Tuesday, February 2, 2016

रचनात्मक पत्रकारिता लेखन व सेवा लूटे जा, खाए जा, पचाए जा।



नई परिभाषा~ सत्ताधारी मंत्री से संतरी तक के हर कार्य को उनकी स्तुति रूप में लिखते रहें और छापते रहें
करणीदान सिंह राजपूत
सत्ताधारी मंत्री से संतरी तक के हर कार्य को उनकी स्तुति रूप में लिखते रहें और छापते रहें। इनके छापे इसके अलावा अच्छा हो कि इनके चमचे कड़छों तक के फेवर में छापे तो उस रचनात्मक पत्रकारिता का कोई मुकाबला ही नहीं।
 उनस पूछकर छापो और उनके यहां  खुद जाकर देकर भी आओ। पांच-सात चमचे बैठे हों तो उनके सामने अपने श्रीमुख से बोलकर भी कहें कि नेताजी के कार्य से लोग कितने खुश हैं। नेताजी या उनके परिजन कोई रेप, हत्या, मारपीट कर बैठें हैं तो उनके पक्ष में छापें या चुप रहें कि कुछ हुआ ही न हों। अपनी तरफ से गारंटी भी दे डाले कि आरोप एकदम झूठे हैं। नेताजी और और उनके परिवार के लोग ऐसा कर ही नहीं सकते। ज्यादा ही रचनात्मक रवैया साबित करना हो तो पीडि़त परिवार को ही झूठा साबित करने के लिए लोगों के स्टेटमेंट तक छाप दें। नेताजी की समाजसेवा की रिपोर्ट बनाकर छाप दें। लोगों का क्या है? कुनमुना कर रह जाएंगे। रचनात्मक पत्रकारिता और लेखन का खिताब तो जनता ही नहीं देती वह तो शासन प्रशासन और नेताजी वाली संस्थाएं ही देंगी। बस लिखते रहो रचनात्मकता का पुरस्कार सम्मान  एक क्या कई मिलते चले जाएंगे। अपने जीवन साथी तक को दिलवा दें। उसे चाहे न आए कक्का। आप लिखें और सम्मान  आपकी साथिन को मिलता रहेगा। रचनात्मकता का सम्मान न जाने क्या-कया लाभ दिला देता है और न जाने कहां-कहां तक की ऊंचाइयों तक पहुंचा देता है। बस घर में तो सच मानना ही पड़ेगा कि इसके लिए नेताजी की हाजिरी जी हजूरी करनी ही होगी, लेकिन यह बाहर कौन देखता है। 
रचनात्मकता की पहली सीख है कि जिसे लोग और कानून की पोथियां भ्रष्टाचार बतलाती है। उन पर कुछ भी न लिखा जाए न कुछ प्रकाशित किया जाए। मान लो आपके शहर में नगरपालिका सड़क बना रही है और वह घटिया है तो चुप रहे। नगरपालिका सफाई नहीं कराती, गंदी सड़कें, मौहल्ले हैं तो देखते रहें। भ्रष्टाचार है अध्यक्ष अधिकारी का कमीशन मालूम है तो भी चुप रहे। रचनात्मकता साबित करनी हो तो पक्ष में लिखें। जनता कुछ बोले तो वह दबा दें।
यही रचनात्मकता की परिभाषा आज सभी नेता उपनेता, समाजसेवी और शिक्षा संस्थाएं भी चाहती है।
शिक्षा देने वाली संस्थाएं घपले करें, झूठे दावे करें तो भी उनके दावों को छापे। यह रचनात्मक है। किसी छात्र-छात्रा को सच बतलाने वाली न्यूज छापें लेख न छापे। संस्थाएं चाहे जो फीस ले। पुस्तकों आदि के रूप में कितना भी वसूले तब भी लिखें कि वहां नि:शुल्क कोचिंग दी जाती है। फीस देने वाले तो प्रतिवाद करते नहीं हैं।
नेताजी उनके परिजन, कोई भी सत्ताधारी, अधिकारी, संस्थाएं या उनके गधे गधेड़ी, बकरियां मैमने जो भी ढेंचू-ढेंचू की राग अलापे चाहे मिमियाए तो उनको शानदार प्रस्तुति बतलाए।

 बस यही रचनात्मकता है।
बदमाश को बदमाश, भ्रष्टाचारी को भ्रष्टाचारी, बलात्कारी को बलात्कारी, चोर को चोर लिखना छापना रचनात्मकता नहीं है। 

ऐसे लोगों को अध्यक्ष,मुख्य अतिथि, मुख्य वक्ता बनाने, कार्यक्रमों,
समारोहों में
सम्मानित  करने का आग्रह करें। उन्हें  सम्मान प्रशस्ति पत्र दिलवाएं। यह रचनात्मक कार्य  है
दुखियारे, पीडि़तों, शोषण का शिकार, बलात्कार शोषण की पीडि़ता के लिए छापना रचनात्मक कार्य नहीं है।
सतयुग से लेकर अब तक लोग पीडि़त होते रहे हैं। रोते हुए लोगों का साथ देना  रचनात्मकता
नहीं है? जनता तो रोएगी तो रोती रहेगी।
रचनात्मकता की जो परिभाषा आज की संस्थाएं, शिक्षाविद् घोषित करते हैं कि लूटे जा, खाए जा, पचाए जा। वही मानते हुए चलते रहें


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