मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

जज लोया मौत मामला:फोरेंसिक एक्सपर्ट ने जताई जहर से मौत की आशंका

नई दिल्ली। (सीबीआई जज बीएच लोया की मौत के मामले में ‘दि कारवां’ ने एक नयी रिपोर्ट प्रकाशित की है। जिसमें एक फोरेंसिक एक्सपर्ट के हवाले से कई सवाल खड़े किए गए हैं। मूलतः अंग्रेजी में प्रकाशित अतुल देव की पूरी रिपोर्ट का पेश है हिंदी में अनुवाद-संपादक)

सीबीआई जज लोया से जुड़े मेडिकल दस्तावेजों के परीक्षण के बाद भारत के सबसे बड़े फोरेंसिक विशेषज्ञों में से एक और दिल्ली स्थित ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के फोरेंसिक मेडिसिन और टॉक्सिकोलॉजी विभाग के पूर्व हेड डॉ. आरके शर्मा ने उनकी दिल के दौरे से हुई मौत के आधिकारिक दावे को खारिज कर दिया है। शर्मा के मुताबिक दस्तावेज मस्तिष्क में संभावित ट्रौमा के लक्षण को दिखाता है। और यहां तक कि जहर की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। शर्मा इंडियन एसोसिएशन ऑफ मेडिको-लीगल एक्सपर्ट्स के 22 सालों तक अध्यक्ष रहे हैं।

लोया की पोस्टमार्टम रिपोर्ट, संबंधित हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट, विसरा के नमूनों से जुड़ी रिपोर्ट जिसे केमिकल विश्लेषण के लिए भेजा गया था और फिर उस केमिकल विश्लेषण के नतीजों को पढ़ने के बाद शर्मा ने दि कारवां से बात की। इनमें से कुछ दस्तावेज सूचना के अधिकार के तहत हासिल किए गए हैं। जबकि कई दूसरे दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट से हासिल किए गए हैं। जिन्हें महाराष्ट्र सरकार द्वारा महाराष्ट्र स्टेट इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट की एक रिपोर्ट के समर्थन में जमा किया गया है। जिसमें लोया की मौत पर किसी तरह का संदेह न होने की बात कही गयी है। विशेषज्ञ के तौर पर शर्मा का मत इस नतीजे के खिलाफ जाता है।

शर्मा ने कहा कि “हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट में मायोकार्डियल इनफार्क्शन का कोई प्रमाण नहीं है।” उन्होंने कहा कि “इस रिपोर्ट के जरिये सामने आयी बातों में दिल के दौरे का कोई लक्षण नहीं है। वो बदलाव दिखाती हैं लेकिन वो दिल का दौरा नहीं है।”

शर्मा के मुताबिक “पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी कहती है कि नसों में कड़ापन देखा गया है। जहां कड़ापन होता है इसका मतलब है कि वहां हर्ट अटैक नहीं है। एक बार नसें जब कड़ी हो जाएंगी तो वो खून के बहाव को कभी नहीं बाधित करेंगी।”

कहा जा रहा है कि लोया ने मौत की रात सुबह 4 बजे परेशानी की शिकायत की और फिर सुबह 6.15 मिनट पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। शर्मा ने कहा कि “इसका मतलब है कि दो घंटे।” उन्होंने कहा कि “अगर कोई दिल के दौरे के लक्षण के बाद 30 मिनट तक जिंदा रहता है तब दिल की स्थिति में बिल्कुल साफ बदलाव दिखेगा। लेकिन यहां किसी तरह का स्पष्ट बदलाव नहीं देखा जा सकता है।”

पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है कि मौत का संभावित कारण “कोरोनरी आर्टरी इनसफीसिएंसी” है। शर्मा ने कहा कि “इन दस्तावेजों में दिल में बदलाव देखे गए हैं लेकिन उसमें से कोई भी ‘कोरोनरी आर्टरी इनसफीसिएंसी’ को निर्णायक तरीके से पुष्ट नहीं करता है। प्रत्येक मरीज जो एक बाईपास सर्जरी के लिए जाता है उसमें इस तरह के लक्षण दिखेंगे।”

शर्मा ने कहा कि “सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक मस्तिष्क और मेरुरज्जु को ढकने वाली झिल्लीनुमा परत यानी ड्यूरा मैटर सिकुड़ गयी है।” उन्होंने कहा कि “ड्यूरा मैटर सबसे बाहर की परत होती है जो ब्रेन को चारों तरफ से ढंकती है। ट्रौमा के केसों में ये क्षतिग्रस्त हो जाती है जो दिमाग में किसी तरह के हमले की संकेत करती है। एक शारीरिक हमला।”

