि इन जमीनों का अधिग्रहण सेवाओं के विस्तार के लिए किया गया था, लेकिन समय के साथ इन इलाकों में जंगल उग आए और फिर सरकार इन जमीनों का उपयोग नहीं कर पाई. अगर संशोधन लाए जाते हैं तो अलग-अलग मंत्रालयों को योजनाओं के लिए स्वीकृति की जरूरत नहीं पड़ेगी.
2. वहीं उन व्यक्तियों के लिए जिनकी भूमि राज्य-विशिष्ट निजी वन अधिनियम के अंतर्गत आती है या 1996 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में निर्दिष्ट वन के शाब्दिक अर्थ के तहत आती है, उन्हें आवासीय इकाइयों सहित ‘वास्तविक उद्देश्यों के लिए संरचनाओं के निर्माण’ की अनुमति देने का प्रस्ताव है. इसके तहत एकमुश्त छूट के रूप में 250 वर्ग मीटर तक निर्माण किया जा सकेगा.
3. वहीं, अंतरराष्ट्रीय सीमा के करीब रक्षा योजनाओं को भी निर्माण के लिए स्वीकृति की जरूरत नहीं होगी.
4. वन भूमि पर तेल और गैस की खुदाई को भी मंजूरी होगी, लेकिन इसके लिए Extended Reach Drilling तकनीक का ही उपयोग किया जाएगा.
5. मंत्रालय ने लीज के नवीनीकरण के दौरान गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए लेवी को हटाने का प्रस्ताव दिया है. मंत्रालय ने कहा है कि लीज देने और नवीनीकरण के समय डबल लेवी लगाना तर्कसंगत नहीं है.
6. अधिनियम के तहत आने वाली सड़कों के किनारे पट्टीदार वृक्षारोपण से भी छूट दी जाएगी.
क्या हैं चिंताएं
1. सामाजिक कार्यकर्ता और विपक्षी नेताओं का कहना है कि नियमों में छूट से वन भूमि पर कॉरपोरेट का मालिकाना बढ़ेगा और वन की कटाई बढ़ेगी, जिससे उनका दायरा भी घटेगा.
2. पूर्व वन अधिकारियों का कहना है कि निजी जमीन पर वनों की कटाई से जंगल तेजी से घटेंगे. उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में 4 फीसदी जमीन निजी वन के दायरे में आती है.
3. सीपीएम नेता बृंदा करात ने कहा कि आदिवासी और वनवासी समुदाय के लोगों को क्या होगा? – प्रस्तावित संशोधन उनकी चिंताओं को दूर नहीं करता है.
4. पर्यावरण के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि 1980 से पहले की जमीन पर रेलवे और सड़क मंत्रालय को निर्माण की अनुमति देने से पर्यावरण के साथ जंगली जीवों को काफी नुकसान होगा. खासतौर पर हाथी, टाइगर और तेंदुओं के लिए यह नुकसानदायक होगा.
5. पर्यावरणविदों का कहना है कि निजी वनों पर निजी आवासों के लिए एक बार की छूट से वनों का विखंडन होगा, और अरावली की पहाड़ी जैसे खुले क्षेत्रों में रियल एस्टेट का कब्जा हो जाएगा.
क्या पर्यावरणविदों को कुछ सकारात्मक भी मिला?
पर्यावरणविदों ने इस तथ्य का स्वागत किया है कि सरकार ने परामर्श पत्र सार्वजनिक कर दिया है, और संसदीय प्रक्रिया का उपयोग करके संशोधन के माध्यम से परिवर्तन करने का निर्णय लिया गया है.०0० (मीडिया)
सरकार वन जमीनों की परिभाषा बदलने की तैयारी में.सुझाव मांगे:विरोध शुरू वन खत्म हो जाएंगे
* करणीदानसिंह राजपूत *
वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पिछले सप्ताह वन संरक्षण कानून 1980  में संशोधन से जुड़े विवरण का प्रकाशन किया है. इस संशोधन का उद्देश्य वन भूमियों को परिवर्तन करने को आसान बनाना और विकास कार्यों के लिए कुछ श्रेणी को मंत्रालय से मंजूरी लेने की आवश्यकता से छूट देना है. मंत्रालय ने राज्य सरकारों और आम जनता से 15 दिन के भीतर इस विवरण पर विचार मांगा है. विचार (फीडबैक ) की समीक्षा के बाद सरकार संशोधन का नया विवरण तैयार करेगी, जिस पर एक बार फिर से लोगों की राय ली जाएगी और विवरण को विधेयक के रूप में फिर संसद में पेश किया जाएगा.
मौजूदा कानून के मुताबिक वन की परिभाषा के चलते पूरे देश में जमीनें लॉक हो गई हैं. यहां तक कि निजी मालिकाना हक वाले लोग भी अपनी संपत्ति का उपयोग नहीं पा रहे हैं. मौजूदा कानून के मुताबिक किसी भी उद्देश्य के लिए जंगली जमीन का किसी भी तरह परिवर्तन यहां तक कि लीज पर देने के लिए भी केंद्र सरकार की अनुमति लेनी होती है.
कानून में संशोधन क्यों किया जा रहा है?
