Thursday, October 19, 2017

लेखन एवं पत्रकारिता के साथ मेरा 73 वें वर्ष में आनन्ददायी प्रवेश-करणीदानसिंह राजपूत:




अपने मन​ की बात


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मेरे जन्मदिन की तिथि 19 अक्टूबर इस बार दीपावली के हर्षोल्लास​ पर्व दिवस पर है जिसे संपूर्ण भारत स्वच्छता और प्रकाश के पर्व रूप में क्षेत्रीय परंपराओं से उत्साह से मनाता है। हर्ष और उत्साह हमारे मानव जीवन को जीने का आदर्श आधार है। मेरे जीवन को हर्ष और उत्साह आपके सहयोग से मिलता रहा है और आगे भविष्य में भी निर्विघ्न मिलता रहेगा। यह सहज रूप में मैं आशा करता हूं। मैं इसके लिए आपका आभारी हूं और आगे भी रहूंगा। मेरी सोच समझ और लेखन में आपकी आलोचना समालोचना से सदा प्रकाश रहेगा। मुझे यह पक्का विश्वास है।

मेरे पत्रकारिता एवं लेखन के बावन वर्षों के  आनन्ददायी अनुभवों व महान लेखकों पत्रकारों की रचनाओं को पढ़ते और उनसे मिलती रही प्रेरणा से मेरे जीवन के बहतर वर्ष पूर्ण हुए एवं 19 अक्टूबर 2017 को तिहेतरवें वर्ष में प्रवेश की सुखद अनुभूति। पत्रकारिता एवं लेखन में नये आने वाले साथी भी अनेक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करते हैं और मैंने बेहिचक उन्हें भी आत्मसात किया है। पत्रकारिता तो सदा ही चुनौतीपूर्ण रही है,चाहे कोई युग रहा हो व किसी की भी सत्ता रही हो।

मैं अपनी बात कह रहा था।


सीमा क्षेत्र का छोटा सा गांव जो अब अच्छा कस्बा बन गया है अनूपगढ़ जिसमें मेरा जन्म हुआ। माता पिता हीरा रतन ने और परिवार जनों ने वह दिया जिसके लिए कह सकता हूं कि मेरी माँ बहुत समझदार थी और पिता ने संषर्घ पथ पर चलने की सीख दी।

जयपुर के साप्ताहिक ज्वाला में मेरा लेख पहली बार  15 जुलाई 1965 को छपा। 'जल: जीवन और स्वास्थ्य कार्यकर्ता दाता' पहला लेख जीवन विज्ञान पर था।

सन् 1965 में दैनिक वीर अर्जुन नई दिल्ली में खूब छपा और सरिता ग्रुप जो बड़ा ग्रुप आज भी है उसमें छपने का गौरव मिला।हिन्दी की करीब करीब हर पत्रिका में छपने का इतिहास बना।

धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छपना गौरव समझा जाता था। दोनों में भी कई बार छपा।

छात्र जीवन में वाचनालय में दिनमान पढ़ता था तब सोचा करता था कि इसके लेखक क्या खाते हैं कि इतना लिखते हैं। वह दिन भी आए जब दिनमान में भी लेख खूब छपे।


सन् 1974 में प्राणघातक हमला हुआ। राजस्थान की विधानसभा में कामरोको प्रस्ताव 20 विधायकों के हस्ताक्षरों से पेश हुआ। 48 विधायक बोले और फिर संपूर्ण सदन ही खड़ा हो गया था। मुख्यमंत्री को खड़े होकर सदन को शांत करना पड़ा था। राजस्थान विधानसभा की प्रतिदिन की कार्यवाही उन दिनों छपती थी। मेरे पास वह एक प्रति है। सात दिनों तक यह हंगामा किसी न किसी रूप में होता रहा था। बीबीसी,रेडियो मास्को, वायस ऑफ अमेरिका सहित अनेक रेडियो ने दुनिया भर में वह घटना प्रसारित की। देश के करीब करीब हर हिन्दी अग्रेजी अखबार में संपादकीय छपे।

