Tuesday, November 29, 2011

देवी रो रूप राजस्थानी कहाणी करणीदानसिंह राजपूत

राजस्थानी कहाणी

        देवी रो रूप

        करणीदानसिंह राजपूत

राममूरती रे देवी रूप रा दरसण करण री होड़ मचरी। गांव का घणसरा लोग लुगाई अर टाबर टिंगर राम मूरती रे घर की लांबी चौड़ी बाखळ में एक दूजे रै उपरोथळी होवता सगळा सूं आगै जार राममूरती ने नेड़े सूं देखण री जुगत में लाग्योड़ा हा।
राता गाभा में राममूरती हाथ में जोत लियोड़ी देवी री मूरती रै आगै नाचण लाग रैयी ही। जोत की ऊंची ऊंची उठती लपटां  में बींरो चेरो लाल अर आंख्या भी लोई सी राती दीख री। बींरै सिर पर सूं ओढ़णी उतर गई अर केस खुला हो र बिखर ग्या हा ।
राममूरती रै नेड़े बैठ्या लोग लुगाई ढ़ोल नगाड़ा ताल चिमटा डेरू बजावण लाग रैया हा।
चाणचकै रामूरती जोर जोर सूं फूंकारा मारण लागी। बींरो नाच गेड़ चढ़ग्यो हो । बा जोत नै जोरां सूं घुमावण लागी।
लोग एकै सागै ही चिल्लाया।
देवी आयगी। देवी आयगी। राममूरती में देवी आयगी।
राममूरती रै हाथ सूं  एक जणै जोत झाल ली। राममूरती रे नाच रो गेड़ घणी दूरी तक हो गयो । बा पसीना पसीना हुयगी ही।
बींरै घाघरै री फटकार लोगां कै लागती अर जोरा सूं जैकारो लागतो।
देवी मैया की जै हो  राममूरती मैया की जै हो।
आधै घंटे ताईं नाच चालतो रैयो अर ढोल डेरू बाजता रैया।
राममूरती देवी मूरत रे सामीं बैठगी पण बींगो झूमणों चालू रैयो।
एक आदमी जैकारो लगा र चिल्लायो, बूझो बूझो राममूरती मैया में देवी की छाया आ गई है। बेगा बेगा बूझ ल्यो।
लोग लुगायां राम मूरती रै नेड़े जावण लाग्या।
बो आदमी एकर फेरूं जोरां सूं चिल्लातो सो बोल्यो,कोई रह ज्यावैला तो आगले अदीतवार ताईं अडीकणो पड़ेगो।
लोग अर लुगाईयां एक एक कर आप आपरी समस्यावां राखण लाग्या।
लोग राममूरती रै आगै सिर निवाता अर सवाल पूछता। कई सुबकता सुबकता तो कई  रोवता रोवता आंगणे माथे सिर रगड़ता रगड़ता सवाल राख्ता। कोई खेती रो। कोई काम धंधे रो। कोई अदालत कचहरी री समस्या रो हल पूछतो। लुगाईयां रा घणकरा सवाल छोरे छोरी रे ब्याव सारूं हा। कई लोगां तो काम धंधे रै होवण सारूं मन्नत भी मानी।
    राममूरती री चरचा सुण पड़ोस आळै गांव सूं आयोड़ी सांतीदेवी भी दरसण सारूं भीड़ में मौजूद बैठी ही। सांतीदेवी भी भीड़ रे सागै सागै जैकारा लगावण लाग रैयी ही।
घणकसरा सवाल हो ग्या।
एक आवाज ओरूं आई। कोई बूझणे सूं बाकी रह ग्यो होवे तो आपरी समस्या सामी राखदो।
सांतीदेवी डरती डरती सी आगै आई। उण राममूरती रै पगां रै धोक लगायो।
बा बोली-देवी मां मेरे बेटे रो दारू छुड़ा दे। म्हूं थारै आगै सवा सौ रिपीयां रो सीरो परसाद में चढ़ाऊंली अर चूणरी गाभा भेंट करूंली। बा एक ताळ बोलगी।
राममूरती सांतीदेवी सांमी झांक्यो। बींरी आंख्या री ललाई अर बिखरोयाड़ा केसां सूं एकर कर सांतीदेवी डर गई।
सांती देवी पाछी नै खिसक गई।
राममूरती चिल्लाई,कांई कैयो? तेरे बेटे रो दारू छुडावणो है। राममूर्ती हा हा कर हंसण लागी।
तेरे बेटे रो दारू.... म्हूं तेरे बेटे रो छोड़ पड़ोसियां ताईं रो दारू छुड़वा दूं। तूं कुणै में जा र बैठ ज्या। जोत री बभूती ले र जाई। तनै म्हारे हाथ सूं बभूती देस्यूं।
राममूरती सूं सवाल करण वाळा लोग लुगाई एक एक कर निकळता रैया। भीड़ छंटगी।
राममूरती भी झूमणो बंद कर सुस्तावण लागी। देवी री छाया हटगी। आंगणै मांय भभूती लेवण सारूं सांतीदेवी बैठी ही अर राममूरती रो पड़ोसी इमरताराम बैठ्यो हो।