इससे पहले वर्ष 1996 में टीएन गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत सरकार केस में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वन भूमि की परिभाषा और दायरे का विस्तार किया था, ताकि स्वामित्व, मान्यता और वर्गीकरण के बावजूद किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में वन के रूप में दर्ज सभी क्षेत्रों को शामिल किया जा सके. पहले ये कानून बड़े पैमाने पर वनों और राष्ट्रीय उद्यानों को आरक्षित करने के लिए लागू किया जाता था, लेकिन कोर्ट ने ‘जंगल के शब्दकोशीय अर्थ’ को शामिल करने के लिए वनों की परिभाषा का भी विस्तार किया, जिसका अर्थ है कि एक वनोच्छादित जगह स्वचालित रूप से ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ बन जाएगी, भले ही इसे संरक्षित जगह के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया हो, भले ही स्वामित्व निजी हो या सार्वजनिक. आदेश की व्याख्या यह मानने के लिए भी की गई थी कि यह अधिनियम गैर-वन भूमि में वृक्षारोपण पर लागू है.
मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि प्रस्तावित संसोधन मौजूदा कानून के नियमों को कारगर बनाने के लिए हैं. यह भी कहा जाता है कि वन भूमि की पहचान व्यक्तिपरक और मनमाना है और अस्पष्टता के चलते लोगों और संगठनों में इसे लेकर नाराजगी है और विरोध भी होता है. मंत्रालय ने यह भी कहा कि रेलवे, सड़क, यातायात और राजमार्ग मंत्रालय ने भी कड़ी आपत्तियां दर्ज कराई हैं. अधिकारियों का कहना है कि अलग-अलग मंत्रालयों को विकास योजनाओं के लिए स्वीकृति हासिल करने में कई साल लग जाते हैं. और परिणामस्वरूप इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में देरी होती है.
क्या हैं प्रस्तावित संशोधन
1. मंत्रालय ने प्रस्ताव दिया है कि 1980 से पहले रेलवे और सड़क मंत्रालय द्वारा अधिग्रहित की गई सभी जमीनों को अधिनियम से छूट दी जाएगी. कहा गया है कि इन जमीनों का अधिग्रहण सेवाओं के विस्तार के लिए किया गया था, लेकिन समय के साथ इन इलाकों में जंगल उग आए और फिर सरकार इन जमीनों का उपयोग नहीं कर पाई. अगर संशोधन लाए जाते हैं तो अलग-अलग मंत्रालयों को योजनाओं के लिए स्वीकृति की जरूरत नहीं पड़ेगी.
2. वहीं उन व्यक्तियों के लिए जिनकी भूमि राज्य-विशिष्ट निजी वन अधिनियम के अंतर्गत आती है या 1996 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में निर्दिष्ट वन के शाब्दिक अर्थ के तहत आती है, उन्हें आवासीय इकाइयों सहित ‘वास्तविक उद्देश्यों के लिए संरचनाओं के निर्माण’ की अनुमति देने का प्रस्ताव है. इसके तहत एकमुश्त छूट के रूप में 250 वर्ग मीटर तक निर्माण किया जा सकेगा.
3. वहीं, अंतरराष्ट्रीय सीमा के करीब रक्षा योजनाओं को भी निर्माण के लिए स्वीकृति की जरूरत नहीं होगी.
4. वन भूमि पर तेल और गैस की खुदाई को भी मंजूरी होगी, लेकिन इसके लिए Extended Reach Drilling तकनीक का ही उपयोग किया जाएगा.
5. मंत्रालय ने लीज के नवीनीकरण के दौरान गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए लेवी को हटाने का प्रस्ताव दिया है. मंत्रालय ने कहा है कि लीज देने और नवीनीकरण के समय डबल लेवी लगाना तर्कसंगत नहीं है.
6. अधिनियम के तहत आने वाली सड़कों के किनारे पट्टीदार वृक्षारोपण से भी छूट दी जाएगी.
क्या हैं चिंताएं
1. सामाजिक कार्यकर्ता और विपक्षी नेताओं का कहना है कि नियमों में छूट से वन भूमि पर कॉरपोरेट का मालिकाना बढ़ेगा और वन की कटाई बढ़ेगी, जिससे उनका दायरा भी घटेगा.
2. पूर्व वन अधिकारियों का कहना है कि निजी जमीन पर वनों की कटाई से जंगल तेजी से घटेंगे. उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में 4 फीसदी जमीन निजी वन के दायरे में आती है.
3. सीपीएम नेता बृंदा करात ने कहा कि आदिवासी और वनवासी समुदाय के लोगों को क्या होगा? – प्रस्तावित संशोधन उनकी चिंताओं को दूर नहीं करता है.
4. पर्यावरण के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि 1980 से पहले की जमीन पर रेलवे और सड़क मंत्रालय को निर्माण की अनुमति देने से पर्यावरण के साथ जंगली जीवों को काफी नुकसान होगा. खासतौर पर हाथी, टाइगर और तेंदुओं के लिए यह नुकसानदायक होगा.
5. पर्यावरणविदों का कहना है कि निजी वनों पर निजी आवासों के लिए एक बार की छूट से वनों का विखंडन होगा, और अरावली की पहाड़ी जैसे खुले क्षेत्रों में रियल एस्टेट का कब्जा हो जाएगा.
क्या पर्यावरणविदों को कुछ सकारात्मक भी मिला?
पर्यावरणविदों ने इस तथ्य का स्वागत किया है कि सरकार ने परामर्श पत्र सार्वजनिक कर दिया है, और संसदीय प्रक्रिया का उपयोग करके संशोधन के माध्यम से परिवर्तन करने का निर्णय लिया गया है.०0० (मीडिया)
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मंगलवार, 12 अक्तूबर 2021