लोया की बहन और महाराष्ट्र सरकार में एक मेडिकल के तौर पर कार्यरत डॉक्टर अनुराधा बियानी ने ‘दि कारवां’ को बताया था कि उन्होंने निधन के बाद अपने भाई के शव को जब पहली बार देखा था तो “शर्ट के पीछे गर्दन पर खून का धब्बा था।” बियानी डायरी लिखती रही हैं और लोया की मौत के समय की अपनी एक एंट्री में उन्होंने लिखा था कि “उनके कॉलर पर खून था।” लोया की एक और दूसरी बहन मंधाने ने भी ‘दि कारवां’ से बात करते हुए ‘गर्दन पर खून’ का जिक्र किया था। इसके साथ ही उन्होंने कहा था कि “उनके सिर पर खून और एक चोट का निशान था......पीछे की तरफ।” जज के पिता हरकिशन लोया ने ‘दि कारवां’ को बताया था कि उन्हें याद है, “कपड़े पर खून के धब्बे थे।”

महाराष्ट्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में जमा दस्तावेजों में लोया के नाम से नागपुर के मेडिट्रिना अस्पताल, जहां लोया को मृत घोषित किया गया था, वहां का एक बिल था। हालांकि मेडिट्रिना अस्पताल के कर्मचारियों का कहना है कि लोया को दिल की बीमारी के साथ लाया गया था। यह दस्तावेज बगैर किसी स्पष्ट व्याख्या के बीमारी को बिल आइटम में न्यूरोसर्जरी के तौर पर दर्ज करता है।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट इस बात को रिकार्ड नहीं करती है कि ड्यूरा मैटर में कितना संकुचन देखा गया था। शर्मा ने कहा कि उन्हें इस बात का बेहद अचरज है कि “ड्यूरा मैटर क्यों सिकुड़ा हुआ है उसका कारण नहीं लिखा गया है।” पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर नजर दौड़ाते हुए शर्मा ने कहा कि “इसमें एक जहर की भी आशंका है।” “हर एक अंग सिकुड़ा हुआ है।” लीवर, पैंक्रियाज, इस्प्लीन, किडनी, ओसोफागस और फफड़े समेत दूसरे अंगों की रिपोर्ट में सिकुड़न दर्ज की गयी है।