इणी बगत एक जवान छोरो दारू में टिल्ला खांवतो आयो। छोरै रै दारू कीं घणी पीयोड़ी ही।
छोरो राममूरती खनै गयो। उण राम मूरती रो बुकियो झाल र कैयो - माऊ, ऐ माऊ।  तेरी देवी चली गई हुवै तो मनै रोटी घाल दे। घणी जोरां सूं  भूख लाग रैयी है।
छोरो झूमतो फेर बोल्यो,देख लेई। कोई चूरमो चारमे रो परसाद आयो हुवै तो मीठे रो भोग भी लगा लेस्यूं।
राममूरती न बोली न चाली। आपरै दारूडिय़े बेटे ने थाम दूजे कोठडिय़े में लेगी।
    सांतीदेवी राममूरती अर बींरै बेटे नै कोठडिय़े में जांवतां नै देखती रैयी। बिंयारै कोठडिय़े में जाणै रे पाछेै सांतीदेवी  इमरताराम खानी झांक्यो। पड़ोसी नै साांतीदेवी री आंख्यां में सवाल तिरतो दिख्यो।
पड़ोसी सांतीदेवी सांमी देख्तो बोल्यो - आ राममूरती तेरे बेटे री दारू कियां छुड़ासी। इंगो खुद रो घर तो दारूडिय़ां सूं भरयो है। घर मांयने सगळा दस जीवां में राम मूरती अर बेटे री बहु, एक चार साल रे नानिये अर अस्सी साल रे डोकरे सुसरे नै छोड़ सगळा दारूडिय़ा है। एक तो आपणै सांमी टिल्ला खांवतो आयो है। बाकी रा टिल्ला खांवता थोड़ी ताळ में आ ज्यासी। ईं घर में तो सिंझया रै बख्त रोजीनां रा खेल होवे है।
सांतीदेवी बोली-म्हूं घणी आस लेर आई ही,पण म्हारा करम फूट्योड़ा है।
बा थकी हारी सी राममूरती रै घर सूं बारै निकळी। बींरै सागै ही पड़ौसी भी बारै निकल्यो।
गळी में सिंझ्या रो अंधकार घिरणो सरू हो ग्यो हो।
इमरताराम बोल्यो, ऐ भाण,अंधकार मांयनै झाड़ झंखाड़ रै रास्ते दस किलोमीटर दूरी किंयां जावैगी। फेर भूखी तीसी। कोई सांप परड़ोट डस डसा लेसी। ईंयां कर। म्हारै घर चाल र रोटी टुकड़ो खा र रात बांसिंदो करलै। झांझरके तेरे गांव नै निकळ जाई।
सांतीदेवी रै बात जंचगी- आच्छो बीरा,तूं कहवै तो ठीक है।
बा पड़ौसी रै घर मांयनै रोटी टुकड़ो कर बाखळ में चारपाई माथै पसरगी। थकी हारी नै थोड़ी  ताळ में नींद फिरगी, पण नजीक सोर सराबो होवण लाग्यो जणां नींद उचटगी। बा बैठगी। सोर सराबो राममूरती रै आंगणे खानी सूं आ रैयो हो।
राममूरती रो आंगणो पड़ोसी इमरताराम री बाखळ की बाड़ रै ऊपर स्यूं दिखतो हो।
सांती देवी बाड़ रै खनै जा र खड़ी हो राममूरती रै आगणै में झांकण लागी। इमरताराम री नींद उचटी अर बो भी सांतीदेवी रै खनै जा खड़्यो हो र राममूरती रै आंगणै में झांकण लाग्यो।
राममूरती अर दस पन्द्रह आदमी लालटेन रे चांदणै मांय देवी मूरती रै आगै खड्या हा। आदमी एक एक कर देवी मूरती  रै ऊपर बोतल उल्टी करता जिण सूं एक धार मूरती  रै ऊपर गिरती दिखती। राममूरती आपरै हाथां सूं मूरती नै असनान करावण लागरी ही।
सांतीदेवी आपरै हिरदै मांय सोचण लागी-ओ। देवी नै रात नै असनान। कोई खास पूजा होवेली
बा सोच रैयी ही कै हवा रै एक फटकारेै सागै एक भभको आयो अर बींरै बाद तो लगोतार बास ई बास आवण लागी।
सांतीदेवी बास सूं पिछाणगी।
लोग देवी री मूरती नै दारू रो असनान करा दारू रो इज भोग लगावण लाग रैया हा। एक कटोरै में दारू घालर देवी रै होठां खनै ले जावता।
अरोगो। माई। अरोगो।
दारू रो भोग लगायां बाद में कटोरो खनै पड़ी एक टोकणी  में मूंधा देता।
मूरती नै असनान करायां सूं आगै भेळै  होते दारू नै लोग आपरै चळू में भरता अर जैकारो लगा र पीता जावता।
जै देवी मैया री।
जैकारे री आवाज रै सागै परसाद रूप  मांयनै दारू पीवण वाळा में राममूरती रा बेटा भी सामल दिख्या। जका नै इमरताराम पिछाण रैयो हो। बो सांती देवी नै बतावण लाग्यो।