वृक्ष मित्र परिवार:सूरतगढ़ को जगाता:हरियाला बनाता: पेड़ लगाता:

 

* करणीदानसिंह राजपूत *
विकास की ओर अग्रसर सूरतगढ़ में भी ऊंचे शानदार भवनों के सीमेंट कंक्रीट के फैलते जंगल में आज जहां से गुजरें वहां आंखों के आगे एक नाम छा जाता है' वृक्ष मित्र परिवार'।





शहर की सड़कों सरकारी कार्यालयों के समीप, परिसरों में और अनेक सामाजिक धार्मिक संस्थाओं मंदिर परिसरों में पौधे जो बन रहे हैं पेड़। पौधों पेड़ों के सुरक्षा कवच पर एक नाम दिखता है। मै इसी नाम वृक्ष मित्र की चर्चा कर रहा हूं जिसने सूरतगढ़ की सूरत बदल दी। इस संस्था के सदस्यों ने शहर में जाग पैदा कर दी और यह प्रमाणित कर दिया है कि आदमी चाहे वह सब कर सकता है। पेड़ ही पेड़। पेड़ों की कतारें। पौधा रोपण आसान नहीं और उनको सींचना तो बहुत कठिन। ऐसी जगह भी हैं जहां दूर तक पानी नहीं। लागि ऐसी लगन सब हो गए मगन। इस लगन का परिणाम आज दिखाई दे रहा है और आने वाले कुछ सालों में भरपूर छाया और प्राणवायु देगा। और उस समय लोगों के मुंह से निकल पड़ेंगे आशीष के दो शब्द!
वृक्ष मित्र संस्था ने आम नागरिकों को प्रेरित किया है वहीं जनप्रतिनिधियों, सरकारी अधिकारियों, संस्थाओं को भी साथ में खड़ा किया है। प्रशासनिक अधिकारियो कर्मचारियोंं को साथ लिया है तो वहीं पुलिस अधिकारियों कर्मचारियों को भी साथ लिया है। 
' साथी हाथ बढाना साथी रे' की गूंज सी सुनाई पड़ती है। सूरतगढ़ शहर में। मेरे सूरतगढ़ में। ०0०
12 अक्टूबर 2021.
करणीदानसिंह राजपूत,
स्वतंत्र पत्रकार ( राजस्थान सरकार के सूचना एव़ जनसंपर्क निदेशालय से अधिस्वीकृत)
सूरतगढ़. (राजस्थान.)
94143 81356.
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रविवार, 10 अक्तूबर 2021

गांधी बाबा नहीं सुहाते तो मोदी बाबा से कहो कि गांधी बाबा के नाम से राज चलाना बंद करें.

  

* करणीदानसिंह राजपूत *


गांधी बाबा के नाम पर कांग्रेस ने राज चलाया और अब भाजपा भी गांधी बाबा के नाम पर ही राज कर रही है।

 गांधी बाबा की पूजा प्रशंसा और उन्हें नमन करते हुए देश के सर्वोच्च व्यक्ति मोदी बाबा राज कर रहे हैं  और उन्हीं के कार्यकर्ता जो भाजपा और संघ से संबंधित हैं,हर वक्त सोशल मीडिया पर गांधी बाबा को कोसते रहते हैं। गांधी बाबा को कोसने मैं अपशब्दों का भी इस्तेमाल होता है और उन पर अनेक लांछन लगाए जाते हैं। 

गांधी बाबा की जयंती 2 अक्टूबर से पहले और एक हफ्ते बाद तक कोसने का काम बहुत अधिक और जोरों पर होता है। वैसे तो गांधी बाबा के विरुद्ध लिखने का अभियान दिन रात चलता है कभी रुका नहीं है। ऐसे लोगों ने गांधी बाबा को कोसने का काम अपनी दिनचर्या में शामिल कर रखा है।

अब प्रश्न यह पैदा होता है कि मोदी बाबा जब अपना राज गांधी बाबा के नाम से चला रहे हैं तब नीचे के कार्यकर्ताओं को गांधी बाबा  स्वीकार क्यों नहीं है? 

कांग्रेस पर निरंतर यह आरोप लगता रहा कि उसने गांधी बाबा का चित्र नोटों पर छाप कर राज चलाया। अब कांग्रेस का राज तो है नहीं तब नोटों पर गांधी बाबा का चित्र कौन छपवा रहा है? मोदी बाबा के राज में भी नोटों पर गांधी बाबा का चित्र छापने की प्रक्रिया भी निरंतर चल रही है। मतलब साफ है कि अब नोटों पर गांधी बाबा का चित्र मोदी बाबा छपवा रहे हैं।

गांधी बाबा के नाम पर योजनाएं चलाई जा रही है।अब ये योजनाएं कौन चला रहे हैं ?

