मंगलवार, 9 अक्तूबर 2018

प्रैस को प्रदूषण से बचाना जरूरी!


विपक्षी दल या मीडिया सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाते रहते हैं भले ही सत्ता में कोई दल हो और ये गलत नहीं है । सरकार से सवाल करना उनका फर्ज है और अधिकार भी क्योंकि यहाँ  लोकतंत्र है।किसी भी लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए वहां न्यायपालिका की स्वतंत्रता कायम  रहना जितना जरुरी है उतना जरुरी प्रैस का स्वतंत्र बने रहना भी है।इसके साथ साथ चुनाव आयोग भी एक संवैधानिक संस्था है जिसकी निष्पक्षता किसी संदेह से परे रहनी चाहिए। सरकार के बजाय अगर प्रैस, न्यायपालिका और चुनाव आयोग पर प्रश्न चिन्ह लगते हैं तो ये स्वीकारना होगा कि कहीं न कहीं  लोकतंत्र की कड़ियाँ कमजोर हो रही हैं। देश में लोकतंत्र की रक्षा के लिए इन सब संस्थाओं की ये नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे न  सिर्फ निष्पक्ष रहें वरन निष्पक्ष दिखाई भी दें।ये काम  खुद उन्ही को  करना होगा। पिछले कुछ समय से संवैधानिक संस्थाओं और प्रैस पर जिस तरह सवाल उठे है वो एक  चिंता का विषय है क्योकि इनकी स्वतंत्रता के बिना सच्चे लोकतंत्र की कल्पना नहीं की  जा सकती। इन दिनों एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। देश में पहली बार ऐसा हो रहा है जब किसी भी बात के लिए सत्ता के बजाय विपक्ष को, पिछली सरकारों को  या अन्य किसी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।सत्ता से सवाल पूछना अब बंद होता जा रहा है।

इसके साथ ये लगता है कि मोटे तौर पर देश की प्रैस किसी दबाव में है या उसे सत्ता के द्वारा अपने प्रभाव में ले लिया गया  है जो  लोकतंत्र के लिए खतरनाक है क्योंकि उसके इस आचरण से देश में तानाशाही के पनपने का पूरा अवसर है। मीडिया का काम लोगों को सच्चाई से अवगत करवाने का होता है व इसके स्थान पर अगर वो लोगों को गुमराह करती है तो निश्चित रूप से वो जनता का नहीं वरन सरकार का काम कर रही  है । इसलिए प्रजातंत्र के लिए  पहली लड़ाई ऐसी प्रैस और मीडिया के खिलाफ लड़ी जानी चाहिए जो जनता के बजाय सरकार का हथियार बन रही है। प्रैस एक तरह से देश की जन भावना को प्रदर्शित करने का  जरिया समझी जाती है और  वो न सिर्फ सरकार पर एक अंकुश की तरह रहती है वरन किसी न किसी तरह  चुनाव आयोग हो या न्याय पालिका जैसी संवैधानिक संस्थाओं को भी प्रभावित करती है चाहे ऐसा प्रत्यक्ष रूप में न दिखाई पड़ता हो।प्रैस की स्वतंत्रता और निष्पक्षता ही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है इसलिए ये आवश्यक है कि लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई  की शुरुआत में सत्ता से प्रदूषित होती प्रैस को बचाया जाय ताकि वो स्वतंत्र और निष्पक्ष रह कर  अपना काम कर सके।

रमेश छाबड़ा

सूरतगढ़


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