रविवार, 27 दिसंबर 2015

तुम्हारे दिल में बस जाऐं---कविता-



तुम्हें सताने वाले
सभी विदा हो गए
हम खैर ख्वाह
तुम्हारे करीब हैं।
केवल आवाज सुन
तुम्हारे दिल की धड़कन
महसूस हो जाती है।
न जाने कौनसी पैथी है
आवाज के सहारे
हम तुम्हारे दिल में
उतर जाते हैं।
यह अजब संपर्क
कब से हो रहा है
तुमको मालूम होगा
हम तो बेसुध हो जाते हैं।
तुम कब चुप हुई
सोचते हैं मन में
हम तो होश आता है
तब संभलते हैं।
आवाज के सहारे
ऐसा कब तक चलेगा
कुछ तुम बदलो
कुछ हम बदलें।
हम तुम्हें पुकारें
अपने दिल में उतारें
फिर चुप होकर
दिल में बंद करलें।
यह तो कैद सी होगी
जिंदगी तुम्हारी
हम नहीं चाहते तुम्हें
यूं कैद करना।
हम तुम्हें पुकारें
उतरें तुम्हारे दिल में
तब तुम बंद करलो
जब मन में हो तुम्हारे।
ऐसा पल कब आएगा
यह तुम्हारी सोच पर
निर्भर होगा जब
तुम पुकारोगी हमें।
हम चाहते
हैं कि
फिर कोई सताने वाले
आसपास न हों तुम्हारे
यही अरमान हैं हमारे।
आशा करते हैं कि
सुरक्षा कवच बन जाऐं
तुम्हारे दिल में उतरें
और वहीं बस जाऐं।
- करणीदानसिंह राजपूत
स्वतंत्र पत्रकार,
विजयश्री करणी भवन,
सूर्यवंशी विद्यालय के पास,
मिनि मार्केट,सूर्याेदयनगरी,
सूरतगढ़।

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