मोदी बाबा ने तो भारत स्वच्छता अभियान तक चलाया। सारे देश से झाड़ू भी लगवाई। नेताओं व कार्यकर्ताओं ने झाड़ू लगाते हुए फोटो खिचवाए। उन फोटो को समाचार पत्रों में खूब छपवाया और टेलीविजन चैनलों पर खूब प्रसारित करवाया। यह स्वच्छता अभियान चल ही रहा है।

यदि गांधी बाबा से इतनी ज्यादा घृणा है तो राज गांधी बाबा के नाम से क्यों? गांधी बाबा के नाम से राजपाट चलाने का काम रोका जाना चाहिए और यह कार्य मोदी बाबा से करवाया जाए।


 जिन कार्यकर्ताओं को गांधी बाबा स्वीकार नहीं हैं उन्हें चाहिए कि मोदी बाबा से ही सब कर्म छुड़वाए जो गांधी बाबा के नाम से जुड़े हुए हैं।


आज जब मोदी बाबा को महान माना जा रहा है तब मोदी बाबा को राज चलाने के लिए गांधी बाबा की याद और नमन करने की कहां आवश्यकता है? 

गांधी बाबा को हर समय कोसने वालों को चाहिए कि वे मोदी बाबा से गांधी बाबा के नाम से राज चलाना बंद करवाएं।

०0०






भाटिया आश्रम में 124 युनिट रक्त संग्रह: भारत विकास परिषद सूरतगढ़ का शिविर:



* करणीदानसिंह राजपूत *

सूरतगढ़ 10 अक्टूबर 2021.

भारत विकास परिषद शाखा सूरतगढ़ का रक्तदान शिविर भाटिया आश्रम में आयोजित हुआ।

शिविर का उदघाटन बिश्नोई समाज के स्वामी श्री सचिदानंद जी महाराज लालासर साथरी,प्रवीण भाटिया,परिषद अध्यक्ष रमेश आसवानी,संरक्षक डॉ के एल बंसल एवम प्रभारी शिव शंकर सोमानी द्वारा दीप प्रज्वलन कर किया गया। 

तपोवन ब्लड बैंक समिति श्री गंगानगर के सुशील झाझड़िया अनुज शाहू एवम रवींद्र सिंह द्वारा रक्त संग्रह किया गया। शिविर में  124 यूनिट रक्त संग्रह किया गया। 

* स्वामी सचिदानंद महाराज व प्रवीण भाटिया ने भी रक्तदान किया।*

रक्तदान में भाटिया आश्रम के विद्यार्थियों व महिलाओं का भरपूर सहयोग रहा।

शिविर में परिषद के रामेश्वर मंगलाव अशोक मोदी डॉ जितेंद्र सिंह राठौड़ राजेंद्र सारस्वत सौरभ आहूजा आदि सदस्यों के अलावा रमेश चन्द्र माथुर ने सेवाएं दी।०0०

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शनिवार, 9 अक्तूबर 2021

श्रीगंगानगर जिले की दो गौशालाएं श्रेष्ठता में संभाग आयुक्त व कलक्टर द्वारा पुरस्कृत

 


* करणीदानसिंह राजपूत *


श्रीगंगानगर, 9 अक्तूबर 2021.


 संभागीय आयुक्त श्री भंवरलाल मेहरा एवं जिला कलक्टर श्री जाकिर हुसैन द्वारा शनिवार को जिला कलेक्टर सभागार में जिले की दो सर्वश्रेष्ठ गौशालाए श्री गौशाला करणपुर एवं श्री कृष्ण गौशाला सेवा समिति रघुनाथपुरा (सूरतगढ़) को पुरस्कार स्वरूप प्रतीक चिन्ह, प्रशस्ति पत्र एवं 5000 रूपये का चेक देकर सम्मानित किया। 

श्री गौशाला करणपुर की ओर से अध्यक्ष श्री मनमोहन गुप्ता एवं श्री कृष्ण गौशाला सेवा समिति रघुनाथपुरा की ओर से अध्यक्ष श्री डीआर लेघा द्वारा पुरस्कार ग्रहण किया गया।

इस अवसर पर संभागीय आयुक्त श्री भंवरलाल मेहरा द्वारा गौशाला पदाधिकारियों को गौमाता की अधिक से अधिक सेवा करने हेतु प्रेरित किया।

संयुक्त निदेशक पशुपालन विभाग डाॅ. रामवीर शर्मा द्वारा बताया गया कि सर्वश्रेष्ठ गौशाला का चयन दो श्रेणियों में किया गया है। प्रथम श्रेणी में उन गौशालाओं जो 5 वर्ष से अधिक पुरानी है एवं दूसरी श्रेणी में जो गौशाला 5 वर्ष से कम समय की हैं, शामिल किया गया। यह पुरस्कार गोपालन विभाग द्वारा दिया गया है। पुरस्कार हेतु चयन आवेदक गौशालाओं का निरीक्षण कर अंकों के आधार पर जिला गोपालन समिति द्वारा जिला कलक्टर की अध्यक्षता में किया गया। चयन प्रक्रिया का संयोजन पशुपालन विभाग गौशाला प्रभारी डाॅ. नरेश गुप्ता द्वारा किया गया। ०0०




गुरुवार, 7 अक्तूबर 2021

स्वास्थ्य मंत्री डाॅ. रघु शर्मा द्वारा श्रीगंगानगर के आॅक्सीजन प्लांट का वर्चुअल लोकार्पण







* करणीदानसिंह राजपूत *

श्रीगंगानगर, 7 अक्तूबर2021.

 चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री डाॅ. रघु शर्मा ने नवरात्रा प्रारंभ दिवस गुरुवार को श्री गंगानगर के राजकीय जिला चिकित्सालय में पीएम केयर फंड से बने आॅक्सीजन प्लांट का वर्चुअल लोकार्पण किया। 


इस आॅक्सीजन प्लांट में 200 सिलेंडर प्रतिदिन व 1000 लीटर प्रति घंटे आॅक्सीजन उत्पादन की क्षमता है।


जिला कलक्टर श्री जाकिर हुसैन ने कहा कि इस आॅक्सीजन प्लांट के बनने से जिले को बेहद फायदा होगा। 


विधायक श्री राजकुमार गौड़ ने कहा कि तीसरी लहर आने की संभावना को देखते हुए यह आॅक्सीजन प्लांट जिला अस्पताल में बनाया जाना अति आवश्यक था। उन्होंने मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत द्वारा प्रदेश की जनता का कोरोना काल में बेहतरीन प्रबंधन करने के लिए धन्यवाद दिया।

इस प्लांट के वर्चुअल लोकार्पण कार्यक्रम में जिला कलक्टर जाकिर हुसैन, श्रीगंगानगर विधायक राजकुमार गौड़, एडीएम प्रशासन भंवानी सिंह पंवार, सीएमएचओ गिरधारीलाल मेहरड़ा, डाॅ. प्रेम सैनी, डाॅ. पवन सैनी व अन्य उपस्थित रहे।०0०



रहस्यमय है पीएम केयर्स फंड:देश का धन है तो फिर देश जानकारी क्यों नहीं ले सकता?

 


* करणीदानसिंह राजपूत *

देश में पहले से ही प्रधानमंत्री राहत कोष सन 1948 ईसवी से स्थापित है और 73 वर्षों से संचालित है। प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपने कार्यकाल में प्रधानमंत्री राहत कोष का संपूर्ण संचालन प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन कर दिया था जो वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ही अधीन है। ऐसी अधिकारिता के होते हुए पीएम केयर्स फंड की स्थापना की आवश्यकता क्यों हुई? इसमें देश का धन लगा है तो देश को इसके संचालन व जमा खर्च की जानकारी भी होनी चाहिए, लेकिन वह जानकारी दी नहीं जा रही। 
प्रधानमंत्री राहत कोष के होते हुए यदि पीएम केयर्स फंड की स्थापना की आवश्यकता हुई तो वह देश को बताया जाना चाहिए था और अभी भी बताया जा सकता है। 
* पीएम केयर्स फंड स्थापना से ही विवादों से घिरा है। 
** आखिर इसमें ऐसा क्या रहस्य है जिसके कारण देश से छुपाया जा रहा है? इसका नाम जरूर पीएम केयर्स फंड है लेकिन क्या इसके वर्तमान संचालक पदों से हटने/हटाने/छोड़ने के बखद भी इसका संचालन करने के अधिकारी होंगे? 
*** अनेक शंकाएं इस छुपाने से पैदा हो रही है और आगे भी होती रहेगी। 
**** देश का प्रधानमंत्री देश से छिपाए तो उससे पैदा होने वाली शंकाओं का तो अंत ही नहीं हो सकता। 
👌 एक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही नहीं इसके सभी संचालकों पर सदा प्रश्न छाए रहेंगे। अभी तो देश में मामूली धड़कन सी है लेकिन कभी यह तूफानी ताकत तक पहुंच कर अपूर्णीय हानि भी पहुंचा सकती है। जब सत्ता होती है तब हर प्रश्न को हवा में उड़ा देने या दबा देने की ताकत होती है लेकिन सत्ता कमजोर होने या चली जाने पर परेशानियां रुक नहीं पाती। लोकतंत्र में सत्ता स्थाई नहीं हो सकती इसलिए  मानना चाहिए कि ऐसा वक्त भी आ सकता है जब न चाहते हुए भी जगजाहिर हो सकता है।
देश में जागरूक लोगों की कमी नहीं है।

*इस फंड पर अभी भी लोग प्रश्न कर रहे हैं। 
** कांग्रेस का कहना है कि यह सरकारी फंड नहीं है तो प्रधानमंत्री के पते का इस्तेमाल क्यों हुआ?
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* मेरे एक विचार में ऐसा भी हो सकता है कि फंड की किसी भी जानकारी को कांग्रेस व विपक्ष से जानबूझ कर छुपाया जा रहा हो कि जब तूफान मचेगा तब सब खोल देंगे और उसमें कोई उलटा पुलटा नहीं निकलेगा। उसको  आक्रामक रूप में कांग्रेस और विपक्ष के विरुद्ध उपयोग किया जाएगा।
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एक जनहित याचिका भी दिल्ली उच्च न्यायालय में  सम्यक गंगवाल की ओर से
लगी हुई है जिसकी सुनवाई चल रही है। अभी तक न्यायालय में क्या हुआ है?