आरएसएस का पांचजन्य,वामपंथी विचारधारा और जवाहर लाल नेहरू के मित्र आर.के.करंजिया का ब्लिट्ज,कांग्रेसी टच का करंट और समाजवादी विचार धारा के जॉर्ज फरनान्डीज के 'प्रतिपक्ष 'में 1974-75 में खूब छपा। प्रतिपक्ष साप्ताहिक था जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नींद हराम करके रखदी थी और बाद में तो इस पर आपातकाल में प्रतिबंध लग गया था।

 आपातकाल  1975 अत्याचार का काल था जिसमें मेरा साप्ताहिक भारत जन भी सरकारी कोपभाजन का शिकार बना। पहले सेंसर लगाया गया। सरकार की अनुमति के बिना कोई न्यूज छप नहीं सकती थी। विज्ञापन रोक दिए गए। अखबार की फाइल पेश करने के लिए मुझे श्रीगंगानगर बुलाया गया और  30 जुलाई 1975 को वहां गिरफ्तार कर लिया गया। आरोप लगाया गया कि पब्लिक पार्क में इंदिरा गांधी के विरोध में लोगों को भड़का रहा था। एक वर्ष की सजा भी सुनाई गई। सवा चार माह तक जेल मे बिताए और उसके बाद एक संदेश मिला बाहर कार्य करने का। उस संदेश के  मिलने पर 3 दिसम्बर 1975 को जेल से बाहर आया। आपातकाल में बहुत कुछ भोगा। मेरी अनुपस्थिति में छोटी बहन,पिता और नानी को क्षय रोग ने ग्रस लिया। इलाज तो हुआ वे ठीक भी हुए लेकिन वह काल बड़ा संघर्षपूर्ण रहा। परिवार ने कितनी ही पीड़ाएं दुख दर्द भोगे मगर यह अनुभव राजपूती शान के अनुरूप था।

गरीबों व पिछड़े लोगों व ग्रामों आदि पर लिखने की एक ललक थी कि दैनिक पत्रों में लिखा जाए तब 1969 में सरकारी पक्की नौकरी छोड़ कर लेखन के साथ पत्रकारिता में प्रवेश किया। अनेक अखबारों में लिखता छपता हुआ सन 1972 में राजस्थान पत्रिका से जुड़ा और 15 मई 2009 तक के 35 साल का यह सुखद संपर्क रहा।

राजस्थान पत्रिका का एक महत्वपूर्ण स्तंभ कड़वा मीठा सच्च था। इस स्तंभ में लेखन में घग्घर झीलों के रिसाव पर सन् 1990 में लेखन पर सन् 1991 में राज्य स्तरीय प्रथम पुरस्कार मिला। इंदिरागांधी नहर पर 12 श्रंखलाएं लिखी जो सन् 1991 में छपी तथा दूसरी बार 1992 में पुन: राज्य स्तरीय प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। राजस्थान की शिक्षा प्रणाली पर व्यापक अध्ययन कर दो श्रंखलाओं में सन् 1993 में प्रकाशित लेख पर तीसरी बार राज्य स्तरीय प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके बाद सन 1996 में राजस्थान की चिकित्सा एवं स्वास्थ्य पद्धति पर व्यापक अध्ययन कर 4 श्रंखलाएं  लिखी। इस पर सन् 1997 में राज्य स्तरीय दूसरा पुरस्कार मिला।