सांतीदेवी इमरताराम सूं बोली- देवी नै दारू रो असनान अर भोग।
इमरताराम  बोल पड़्यो- बाई तूं तो बावळी है। तूं तो एक रात मांयनै दारू रो भोग ही देख्यौ है। म्हूं तो अठै आधी आधी रात नै घणकरी बार मिमयाणै री आवाजां रै सागै लोगां री आवाजां भी सुणी है।
सांतीदेवी पूरै टोर सूं सुण रैयी ही।
इमरता राम आगे बोल्यो- देवी मैया भख ले, देवी मैया भख ले री आवाजां आंवती जणा मूरती रै चारूं खानी लोगां रो घेरो होवतो। घेरे मांयनै लोग देवी नै जिकौ भख देता बो निजरां मांयनै तो नईं आवंतो। पण मिमयाणे री आवाजां सूं अड़ोस पड़ोस अर सगळै गांव नै मालम है कै रात मांय कांई कांई होवै।
इमरताराम राज खोलतो सो बोल्यो-गांव आळा राममूरती अर देवी परकोप सूं डरता बोलणो टोकणो तो दूर कोई झांकण री कोसिस भी नीं करै। राममूरती इतौ डर लोगां मांयनै बिठा राख्यौ है।
सांतीदेवी ठेठ गांवरी लुगाई पण उमर रै तकाजै सूं जाणकारी राखण सारूं पूछ्यो-अठै सरकारी ओहदेदार है जका तो कीं कर सकै है, तो बै सगळा कींकर चुप है।
इमरताराम फेरूं राज खोल्यो- सरकारी ओहदेदार आधा पड़ता तो परसाद लेवण में सामल हो जावै अर कीं दो चार हैँ जिका कुळमुळावै जरूर है पण राममूरती सागै कोई पंगो नीं लेणो चावै। सुण्यो है कै पुलिसवाळा भी परसाद लेर जावै।
सांती देवी फेरूं पूछ्यो- आ किसी देवी है। इण देवी रो कांई नांव है। जबर देवी है जिकै सूं सगळो गांव डरै है।
इमरताराम बोल्यो- इण देवी रो नांव रो तो मालम नईं। राममूरती आज तांई नांव नईं बतायो। हां। इतरो जाणूं हूं कै आ देवी मूरती सात आठ साल पैल्यां राममूरती ही थरपी ही। ईं मूरती री किरपा सूं राममूरती अर ढोल डेरू बजावणियां रे घरबार रा आच्छाा खरचाा चालै।
इमरताराम कीं सुस्तायो अर बाद मांय बोल्यौ- मनै तो गांव मांय बस्या नै पांच साल हुया है। मनै तो आ जाणकारी मिळी ही कै राममूरती रै घर मांय पैल्यां भूख रो बासो हो। घर रा मरद निकम्मा अर काम धंधे सूं सौ कोस दूर भागणिया हा। ईं मूरती री थरपना रै बाद सूं राम मूरती रै धर सागै घणकरा घरां सूं भूख भाग गी।
बो सांतीदेवी नै समझावतो बोल्यो- जिकी राममूरती खुद देवी नै दारू रो भोग लगावै अर लोगों सूं भी लगवावै बा तेरे बेटे री दारू कीयां छुडवा देसी। राममूरती रा बेटा दारू रो परसाद लेवता लेवता दारूडिय़ा बण ग्या।
इमरताराम बाल्यो- आधी रात हुयगी। अब सो ज्या।
थकी हारी सांती देवी बाड़ कानी पुठ कर चारपाई माथै पसरगी। थोळी ताळ मांय बींगै अधकचरी नींद फिरगी।
बींनै सुपणो आवण लाग्यौ। बीं रै बेटे दारू छोड दी है। बा खुसी खुसी हंसती गावती लाडू बाटण लागरी है।
बींरी नींद खुली जणा मालम पड्यौ। इमरताराम बीं ने जगावण लाग रयौ हो। झांझरको हो ग्यो हो।
बा बोली- इमरता भाई, मनै तो सुपनो आ रयो हो कै मेरे बेटे दारू छोड दी है। सुण्यो है कै झांझरके रो सुपनो सांचो हुवै है।
बा खुसी खुसी आगै बोली- मनै लागै है के आ देवी मां रे दरसणा री किरपा है। मेरी मन्नत इतरी बेगी पूरी हुयगी।
इमरताराम बींरै मुंडे सामीं देखण लाग्यौ। बींरै मूंडे सूं रोकता रोकता निकळ ही गया- इण तरियां रै भोळा भाळा लोगां रे ताण राममूरती री देवी रो जयकारो होवतो रैसी।
करणीदानसिंह राजपूत   
स्वतंत्र पत्रकार,
23, करनाणी धर्मशाला,
सूरतगढ़  राजस्थान
मोबा.  94143 81356                     
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Monday, November 28, 2011