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार 6 अक्टूबर 2022 को कहा- सरकार को इसे निजी कोष बताने का अधिकार नहीं। उन्होंने कहा कि “हम यह नहीं कह रहे हैं कि इसकी गतिविधियां खराब हैं, बल्कि हम केवल यह कहना चाह रहे हैं कि यह संविधान के अनुशासन के अधीन होना चाहिए। सही बात यह है कि यह राजकीय के अलावा और कुछ नहीं है।”
याचिकाकर्ता ने कहा कि इसे निजी मानने का कोई औचित्य नहीं है। 
दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि पीएम केयर्स फंड  को संविधान द्वारा आवश्यक पारदर्शिता के सिद्धांत का पालन करना चाहिए और इसे राजकीय निधि घोषित किया जाना चाहिए। 
याचिकाकर्ता सम्यक गंगवाल का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि उच्च स्तर के सरकारी अधिकारियों ने ऐसा बताया था कि केंद्र धर्मार्थ ट्रस्ट की स्थापना कर रहा है। याचिकाकर्ता केंद्र के इस रुख का विरोध कर रहा है कि पीएम केयर्स फंड एक सरकारी फंड नहीं है और इसकी राशि भारत के समेकित कोष में नहीं जाती है।

उन्होंने मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की खंडपीठ से कहा, “आप यह नहीं कह सकते कि ‘देखो, हम तय करते हैं कि संविधान हम पर लागू नहीं होता है, हम राज्य नहीं हैं और हम कहीं और चले जाते हैं।”
अदालत ने बुधवार को उस याचिका पर दलीलें सुननी शुरू की जो चाहती है कि संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत पीएम केयर्स फंड को ‘राजकीय’ घोषित किया जाए। गंगवाल ने तर्क दिया कि देश के नागरिक इस बात से परेशान हैं कि प्रधान मंत्री द्वारा स्थापित एक कोष जिसके न्यासी प्रधानमंत्री, गृह, रक्षा और वित्त मंत्री हैं, उस पर कोई सरकारी नियंत्रण नहीं है।

दीवान ने तर्क दिया: “यह सरकारी मशीनरी के समानांतर काम कर रहा है। इस पर शासन का गहरा और व्यापक नियंत्रण है। जिस तरह से वित्तीय सहायता और इसके बारे में सब कुछ…संचालित किया जा रहा है, इससे यह नहीं समझ में आ रहा है कि पीएम केयर्स में ऐसा क्या है जो निजी है? क्या कोई कह सकता है कि यह राजकीय नहीं है। उस स्व-प्रमाणन के अलावा, हम ऐसा कोई कारक नहीं खोज पा रहे हैं कि यह राज्य नहीं है।”

यह भी तर्क दिया गया कि अधिकारियों ने  पीएम केयर्स फंड राज्य के रूप में पेश किया तथा राज्य के प्रतीक और .gov.in पोर्टल के उपयोग से यह आधिकारिक मंजूरी देता है। दीवान ने तर्क दिया “प्रतीक आधिकारिक स्वीकृति देता है, जनता का विश्वास, एक संदेश देता है कि यह आपकी सरकार से संबंधित है और संविधान के अनुशासन और भारत के कानूनों के संदर्भ में सब कुछ उसके अधीन होगा। यह निजी मामला नहीं है, जिसे कोई देख नहीं सकता है, जहां सभी दान अपारदर्शी हैं, और जिसका किसी के सामने खुलासा नहीं किया जा सकता है।”
दीवान ने यह भी तर्क दिया कि संविधान को “सूर्य के प्रकाश की तरह पारदर्शिता चाहिए।” 
पीएम केयर्स फंड की संरचना स्वयं में काफी “दोषपूर्ण और त्रुटिपूर्ण” है।“ उन्होंने कहा कि “हम यह नहीं कह रहे हैं कि इसकी गतिविधियां खराब हैं, बल्कि हम केवल यह कहना चाह रहे हैं कि यह संविधान के अनुशासन के अधीन होना चाहिए। सही बात यह है कि यह राजकीय के अलावा और कुछ नहीं है।”

अदालत को बताया गया कि PIB (पत्र सूचना ब्यूरो ) के माध्यम से PMO ने एक प्रेस नोट जारी कर पीएम केयर्स फंड में चंदा देने की अपील की थी। यह धारणा बनाई थी कि यह भारत सरकार के अलावा और कुछ नहीं है। अदालत को बताया गया कि उपराष्ट्रपति के साथ-साथ एक कैबिनेट मंत्री और कैबिनेट सचिव ने क्रमशः राज्यसभा के सदस्यों और सरकारी कर्मचारियों से इसी तरह की अपील की और इसे भारत सरकार के धर्मार्थ कोष के रूप में बताया।०0०



बुधवार, 6 अक्तूबर 2021

घड़साना में किसानों का धरना समाप्त होने की घोषणा हुई: ऐसे बनी सहमति

 

* करणीदानसिंह राजपूत *

श्रीगंगानगर, 6 अक्तूबर 2021.