लोया के विसरा की केमिकल रिपोर्ट जिसे मौत के 50 दिन बाद पेश किया गया है किसी तरह के जहर की पहचान नहीं करती है। विसरा का परीक्षण नागपुर स्थित रीजनल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी में किया गया था। इसमें बताया गया है कि परीक्षण लोया की मौत के 36 दिन बाद 5 जनवरी 2015 को शुरू किया गया और 14 दिनों बाद 19 जनवरी 2015 को खत्म किया गया। शर्मा ने सवालिया लहजे में पूछा कि “इसे पूरा करने में इतना समय क्यों लगा”? “आमतौर पर इसमें एक या दो दिन का समय लगता है (परीक्षण को पूरा करने के लिए)”।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद लोया के विसरा के नमूने की कस्टडी की श्रृंखला ऐसा लगता है टूट गयी थी। महाराष्ट्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में जमा दस्तावेजों के मुताबिक लोया की मौत से संबंधित एक जीरो एफआईआर सबसे पहले नागपुर के सिताबुर्दी थाने में दर्ज की गयी थी। सीताबुर्दी थाने ने पोस्टमार्टम की व्यवस्था की। जिसे एक दिसंबर को सुबह 10.55 से सुबह 11.50 के बीच नागपुर स्थित सरकारी मेडिकल कालेज में पूरा किया गया। केमिकल परीक्षण के लिए नमूने भी उसी समय लिए गए। उसके बाद एफआईआर को नागपुर के सदर पुलिस स्टेशन को स्थांतरित कर दिया गया। हालांकि ऐसा क्यों किया गया इसका कारण अभी तक नहीं बताया गया है। जहां रिकार्ड दिखाता है कि वो शाम को चार बजे दर्ज किया गया। फिर सदर थाने से लोया के उत्तकों (टिश्यू) के नमूनों को जरूरी पत्र के साथ परीक्षण के लिए डिस्पैच कर दिया गया। ये साफ नहीं है कि लोया के उत्तकों के नमूने सदर थाने में दर्ज एफआईआर और पोस्टमार्टम के बीच के घंटों में कहां और किसके साथ थे या फिर किसकी निगरानी में उन्हें सदर थाने को सौंपा गया था। न ही इस बात को साफ किया गया है कि पोस्टमार्टम के बाद नमूनों को सीधे सीताबुर्दी थाने से फोरेंसिक लेबोरेटरी क्यों नहीं भेजा गया। इसके अलावा लोया के शरीर की स्थिति, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज लोया की मौत के संभावित कारणों और लोया के विसरा नमूनों की रिपोर्ट जिसे परीक्षण के लिए भेजा गया था के बीच कोई साम्य नहीं है- जिसकी सच्चाई ये है कि बाद वाले को पूरी तरह से पहले पर आधारित रहना है। रिगर मोर्टिस नाम का एक दूसरा क्षेत्र जिसका मतलब ये दर्ज करना है कि जांच के समय कोई शरीर कितनी कड़ी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है कि “ऊपरी लिंबों में थोड़ा मौजूद है (और) निचले लिंबों में नहीं दिखती है।” उसी क्षेत्र में विसरा रिपोर्ट कहती है कि रिगर मोर्टिस “पूरी तरह से चिन्हित”। रिगर मोर्टिस एक ही समय “थोड़ा मौजूद” और “पूरीज तरह से चिन्हित” नहीं हो सकती है। मौत के संभावित कारण का मत शीर्षक के तहत एक क्षेत्र में पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है, “कोरोनरी आर्टरी इनसफीसिएंसी”। उसी क्षेत्र में विसरा रिपोर्ट में नोट है, “अचानक मौत का एक मामला”। केस की स्टोरी के एक क्षेत्र में विसरा रिपोर्ट कहती है, “स्वाभाविक मौत का एक मामला।” जिसमें “स्वाभाविक मौत” को अंडरलाइन किया गया है। और लोया के मृत शरीर को पोस्टमार्टम के लिए भेजे जाने से पहले सीताबुर्दी थाने में अचानक मौत की एक रिपोर्ट दर्ज की गयी थी। पोस्टमार्टम और विसरा दोनों की रिपोर्टों को नागपुर के सरकारी मेडिकल कालेज में तैयार किया गया था। विसरा रिपोर्ट को सूचना के अधिकार के आवेदन के जरिये हासिल किया गया था। जो बिल्कुल साफ कहता है कि इसमें शामिल सूचनाएं निश्चित तौर पर पोस्टमार्टम की रिपोर्ट पर आधारित होनी चाहिए। और उसे पोस्टमार्टम के तुरंत बाद उसी डाक्टर के द्वारा तैयार किया जाना चाहिए जिसको उसने अंजाम दिया है। लोया के मामले में सरकारी मेडिकल कालेज के फोरेंसिक विभाग द्वारा भरे गए फार्म का शीर्षक है, “फार्म जिसमें पोस्टमार्टम परीक्षण की रिपोर्ट का इस्तेमाल किया जाना है जब केमिकल परीक्षण के लिए विसरा को आगे भेजा जाएगा।” दिल्ली स्थित एम्स के फोरेंसिक विभाग में कार्यरत एक डॉक्टर ने इस बात की पुष्टि की कि सामान्य प्रक्रिया ये है “पोस्टमार्टम रिपोर्ट की सूचना को फार्म में कापी करें” केमिकल परीक्षण के लिए विसरा के साथ उसे भी भेज दिया जाता है। शर्मा भी उसी बात को कहते हैं। लोया के मामले में पोस्टमार्टम और विसरा की रिपोर्ट दोनों पर सरकारी मेडिकल कालेज के एक लेक्चरर डॉ. एनके तमाराम के हस्ताक्षर हैं- और फिर भी एक ही डाक्टर ने बिल्कुल साफ तरीके से विरोधाभासी रिपोर्टें तैयार की है। ऐसी रिपोर्टें जिन्हें संभवतः तकरीबन एक साथ तैयार किया गया है। यहां तक कि मौत के संभावित कारणों जैसी एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट। जब ‘दि कारवां’ ने तमाराम से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि वो केस के बारे में कुछ नहीं बोल सकते हैं क्योंकि मामला अभी कोर्ट में है।

अपनी मौत के समय लोया 48 साल के थे। वो स्मोकिंग या ड्रिंक नहीं करते थे और दिल की बीमारी का उनका कोई पारिवारिक इतिहास भी नहीं था। अनुराधा बियानी ने पहले ‘दि कारवां’ को बताया था कि “हमारे पिता-माता 85 और 80 साल के हैं और पूरी तरह से स्वस्थ हैं उन्हें दिल की कोई बीमारी नहीं है।” उन्होंने आगे कहा कि लोया “हमेशा से एक मद्यत्यागी थे, सालों से रोजाना दो घंटे टेबल टेनिस खेलते थे और उन्हें कोई डायबटीज या ब्लड प्रेसर नहीं था।”

डॉ. आरके शर्मा फोरेंसिक और मेडिको-लीगल मुद्दों पर पांच किताबें लिख चुके हैं। और बहुत सारे मौकों पर जजों और सरकारी वकीलों को प्रशिक्षण देने के साथ ही उन्हें लेक्चर भी दे चुके हैं। वो सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन के एक कंसल्टैंट थे। और अमेरिका की फेडरल ब्यूरो आफ इन्वेंस्टिगेशन समेत कई जांच एजेंसियों द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में बुलाए जाते रहे हैं। इनमें से ज्यादातर सेमिनार फोरेंसिक मेडिसिन और टाक्सिकोलाजी के विषयों पर आधारित रहते थे।

दस्तावेजों को पढ़ते हुए शर्मा ने कहा कि “इसमें इन्वेस्टिगेशन होना चाहिए।” बाद में उन्होंने इस बात को दोहराया कि “इन दस्तावेजों में पेश गयी स्थिति एक जांच की मांग करती है।”


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