राजस्थान पत्रिका के श्रद्धेय कर्पूरचंद कुलिश का मेरे पर वरद हस्त रहा और उन्होंने जोधपुर में पत्रकारों के बीच में कहा कि मैं तुम्हारे हर लेख को पढ़ता हूं। यह एक महान गौरववाली बात थी। गुलाब कोठारी और मिलाप कोठारी एक घनिष्ठ मित्र के रूप में आते मिलते और अनेक विषयों पर हमारी चर्चाएं होती। माननीय गुलाब जी सुझाव लेते और वे पत्रिका में लागू भी होते। गुलाब कोठारी ने श्रीगंगानगर में सर्वश्रेष्ठ संवाददाता के रूप में सम्मानित किया तब कई मिनट तक एकदूजे से गले मिले खड़े रहे। आज भी पत्रिका परिवार के साथ घनिष्ठ संबंध हैं।

9 अगस्त 1997 को शिक्षा संस्थान ग्रामोत्थान संगरिया में पत्रकारिता में सम्मानित किया गया।

    रामनाथ गोयनका के इंडियन एक्सप्रेस का विस्तार जब जनसत्ता दैनिक के रूप में हुआ तब जनसत्ता दिल्ली में खूब छपा। जब चंडीगढ़ से छपने लगा तब वहां के संपादकओमप्रकाश थानवी के अनुरोध पर उनके कार्यकाल में चंडीगढ़ में भी खूब छपा। साप्ताहिक हिन्दी एक्सप्रेस बम्बई में भी अनेक लेख छपे।

राजस्थान की संस्कृति,सीमान्त क्षेत्र में घुसपैठ,तस्कर,आतंकवाद पर भी खूब लिखा गया। पंजाब के आतंकवाद पर टाइम्स ऑफ इंडिया बम्बई ने लिखने के लिए कहा तब कोई तैयार नहीं हुआ। वह सामग्री वहां से छपने वाली पत्रिका धर्मयुग में छपनी थी। मैंने संदेश दिया और मेरा लेख सन् 1984 में दो पृष्ठ में छपा। धर्मयुग में लेख छपना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। धर्मयुग में बाद में कई लेख प्रकाशित हुए।

मेरे लेख और कहानियां बहुत छपी।

आकाशवाणी सूरतगढ़ से वार्ताएं कहानियां कविताएं रूपक आदि बहुत प्रसारित हुई हैं।

इंदिरागांधी नहर पर दूरदर्शन ने एक रूपक बनाया जिसमें कई मिनट तक मेरा साक्षात्कार रहा। वह साक्षात्कार मेरे इंदिरागांधी नहर पर लेखन के अनुभवों के कारण लिया गया। दूरदर्शन के दिग्गज प्रसारण अधिकारी के.के.बोहरा के निर्देशन में वह साक्षत्कार हुआ व राष्ट्रीय स्तर पर प्रसारण हुआ।

मेरा लेखन कानून नियम विरुद्ध सामाजिक दायित्व के लिए सच्च के प्रयास में रहा। कई बार ऐसा लेखन अप्रिय भी महसूस होता है लेकिन जिन लाखों लोगों के लिए लिखा जाता है,उनके लिए आगे बढऩे का कदम होता है।

मेरे परिवार जन,मित्रगण और कानून ज्ञाता जो साथ रहे हैं वे भी इस यात्रा, में सहयोगी हैं। मेरे लेखन में माता पिता की सीख रही है।

मैंने मेरे पूर्व के लेखों में लिखा है कि लिखने बोलने की यह शक्ति ईश्वर ही प्रदान करता है और वह परम आत्मा जब तक चाहेगा यह कार्य लेखन और पत्रकारिता चलता रहेगा और लोगों का साथ भी रहेगा।

मेरी वेब साईट  www.karnipressindia.com आज अत्यन्त लोक प्रिय साईट है जो देश और विदेश में प्रतिदिन हजारों लोग देखते हैं।

आपका शुभेच्छु,

करणीदानसिंह राजपूत,

राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क सचिवालय से

अधिस्वीकृत स्वतंत्र पत्रकार,

सूरतगढ़ / राजस्थान/ भारत 

91 94143 81356.

मेरा ई मेल पता.   karnidansinghrajput@gmail.com

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