शक्करकंद का नागिन स्वरूप : शिवलिंग पर चढ़ाई गई
करणीदानसिंह राजपूत
सूरतगढ़, 28 नवम्बर 2011. अनेक बार प्रकृति में अजब गजब विचित्र और आश्यर्चजनक घटनाएं होती हैं और इसी प्रकार की वस्तुएं मिलती हैं। इसी तरह के चित्र बनते हैं। फलो व सब्जियों में भी अनेक बार विचित्रता देखने को मिलती है।
    करीब दस बारह दिन पहले शक्करकंद खरीदी गई। उसमें एक शक्करकंद का स्वरूप नागिन का था। धार्मिक आस्था स्वरूप श्रीमती विनीता सूर्यवंशी ने पूजन अर्चन के साथ वार्ड नं 14 के हनुमान मंदिर में स्थापित शिव लिंग पर चढ़ाया। उस नागिन सवरूप शक्करकंद के दोनों ओर के चित्र यहां पर प्रदर्शित हैं।

Wednesday, November 2, 2011

भगवान शिवधूणा संतआश्रम सूरतगढ़: सीताराम गौ शाला




संत आश्रम सूरतगढ़ में भगवान शिव का अखंड धूणा- फोटो करणीदानसिंह राजपूत
संत राम दास शिव धूणे के पास विराजे हुए
सीताराम गौ शाला


सीताराम गौ शाला में हर समय सेवा भाव से लगे गौ भक्त त्रिलोकचंद अग्रवाल व अन्य
आस्थावान संत रामदास, भीमराज तावणिया, त्रिलोकचंद अग्रवाल, महावीर प्रसाद मुद्गल,सुरेश मिश्रा

