बुधवार, 10 मार्च 2021

भगवान शिवधूणा संतआश्रम सूरतगढ़: सीताराम गौ शाला


* करणीदानसिंह राजपूत *
2 नवंबर 2011.

संत आश्रम सूरतगढ़ में भगवान शिव का अखंड धूणा- फोटो करणीदानसिंह राजपूत
संत राम दास शिव धूणे के पास विराजे हुए



आस्थावान संत रामदास, भीमराज तावणिया, त्रिलोकचंद अग्रवाल, महावीर प्रसाद मुद्गल,सुरेश मिश्रा

निर्माणाधीन ठाकुरजी का मंदिर

भगवान शिवधूणा संतआश्रम सूरतगढ़:
अखंड धूणे का मंगलकारी प्रभाव पाने को श्रद्धालु लगाते हैं धोक

सूरतगढ़ में शिवबाड़ी के पास में करीब 33 वर्षों से एक छोटी सी कच्ची कुटिया वाले संत आश्रम में शिव का अखंड धूणा धधक रहा है। धूणे को सुबह प्रज्ज्वलित किया जाता है और पूजा पाठ के बाद राख में अग्रि को दबा दिया जाता है, जो निरंतर इतने वर्षों से धधकती हुई श्रद्धा और आस्था बनी हुई है।
भक्त जन आते हैं और इस अखंड धूणे को धोक लगाते हैं। इसकी भस्मी का तिलक लगाते हैं तो अनेक अपने घर ले जाते हैं। श्रद्धा से इस भस्मी को प्रसाद के रूप में ग्रहण भी करते हैं। यह माना जाता है कि भगवान शिव के धूणे की भस्म को प्रसाद में ग्रहण करने वालों को स्वास्थ्य व दीर्घायु मिलती है। भगवान शिव स्वयं भी भस्म को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया करते थे।
    संत आश्रम में पवित्र धूणे में एक लंबा त्रिशूल लगा है तो कई चिमटे लगे हुए हैं। इसी धूणे वाली कुटिया में संत रामदास विराजते थे जिनका आशीर्वाद लेने को भक्तजन शुभ समझते थे।
    संत आश्रम की स्थापना लेख की दिनांक से तेतीस चौंतीस साल पहले हुई तब आसपास में बस्ती नहीं थी और दूर से केवल शिवबाड़ी ही नजर आती थी। इससे जुड़े भक्तजन भीमराज तावणियां और महावीर मुद्गल व अन्य जानकारों से बातचीत में इस धूणे की स्थापना का इतिहास इस तरह है। 
शिव बाड़ी के पास एक छोटा सा पीपल का पेड़ लगा था जो आज इस धूणे के पास में विशाल वृक्ष बन चुका है।
    अयोध्या से आए संत भीमदास ने इस पीपल के पास में एक कुटिया बनाई और शिव का धूणा जलाया। वे उस समय करीब पैंतालीस पचास साल के थे। सन् 1977-78 में धूणे की स्थापना के बाद वे करीब दो साल तक यहां धूणा तपते रहे। वे उपरी बदन उघाड़ा रखते थे तथा रामायण का पाठ करते और सुनाते। भक्त जनों की ओर से आने वाली किसी भी वस्तु और सामग्री का संग्रह नहीं करते थे। योग साधना करते तथा अन्नाहार नहीं लेते थे। फल व दूध उनका भोजन था।
    उस पहुंचे हुए संत भीमदास की महिमा आसपास फैलने लगी और अनेक भक्तजन धूणे पर पहुंचने लगे। उस समय नन्द किशोर मिश्रा,महावीर मुद्गल, रेख सिंह, भीमराज तावणियां, मनीराम सिंवाल,जगदीश ठाकराणी व कई और नियमित जाने लगे। भीमराज तावणियां ने बताया कि संत भीमदास की कुटिया को संत आश्रम कहा जाने लगा था। संत भीमदास करीब दो साल तक इस कुटिया में रहे और बाद में कहीं चले गए।
    संत भीमदास के जाने के करीब दो माह बाद में यहां पंजाब से उदासीन पंथ के महात्मा रणधीरदास आए और वे भी करीब दो साल तक रहे। इसके बाद साधु संत आते जाते रहे लेकिन कोई भी अधिक अवधि तक नहीं रहा।
    कुछ सालों तक भक्तजन ही इस पवित्र धूणे को तापते रहे। इसके बाद सन् 1990 में बीकानेर में लक्ष्मीनाथ मंदिर के पास में एक आश्रम में रहने वाले संत रामदास को इस धूणे से पुकार हुई। संत रामदास को बीकानेर में रहते हुए दस साल बीत चुके थे। संत रामदास के दोनों पैर काम नहीं करते थे। वे बैसाखियों के सहारे रहते और दूर जाना होता है तब मोटर रिक्क्षा चलाते थे।
    संत रामदास बहुत ही उदार स्वभाव के संत थे। रामदास जी ने बताया कि उनका जन्म बस्ती जिला के उसरी ग्राम में सन् 1934 में हुआ था जिसके अनुसार सन् 2011 में उनकी उम्र करीब 77 वर्ष की हो चुकी है। संत ने बताया कि अपंगता पैदाइशी नहीं थी। करीब दो ढाई साल की आयु में लकवा हुआ और एक ओर का आधा बदन प्रभावित हुआ जो बाद में काफी ठीक हो गया मगर पैर ठीक नहीं हो पाए। उन्होंने दसवीं तक शिक्षा ग्रहण की। पिता खेती करते थे।  माता पिता का नाम उन्होंने नहीं बताया। वे बोले कि संत हो गए अब गुरू का ही नाम लिया जाना उचित है। उन्होंने अपना गुरू रामकिशनदास को बनाया जो आगरा में रहते थे।
    संत रामदास आश्रम में धूणा रमाते और वर्ष में कई बार रामायण और भागवत के पाठ करवाते थे। 
वे जब यहां आए तब उन दिनों में भी असहाय छोड़ा हुआ गौ वंश यत्र तत्र भूख से तड़पता हुआ दिखाई पड़ता था। 
अमरता को प्राप्त संत रामसुख दास जी उन दिनों अपने हर उपदेश प्रवचन में इन असहाय गौ वंश बचाने की कहते थे। उनकी प्रेरणा से यहां सूरतगढ़ में संत आश्रम के पास में सन् 1992 के आसपास गौ वंश को बचाने का अभियान चलाया जाने लगा। इस अभियान में संत रामदास संयोजक बने और अनेक लोग इसमें जुड़ गए। उस समय गौ वंश के लिए खुले में ही घास तूड़ी आदि डाली जाती थी। इसके बाद सन् 1999 में संत आश्रम की सीताराम गौशाला की स्थापना हुई। उस समय संरक्षक रामदास जी बने। कार्यकारिणी का सन् 2005 में पंजियन कराया गया। 
    इस संत आश्रम और गौशाला के पास में ही ठाकुरजी का मंदिर बनाया गया। उसमें भी श्रद्धालुओं का आना जाना होता है।**

प्रथम लेखन 2 नवंबर 2011.
अपडेटेड 10 मार्च 2021.
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