शनिवार, 2 जुलाई 2016

गधे की लात से गधा नहीं मरता-पुरानी कहावत की कहानी


-करणीदानसिंह राजपूत
जहां देखो एक ही चर्चा। गधों की आपसी दुलत्तियों की। जिसके मन में आए वैसे ही चटखारों से सुनाए। चुप चुप रहने वालों की मौज बन गई। गधे लड़े क्यों और लड़ते लड़ते सड़क पर क्यों आ गए?
इससे पहले यह पुरानी कहावत भी मजेदार है। किसी ने गधों की लड़ाई देखी होगी और खूब दुलत्तियां चलती हुई देखी होंगी। किसी भी गधे का कुछ भी नहीं बिगड़ा होगा तब यह कहावत बना डाली होगी कि गधे की लात से गधा नहीं मरता। 



एक खास बात गधों की लड़ाई में होती हे कि चलती दुलत्तियां ही हैं। कोई भी गधा एक लात नहीं मारता। ण्क खास बात और होती है कि दुलत्तियां चलाते हैं तब एक दूसरे की तरफ देखते नहीं। दोनों की पीठ होती है। पुराने संबंध मित्रता भूल जाते हैं और उस पर नजर न डाल कर बस चलाते रहते हैं दुलत्तियां। पहले कभी नहीं देखी हो तो अब अपने शहर में देखलो। अपने शहर की एक खासियत जो और कहीं देखने को नहीं मिले वह अपने शहर में मिल जाए।
कहानी की भमिका ही लंबी होती जा रही है। अब कहानी ही शुरू करदी जाए।
उर्दु के मशहूर लेखक कृश्रचंदर ने सन 1965-66 के आसपास एक उपन्यास लिखा एक गधे की आत्मकथा। पुस्तक में राजनैतिक लोगों पर व्यंग था। खूब हंसी उड़ाई गई थी। वह पुस्तक खूब चर्चित हुई। हिंदी में उसका अनुवाद आया और लोगों ने खूब पढ़ा। अनेक भाषाओं में भी अनुवाद हुए और पुस्तक देश की सीमा पार कर विदेशों तक में खूब चर्चित हुई। अनेक लोगों ने पढ़ी होगी और जिन्होंने नहीं पढ़ी उनको कहीं न कहीं पुस्तकालय से या खरीद कर या फिर कहीं से मांग तांग कर पढऩी जरूर चाहिए।
वैसे एक राज की बात है कि गधों की व्यक्तिगत लायब्रेरी में भी कृश्रचन्द्र की पुस्तक है जरूर मगर वे किसी को बताते नहीं हें और जरूरत महसूस होने पर गाइड लाइन के लिए चुपचाप पढ़ लेते हैं और इसी राज के कारण वे आगे बढ़ रहे हैं।
चलो,बातें कई होती चली गई। अब अपनी चल रही कहानी पर ही नजर डालें।
आखिर गधे लड़े क्यों और यह लड़ाई चली कब? लड़ाई कब शुरू हुई यह तो किसी को मालूम नहीं केवल अनुमान लगाए जा सकते हैं।
सभी को मालूम तब पड़ा जब गधों को सड़क पर लड़ते देख लिया गया।
गधे तो गधे सड़क पर लडऩे लगे तो फिर किसी के ताबे में भी नहीं आए। लोगों ने समझाया तो होगा क्योंकि सारी दुनिया की अक्लदानी अपने शहर में है।
बात यह हुई कि जनता में चुने गए गधे को सरकार चलानी और अपना काम भी निकालना था। सो उसने दूर दूर तक नजर डाली तो एक खासम खास गधे पर निगाह टिकी। वाह यह आ जाए तो चाहे जितना चरेंगे किसी को भी मालूम नहीं पड़ेगा। उसे न्यौता। उसने कहा कि मैं यहां पर मौज में हूं और आदमी की निगाहों में भी नहीं आता। कहीं अपने में टकराहट हो गई तो मैं नाहक मारा जाऊंगा खराब होऊंगा।
उसे विश्वास दिया की सब ध्यान में रखा जाएगा। खराब करने कराने वाली बात तो दिमाग में भी नहीं लाना। तुम भी चरना और हमें भी चराना। बात जंच गई। आदमी को दोनों खड़ा रखते।
शासन वाले गधे ने चरने में कोई कसर नहीं छोड़ी और जनप्रिय गधा और उसकी औलाद सब खुश। कई महीनों के बाद जनप्रिय गधे को लगा कि लाया गया गधा कुद ज्यादा ही चरने लग गया। उसे लगा कि वह उनका हिस्सा भी चरने लगा है। अंदर ही अंदर ध्यान रखा गया। अपने अपने खसम खास की ड्यूटी लगाई।
बात जंचने लगी और लाया गया गधा अब बेकार नजर आने लगा।
सीधे रूप में कोई मानता नहीं। उसे इशारा किया नहीं माना तो तड़ी पार किया गया लेकिन उसने अपनी सूझबूझ और पहुंच के बल पर सारे आदेश हवा में उड़वा दिए। वापस आया और खुला खेल मदारी का।
अंदर ही अंदर घात चली गई। गधे पर शिकंजा कसा गया। चरना तो दूर रहा पकड़ कर कमरे में टिकाने की नौबत आने लगी। जो लोग नजदीक बैठते चाय पानी साथ पीते सभी एक दम से दूर हो गए।
अब गधे को पछतावा होने लगा कि वह क्यों आया? दूर चरता रहता कोई पूछने वाला नहीं था। लेकिन लोगों में बदनामी बुलाने वाले की भी होने लगी। वह भी सोचने लगा कि अच्छा पंगा हो गया। अब रोजाना ही कोई न कोई आ जाता है। सारी जगहों पर डर बैठ गया। अब कहीं भी चरने वाली बात नहीं रही। उसको बांधने लगे मगर खुद भी बंध गए।
बातें फैली और पुराने दूसरे गधों ने देखा कि आपस में लड़ते रहे तो आदमी हावी हो जाएगा।
दोनों को समझाइस के लिए बुलाया गया।
अरे तुम दोनों क्यों लड़ रहे हो? देखो आदमी के पास में आजकल लाठी नहीं है। अगर लाठी होती तो वह दोनों की कड़तू मार मार कर तोड़ उालता। लड़ाई छोड़ो। देखो हमारा दाना पानी राज में से उठ गया लेकिन फिर भी चर रहे हैं और कहीं गंध तक नहीं आती। राजनीति सीखो। अपनी लड़ाई बंद करो,आपस में दुलत्ती चलाने के बजाय आदमी पर चलाओ। उसको मारते रहो,मारते रहो ताकि वह सोचने का समय ही नहीं निकाल पाए। 







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