निर्माणाधीन ठाकुरजी का मंदिर

भगवान शिवधूणा संतआश्रम सूरतगढ़: सीताराम गौ शाला
अखंड धूणे का मंगलकारी प्रभाव पाने को श्रद्धालु लगाते हैं धोक
संत रामदास का आशीर्वाद लेने को पहुंचते हैं लोग
ठाकुरजी का मंदिर बनाया जा रहा है
करणीदानसिंह राजपूत
सूरतगढ़ में शिवबाड़ी के पास में करीब 33 वर्षों से एक छोटी सी कच्ची कुटिया वाले संत आश्रम में शिव का अखंड धूणा धधक रहा है। धूणे को सुबह प्रज्ज्वलित किया जाता है और पूजा पाठ के बाद राख में अग्रि को दबा दिया जाता है, जो निरंतर इतने वर्षों से धधकती हुई श्रद्धा और आस्था बनी हुई है। भक्त जन आते हैं और इस अखंड धूणे को धोक लगाते हैं। इसकी भस्मी का तिलक लगाते हैं तो अनेक अपने घर ले जाते हैं। श्रद्धा से इस भस्मी को प्रसाद के रूप में ग्रहण भी करते हैं। यह माना जाता है कि भगवान शिव के धूणे की भस्म को प्रसाद में ग्रहण करने वालों को स्वास्थ्य व दीर्घायु मिलती है। भगवान शिव स्वयं भी भस्म को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया करते थे।
    संत आश्रम में पवित्र धूणे में एक लंबा त्रिशूल लगा है तो कई चिमटे लगे हुए हैं। इसी धूणे वाली कुटिया में वर्तमान में संत रामदास विराज रहे हैं, जिनका आशीर्वाद लेने को भक्तजन शुभ समझते हैं।
    संत आश्रम की स्थापना तेतीस चौंतीस साल पहले हुई तब आसपास में बस्ती नहीं थी और दूर से केवल शिवबाड़ी ही नजर आती थी। इससे जुड़े भक्तजन भीमराज तावणियां और महावीर मुद्गल व अन्य जानकारों से बातचीत में इस धूणे की स्थापना का इतिहास यह है। शिव बाड़ी के पास एक छोटा सा पीपल का पेड़ लगा था जो आज इस धूणे के पास में विशाल वृक्ष बन चुका है।
    अयोध्या से आए संत भीमदास ने इस पीपल के पास में एक कुटिया बनाई और शिव का धूणा जलाया। वे उस समय करीब पैंतालीस पचास साल के थे। सन् 1977-78 में धूणे की स्थापना के बाद वे करीब दो साल तक यहां धूणा तपते रहे। वे उपरी बदन उघाड़ा रखते थे तथा रामायण का पाठ करते और सुनाते। भक्त जनों की ओर से आने वाली किसी भी वस्तु और सामग्री का संग्रह नहीं करते थे। योग साधना करते तथा अन्नाहार नहीं लेते थे। फल व दूध उनका भोजन था।
    उस पहुंचे हुए संत भीमदास की महिमा आसपास फैलने लगी और अनेक भक्तजन धूणे पर पहुंचने लगे। उस समय नन्द किशोर मिश्रा,महावीर मुद्गल, रेख सिंह, भीमराज तावणियां, मनीराम सिंवाल,जगदीश ठाकराणी व कई और नियमित जाने लगे। भीमराज तावणियां ने बताया कि संत भीमदास की कुटिया को संत आश्रम कहा जाने लगा था। संत भीमदास करीब दो साल तक इस कुटिया में रहे और बाद में कहीं चले गए।
    संत भीमदास के जाने के करीब दो माह बाद में यहां पंजाब से उदासीन पंथ के महात्मा रणधीरदास आए और वे भी करीब दो साल तक रहे। इसके बाद साधु संत आते जाते रहे लेकिन कोई भी अधिक अवधि तक नहीं रहा।