संयुक्त किसान मोर्चा और प्रशासन के बीच आज वार्ता में सहमति होने पर घड़साना में किसानों का धरना समाप्त होने की घोषणा हुई है। 

सरकारी सूचना में किसानों का धरना समाप्त करने की घोषणा के साथ सहमति का विवरण  दिया गया है।

संभागीय आयुक्त श्री बीएल मेहरा व ज़िला कलेक्टर श्री ज़ाकिर हुसैन व पुलिस अधीक्षक श्री राजन दुष्यंत के प्रयासों से बुधवार को घड़साना में चल रहा किसानों का धरना प्रदर्शन समाप्त करने की घोषणा संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा की गई ।

संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा सिंचाई पानी की माँग को लेकर उपखंड कार्यालय के समक्ष किए जा रहे धरना प्रदर्शन के संबंध में संभागीय आयुक्त बीकानेर, जिला कलेक्टर ज़ाकिर हुसैन, पुलिस अधीक्षक राजन दुष्यंत, महानिरीक्षक बीकानेर, मुख्य अभियंता जल संसाधन हनुमानगढ़ द्वारा संयुक्त किसान मोर्चा के अगुवा कॉमरेड श्योपत, कॉमरेड पवन दुग्गल, सुनील गोदारा, राजू जाट आदि सहित 20 - 25 प्रथम चरण की अलग अलग वितरिकाओं  के किसान नेताओं से वार्ता की गई। किसान नेताओं को किसानों के हितों व उदारपूर्वक रवैये से अवगत कराकर सकारात्मक रुख़ के साथ वार्ता प्रारम्भ की गई। किसानों की मांगों के दृष्टिगत मुख्य अभियंता जल संसाधन विभाग द्वारा बताया गया कि वर्तमान रेग्युलेशन जो चार में से एक ग्रुप में चल रहा है उसकी स व द ग्रुप की नहरों को मर्ज  करने का प्रस्ताव बीबीएमबी को भिजवा दिया जाएगा तथा उसके उपरांत दूसरी, तीसरी व चौथी सिंचाई पानी की बारी तीन में से एक ग्रुप में नहरें चलाकर उपलब्ध करवाई जाएऐगी।  माह दिसंबर व जनवरी में पोंग डैम में पानी की आवक एवं उपलब्धता को देखते हुए जल परामर्शदात्री समिति की बैठक में विचार विमर्श कर निर्णय लिया जाएगा तथा पानी की उपलब्धता होने पर सिंचाई बारी उपलब्ध करायी जाएगी। बैठक में उपस्थित किसान नेताओं ने हर्ष के साथ सहमति व्यक्त करते हुए संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा धरना समाप्त करने की घोषणा की है।




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राजस्थानी की मान्यता को लेकर खेली जाने वाली देश की एकमात्र राजस्थानी रामलीला

 



सूरतगढ़ 06 अक्टूबर 2021.


आजादी के 70 वर्षों बाद भी अपनी भाषा की मान्यता की मांग को लेकर जूझ रहे राजस्थान के लोगों ने रंगमंच को माध्यम बनाकर अपनी भाषा की मांग की आवाज देश के सत्ताधारियों तक पहुंचाने का माध्यम बनाया है। अपनी मातृभाषा राजस्थानी में रामलीला के मंचन को लेकर । 

पूरे देश में खेली जाने वाली  राजस्थानी भाषा की रामलीला का मंचन 7 अक्टूबर 2021 से यहां शुरू किया जाएगा । 

मायड़ भाषा राजस्थानी लोक कला रंगमंच की ओर से वार्ड नंबर 5 में विगत 6 वर्षों से इस रामलीला का मंचन किया जा रहा है । इस वर्ष की रामलीला का मंचन 7 अक्टूबर से शुरू होकर 16 अक्टूबर तक किया जाएगा ।


 कलाकारों द्वारा राजस्थानी भाषा में सभी संवाद , लोकगीतों , लोक नृत्य का मिश्रण , राजस्थानी भाषा के परिवेश को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से राजस्थानी पहनावे को प्राथमिकता दी जाती है । सभी संवाद कलाकारों द्वारा अपनी मातृभाषा राजस्थानी में ही बोले जाते हैं । मंचन किए जाते हैं । 

राजस्थानी रामलीला के रचनाकार मनोज कुमार स्वामी ने बताया कि आजादी के समय से लेकर अब तक अपनी भाषा की आजादी की लड़ाई राजस्थान के लोग लड़ रहे हैं । राजस्थान को भौगोलिक आजादी मिली लेकिन भाषाई आजादी नहीं मिली । यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक रंगमंच की दुनिया जिंदा रहेगी । मंचन की सभी तैयारियां कर ली गई है ।०0०

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मंगलवार, 5 अक्तूबर 2021

सुपरटेक ट्विन टावर गिराने का आदेश: विजिलेंस में 30 के विरुद्ध मुकदमा

 



 * 24 नोएडा अथॉरिटी के अधिकारी और कर्मचारी*

 सुप्रीम कोर्ट ने सुपरटेक एमराल्ड कोर्ट के दो टावरों को गिराने का आदेश दिया है। इन दोनों टावरों को 40 मंजिला बनाने का प्लान था और अब तक 32 मंजिल तैयार हो चुकी थी।

