मंगलवार, 7 जनवरी 2020

सुंदरता कराती रहे तिल के दर्शन- कहानी- करणीदानसिंह राजपूत.




सुंदरता गहरी नींद में चित्त सो रही थी।
समय देख रहा था।
खुले गले के ब्लाउज से गले के नीचे हंसुली के पास नीचे काला बड़ा सा तिल सुंदरता को और अधिक बढा रहा था।
सिर पर से ओढनी खिसक जाने से मुखड़ा और पैरों तक का आकर्षक लुभाने वाला था।
गले के नीचे का तिल वह ढक कर रखती लेकिन कभी कभार समय को दिख ही जाता। ढीले गले के ब्लाउज में तो दिख ही जाता।
बहुत बार वह ढक नहीं पाती। काम में व्यस्त होने के कारण ध्यान नहीं होता तब अनेक बार समय को बहुत पलों तक यह आकर्षण दिखता रहता।
समय की नजरें इस आकर्षण से हटती नहीं। समय को इस तिल के दर्शन शुभ होते और पूरा दिन आनंद से गुजरता।
समय चाहता रहता कि बस,दर्शन होते रहें चाहे थोड़े ही हो जाएं। ज्यादा हो जाएं तो मन मयूर सारे दिन नाचता रहता।
यह विश्वास ऐसा था कि तिल के दर्शन के लिए समय को सुंदरता के आसपास भी रहना होता। बार बार देखना भी होता कि न जाने कब ओढनी हटे और दिख जाए।
सुंदरता गहरी नींद में और ओढनी हटी हुई। तिल के दर्शन। बड़ा अच्छा मौका। अच्छी तरह से देखने का। समय की नजरें एकटक तिल पर ही टिकी थी। तिल को दिल में उतारने का सुंदर अवसर था और यही काम हो भी रहा था।
समय की यह सोच भी चल रही थी कि रोजाना ही दर्शन करादे तो शुभ दर्शन से रोजाना ही आनंद से दिन बीते और कोई न कोई लाभ भी होता रहे।
यह सोच गलत भी नहीं।
किसी चीज के दिखने से दिन आनंद में रहे लाभ हो तो उसके दर्शन करने के लिए हरेक कोशिश भी करता है।
समय भी यही कोशिश करता रहता। यह कोशिश रोजाना होती।
कभी कभी सुंदरता भी नहीं ढकती। मालूम हो जाता फिर भी नहीं ढकती।

अभी तो सुंदरता नींद में थी।
समय तिल के शुभ दर्शन को ऐसे में क्यों छोड़े और फिर यह विश्वास भी।
आज तो बहुत बड़ा लाभ होगा तो जी भी नहीं होता दूर हटने का।
समय को यह मौका भगवान ने ही दिया है तभी तो सुंदरता यों मस्त नींद में और ओढनी हटी हुई।
समय उसका संपूर्ण मुखड़ा देख देख और तिल के शुभ दर्शन कर ईश्वर को धन्यवाद भी लगातार दे रहा।
समय की यह प्रार्थना भी हो रही थी कि सुंदरता इस तिल के दर्शन रोजाना करवादे।
रूप की रानी का मुखड़ा,सेब सरीखे कपोल,सुंदर गले से नीचे तक। गोरे पांव ऐसे की अंगूठे अंगुलियों को चूमने का दिल चाहे। अभी ऐसा ही मौका क्योंकि सुंदरता तो गहरी नींद में थी।
समय की नजरें हाथों पर और तराशे हुए नाखूनों पर भी घूमी। मन में धीमे से हाथ उठा कर चूम लेने का आया। समय झुका और एक हथेली को चूम लिया।
समय तो सभी ओर घूमता।
उसने भी सुन रखा था कि किसी रूपसुंदरी अफ्सरा,परी के गले और छाती के बीच काला तिल हो और उसके दर्शन हो जाए तो शुभ ही शुभ।

समय को धरा पर एक सुंदरता दिख ही गई जिसके दोनों अंगों के बीच  ठीक उसी जगह काला तिल था जिसके दर्शन से आनंद मिलने का सुन रखा था।
समय उसी के आसपास ही अधिक रहता।
उसे यदा कदा थोड़े थोड़े दर्शन होते भी रहते, मगर अभी तो सुंदरता नींद में दर्शन चाहे जितने।
समय निहारता रहा।
समय जो हर वक्त हर जगह बेरोकटोक विचरण करता रहता है।उसे कोई नहीं देख पाता वही ईश्वर से प्रार्थना करने लगा कि सुंदरता जागते हुए भी दर्शन कराती रहे।
बस।
उसे और कुछ नहीं चाहिए।
केवल दर्शन।
उसके तिल के दर्शन।
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करणीदानसिंह राजपूत,
स्वतंत्र पत्रकार,
सूरतगढ़.
94143 81356.

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