    कुछ सालों तक भक्तजन ही इस पवित्र धूणे को तापते रहे। इसके बाद सन् 1990 में बीकानेर में लक्ष्मीनाथ मंदिर के पास में एक आश्रम में रहने वाले संत रामदास को इस धूणे से पुकार हुई। संत रामदास को बीकानेर में रहते हुए दस साल बीत चुके थे। संत रामदास के दोनों पैर काम नहीं करते वे बैसाखियों के सहारे रहते हैं और दूर जाना होता है तब मोटर रिक्क्षा चलाते हैं।
    संत रामदास बहुत ही उदार स्वभाव के संत हैं। अब वे धूणा रमाते हैं और पास में सीताराम गौशाला भी चलाते हैं जिसमें अन्य गो भक्तों का सहयोग साथ है। संत रामदास ने बताया कि उनका जन्म बस्ती जिला के उसरी ग्राम में सन् 1934 में हुआ था जिसके अनुसार सन् 2011 में उनकी उम्र करीब 77 वर्ष की हो चुकी है। संत ने बताया कि अपंगता पैदाइशी नहीं थी। करीब दो ढाई साल की आयु में लकवा हुआ और एक ओर का आधा बदन प्रभावित हुआ जो बाद में काफी ठीक हो गया मगर पैर ठीक नहीं हो पाए। उन्होंने दसवीं तक शिक्षा ग्रहण की। पिता खेती करते थे।  माता पिता का नाम उन्होंने नहीं बताया। वे बोले कि संत हो गए अब गुरू का ही नाम लिया जाना उचित है। उन्होंने अपना गुरू रामकिशनदास को बनाया जो आगरा में रहते थे।
    संत रामदास आश्रम में धूणा रमाते हैं और वर्ष में कई बार रामायण और भागवत के पाठ करवाते हैं। वे जब यहां आए तब उन दिनों में भी असहाय छोड़ा हुआ गौ वंश यत्र तत्र भूख से तड़पता हुआ दिखाई पड़ता था। अमरता को प्राप्त संत रामसुख दास जी उन दिनों अपने हर उपदेश प्रवचन में इन असहाय गौ वंश बचाने की कहते थे। उनकी प्रेरणा से यहां सूरतगढ़ में संत आश्रम के पास में सन् 1992 के आसपास गौ वंश को बचाने का अभियान चलाया जाने लगा। इस अभियान में संत रामदास संयोजक बने और अनेक लोग इसमें जुड़ गए। उस समय गौ वंश के लिए खुले में ही घास तूड़ी आदि डाली जाती थी। इसके बाद सन् 1999 में संत आश्रम की सीताराम गौशाला की स्थापना हुई। उस समय संरक्षक रामदास जी बने। अध्यक्ष राजेन्द्र खदरिया, सचिव मदन औझा, उपाध्यक्ष प्रकाश कौशिक और कोषाध्यक्ष त्रिलोचंद अग्रवाल को बनाया गया। राजेन्द्र खदरिया व प्रकाश कौशिक इस संसार से कूच कर गए। इसके बाद इसकी कार्यकारिणी का सन् 2005 में पंजियन कराया गया। अब संत रामदास इस गौशाला के अध्यक्ष,सुरेश मिश्रा उपाध्यक्ष,त्रिलोकचंद अग्रवाल सचिव और भीमराज तावणियां कोषाध्यक्ष हैं। आज यह गौशाला अच्छे ढ़ंग से संचालित हो रही है। उसके हर कार्य में सचिव त्रिलोकचंद अग्रवाल तैयार रहते हैं। इस गौशाला के अध्यक्ष संत रामदास के मोबा. 98299 39951 पर तथा त्रिलोकचंद अग्रवाल से मोबा. 98280 77017 पर संपर्क किया जा सकता है। त्रिलोकचंद अग्रवाल का यह मोबाइल उनके सुपुत्र का है जिनको कोई सूचना दी जा सकती है।
    इस संत आश्रम और गौशाला के पास में ही ठाकुरजी का मंदिर बनाया जा रहा है। इस मंदिर का निर्माण पूर्ण होने पर ठाकुरजी की प्रतिमा की स्थापना की व्यवस्था सुरेश मिश्रा करवायेंगे। इसके बाद  इस संत आश्रम पर शि के पवित्र धूणे की धोक, गौ की सेवा का आशीर्वाद और ठाकुरजी के दर्शन एक साथ ही होने का सौभाग्य भक्तजनों को मिलने लगेगा।




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