    

सुपरटेक एमराल्ड कोर्ट के टि्वन टावर में हुए फर्जीवाड़े की एसआईटी जांच रिपोर्ट आने के साथ ही नोएडा अथॉरिटी ने लखनऊ विजिलेंस में एफआईआर करवा दी है। शिकायत प्लानिंग विभाग के मैनेजर वैभव गुप्ता ने दी है। तहरीर में अथॉरिटी ने पूरे फर्जीवाड़े के लिए सुपरटेक ग्रुप के 4 डायरेक्टर, 2 आर्किटेक्ट पर आरोप लगाए हैं।


आरोपित में तत्कालीन सीईओ रहे मोहिंदर सिंह, एसके द्विवेदी व एसीईओ आरपी अरोड़ा, ओएसडी यशपाल सिंह सहित एसआईटी की जांच में आए अन्य 22 नाम शामिल हैं। अभी ये साफ होगा कि इसकी जांच विजिलेंस की लखनऊ यूनिट करेगी या मेरठ यूनिट को ट्रांसफर होगी।

ये हैं आरोपी

अथॉरिटी में तैनात रहे जिन अधिकारियों कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर हुई है उनमें 20 रिटायर हो चुके हैं। चार मौजूदा समय में सेवा में हैं। इनमें एक गोरखपुर इंडस्ट्रियल डिवेलपमेंट अथॉरिटी के प्लानिंग मैनेजर मुकेश गोयल, नोएडा अथॉरिटी की प्लानिंग असिस्टेंट विमला सिंह, यूपीएसआईडीसी में तैनात प्लानिंग असिस्टेंट अनीता व यमुना अथॉरिटी के प्रभारी जीएम प्लानिंग ऋतुराज हैं। इन चारों को सस्पेंड करने के आदेश शासन की ओर से दे दिए गए हैं। आगे इनकी गिरफ्तारी भी हो सकती है।


विभागीय जांच पर शासन से निर्णय होगा

सेवा में मौजूद 4 आरोपित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। विभागीय जांच शुरू होने पर आपराधिक और विभागीय दोनों जांच का सामना करना होगा। अथॉरिटी अधिकारियों का कहना है कि विभागीय जांच को लेकर अभी शासन के निर्देश का इंतजार किया जा रहा है।


कार्मिक विभाग से मांगा सभी अधिकारियों की तैनाती का ब्यौरा

एसआईटी जांच में जिन 26 अधिकारी-कर्मचारी के नाम आए थे, उनकी तैनाती का ब्यौरा शासन के मांगने पर नोएडा अथॉरिटी ने कार्मिक विभाग से लेकर भेज दिया है। रिटायर्ड हो चुके अधिकारियों व कर्मचारियों पर और कार्रवाई होने पर पेंशन रुक सकती है।०0०

दि.5 अक्टूबर 2021.

ःःःःःःःःः

सूरतगढ़ से भाजपा के 2023 में फिर वही चेहरे होंगे टिकट के दावेदार

 

* करणीदानसिंह राजपूत *

राजस्थान विधानसभा चुनाव 2023 के चुनाव में भाजपा की टिकट के दावेदारों में फिर वही पुराने चेहरे होंगे रामप्रताप कासनीया और राजेंद्र सिंह भादू। संपूर्ण विधानसभा क्षेत्र में दिनरात सक्रियता में ये ही संघर्षरत नजर आ रहे हैं। रामप्रताप कासनीया वर्तमान में विधायक हैं और राजेंद्र सिंह भादू पूर्व विधायक हैं। 



वर्तमान कांग्रेस राज में भाजपा के प्रदर्शनों आदि में और अलग अलग कार्य कराने में किसानों के साथ इनके अलावा कोई समय नहीं दे रहा।


 राजेंद्र सिंह भादू एक बार 2013 से 2018 तक सूरतगढ़ से विधायक रहे हैं।


रामप्रताप कासनीया सूरतगढ़ से 2018 में विधायक चुने गए लेकिन पीलीबंगा से चुनाव जीतते हुए राज्यमंत्री रह चुके हैं। सन 2018 के चुनाव में भाजपा की टिकट की दावेदारी में कासनीया और भादू ही प्रमुख थे। कासनीया को टिकट मिली और वे जीते। यहां विशेष यही देखा जा रहा है कि भादू टिकट नहीं मिलने के बावजूद लोगों के साथ संघर्ष में खडे़ रहते हैं। अनेक प्रदर्शनों में दोनों की मौजूदगी रहती है।

विधानसभा चुनाव 2023 में अभी 2 साल बाकी हैं तो फिर इतने पहले यह चर्चा क्यों? यह प्रश्न होना भी स्वाभाविक है। 

अभी कुछ दिन पूर्व एक व्यावसायिक उद्घाटन समारोह में विभिन्न राजनीतिक लोग पहुंचे। वहां भाजपा के अनेक कार्यकर्ता भी पहुंचे। बस। वहीं यह चर्चा शुरू हुई कि अगली बार भाजपा किसको लड़ा सकती है?वहीं यह बात भी प्रमुख रही कि ये दो ही दावेदार सक्रियता में नजर आ रहे हैं। ०0०








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