सोमवार, 11 अप्रैल 2022

डुंगर राम गेदर ने महात्मा ज्योतिबा फुले के बारें में क्या कहा। कौन थे ये महात्मा.

 

* करणीदानसिंह राजपूत *

कुम्हार समाज ने महात्मा ज्योतिबा फुले की जयन्ती मनाई 


सूरतगढ़ 11 अप्रैल 2022.


अपना पूरा जीवन लोगो की हितो की लड़ाई लड़ने वाले महात्मा ज्योतिबा फुले की जयन्ती सोमवार को कुम्हार धर्मशाला में धूमधाम से मनाई गई।

 समिति के प्रवक्ता के अनुसार 19वीं सदी के सबसे बड़े समाज सुधारक रहे महात्मा ज्योतिबा फुले की जयन्ती के अवसर आज कुम्हार धर्मशाला में उनके चित्र पर माल्यापर्ण कर व पुष्प अर्पित कर याद किया गया। 


मुख्य अतिथि शिल्प एवं माटी कला बोर्ड़ के उपाध्यक्ष डूंगर राम गेदर ने कहा कि महात्मा ज्योतिबा फुले एक महान समाज सुधारक तो थे ही साथ में एक क्रांतिकारी, एक अच्छे विचारक,लेखक भी थे।





गेदर ने कहा की  महात्मा  ज्योतिबा फुले ने अपना पूरा जीवनकाल समाजसेवा में बिताया था। उन्होंने समाज में फैली कई बड़ी कुरीतियों को खत्म करने की लड़ाई लड़ी, समाज में होने बाल विवाह,छूआछूत ,जातिगत भेदभाव, साथ ही सती प्रथा का उन्होंने हमेशा विरोध किया।महिलाओ को समाज में उनका अधिकार दिलाने और उनके हकों को मजबूत करने के लिए उनकी शिक्षा का समर्थन किया।

 समाज में विधवा महिलाओ के पुर्नविवाह का समर्थन किया साथ ही देश में किसानो के प्रति उनके हक़ की लड़ाई में उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित किया था। 

समाज के हितों की लड़ाई लड़ने वाले महान समाजसेवी महात्मा  ज्योतिबा फुले का जीवन परिचय देते हुए  मुख्य वक्ता रामअवध यादव अपने उद्धबोधन में  कहा की  उनका जन्म 11 अप्रैल 1827 महाराष्ट्र के सतारा जिले कटगुण गांव की पावन धरा पर एक माली परिवार में हुआथा। ज्योतिबा फुले का पूरा नाम ज्योतिराव गोविंदराव गोन्हे,ज्योतिराव गोविंदराव फुले था। ज्योतिबा फुले का जन्म गरीब परिवार में हुआ इस वजह से उनका बचपन घर की आर्थिक तंगी के बीच गुजरा।ज्योतिबा फुले का पिता का नाम गोविंदराव था और इनकी माता का नाम चिमणा बाई था। ज्योतिबा फुले जब 1 साल के थे तब उनकी माता का देहांत हो गया था।  तब उनके पिता काफी दुखी हुए क्योकि उनका अब कोई सहारा नहीं था तब ज्योतिबा फुले का बचपन का सहारा बनी दाई सगुना बाई ने ज्योतिबा फुले को एक मां की तरह प्यार दुलार कर बचपन में लालन पोषण किया। 


अधिवक्ता बलराम कुकड़वाल अपने सम्बोधन में कहा की ज्योतिबा फुले के परिवार के बारे में ऐसा कहा जाता है की उनका परिवार अपने घर का खर्च और आम जरूरतों की पूर्ति के लिए बाग बगीचों में माली का काम किया करते थे और घरो में जा कर फूलो की माला बेचते थे।कहा जाता है की इसी वजह से इनका परिवार पीढ़ियों से "फुले " नाम से जाना जाता है। 


व्याख्याता राम कुमार टाक  ने अपने सम्बोधन में कहा कि दलितों के हक़ की लड़ाई लड़ने वाले मसीहा डॉ. भीमराव अंबेडकर जी भी ज्योतिबा फुले को अपना गुरु मानते थे। 


व्याख्याता गुरदीप नोखवाल  ने ज्योतिबा फुले के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा की जब वे 7 साल के थे तब उनकी शिक्षा के लिए उन्ही के गांव में स्कूल में दाखिला दिलाया गया,तब उन्हें स्कूल में जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा। यही नहीं उनको इस वजह से  स्कूल से भी निकाल दिया गया। लेकिन ज्योतिबा फुले इस बात को लेकर कभी परेशान नहीं हुए। वे इस बात से टूटे नहीं। 

ज्योतिबा फुले लक्ष्य के प्रति अडिग रहे और स्कूल से निकाले जाने के बाद भी उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी। उन्होंने अपनी दूसरी मां सगुना बाई की मदद से अपनी पढ़ाई जारी रखी। 

 साल 1847 में उनके पढ़ाई के प्रति उनके हुनर और प्रतिभा को देखकर उनके घर के पास ही में रहने वाले उर्दू-फारसी के शिक्षक ने उनका दाखिला एक अंग्रेजी स्कूल में करवा दिया और यहीं से उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूर्ण की। अपने जीवन पर बीती इन बातों के बाद ज्योतिबा फुले को आभास हुआ की शिक्षा के माध्यम से ही समाज के दलितों को न्याय दिलाया जा सकता है और इस तरीके से  ही इनको उनका  हक़ दिलाया जा सकता है। 


इस अवसर पर पधारे अन्य समाजबंधुओं ने भी ज्योतिबा फुले के जीवन के महत्वपूर्ण पलों पर प्रकाश डाला। 


आज के कार्यक्रम में समिति अध्यक्ष नत्थूराम कलवासिया,पोखर राम सिंगाठिया,बालूराम जालप,अनिल रोकणा,महेन्द्र गेदर,गुरदीप नोखवाल,सूरजभान माहर,राम नारायण जालप,ओम प्रकाश गेदर,दिनेश सरस्वा,सुभाष गेदर,धर्मपाल भोभरिया,समीर भोभरिया, पूनम राम करण प्रजापति,बृजमोहन प्रजापत,रणजीत खुड़िया,भगत गेदर, सेवटा,व्याख्याता राम कुमार टाक, सहित समाज के अनेक समाजबंधु मौजूद थे। मंच का संचालन सचिव पोखर राम सिंगाठिया  ने किया।०0०




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