Friday, January 6, 2017

डॉ.जिया की किताब मारवाड़ में उर्दू का विमोचन हुआः

पुन्नू बीकानेरी
 
बीकानेर _ 5 जनवरी 2017.
डॉ जिया की बहुप्रतीक्षित पुस्तक "मारवाड़ में उर्दू" का विमोचन दिनांक 5 जनवरी 2017 को श्रीमती कमला कोचर के सानिध्य में दोपहर 12 बजे बीकानेर एवम् राजस्थान भर से तशरीफ़ फ़रमा उर्दू सख्सियतों एवम् हिंदी राजस्थानी के साहित्यकारो की उपस्थिति में हुआ ।

मैं कार्यक्रम पर बात करूँ उससे पहले डॉ जिया और उनकी किताब पर कुछ चर्चा करना जरुरी समझता हूँ ।

डॉ जिया उल हसन कादरी का जन्म बीकानेर के मोहल्ला चुनगरान में हाजी मोहम्मद अली कादरी एवम् सलमा बेगम के घर 29 जनवरी 1974 को हुआ ।
शिक्षक पिता की सन्तान के सभी अच्छे गुण और संस्कार आपमें प्रत्यक्ष देखे जा सकते है और ये भी काबिले गौर है कि आप भी शिक्षा विभाग में प्राध्यापक उर्दू के पद पर जामसर बीकानेर में अपनी सेवाएं दे रहे है ।
डॉ जिया बचपन से ही बहुमुखी प्रतीभा के धनी थे । साहित्य में आपका रुझान और जुड़ाव बचपन से ही रहा है । आप जब कक्षा 9वीं के विद्यार्थी तब हिंदी की एक हस्तलिखित पत्रिका "तख्ते ताऊस" का सम्पादन करने लगे थे । कविता और शायरी स्कुल के समय ही आपके जीवन रच-बस चुकी थी तो कॉलेज तक आते-आते हिंदी और उर्दू अदब की तमाम विधाओ में आप लेखन करने लगे । अब आपका साहित्यिक क्षेत्र विस्तार कर चुका था और आप ग़ज़ल, कहानियां, लघुकथाएँ भी लिखने लगे ।

आप एम.ए (उर्दू) में अजमेर विश्वविद्यालय में मेरिट में दूसरा (2nd) स्थान प्राप्त किया।
इसके साथ ही आपने हिंदी साहित्य में भी एम.ए किया है ।
तो "मारवाड़ में उर्दू शेरो अदब" विषय पर शोध कार्य करते हुए महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय अजमेर से Ph.d की मानद उपाधि भी वर्ष 2015 में प्राप्त की ।

"मारवाड़ में उर्दू" पुस्तक पर बात करूँ तो इसकी महता इस बात से स्पष्ट हो जाती है कि ये पुस्तक उस प्रत्येक उर्दू शोधार्थी और उर्दू के साहित्यकारों और उर्दू अदब की जानकारी रखने/चाहने वालों के लिए आवश्यक सन्दर्भ रूप में अनिवार्य एवम् संकलन योग्य पुस्तक है । और ऐसा इसलिए है क्योंकि इस पुस्तक से पूर्व उर्दू गद्य में मारवाड़ अंचल के उर्दू की इतनी पुख्तगी के साथ तहकीकात नहीं की थी ।
इस पुस्तक में डॉ जिया ने मारवाड़ में उर्दू के आरम्भिक बीज से लेकर वर्तमान तक का क्रमबद्ध रूप से इतिहास प्रस्तुत किया है । बीकानेर नागौर बाड़मेर जोधपुर पाली सिरोही आदि जिलो में उर्दू की शायरी कहानिया नज़्म तनकीद आदि पर गहन तहकीकात इस पुस्तक में हुई है ।

इस पुस्तक से पहले आपकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें "स्वतंत्रता संग्राम के अनाम पुरोधा शौकत उस्मानी" और "हज़ार हवेलियों का शहर बीकानेर" स्व. उपध्यानचन्द्र कोचर साहब के साथ क्रमश: 2001 और 2006 में प्रकाशित हो चुकी है जिनका विमोचन क्रमशः तात्कालिक राज्यपाल अंशुमान सिंह और उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत ने किया था ।
एक पुस्तक "राज-ए-कर्बला" उर्दू से हिंदी तर्जुमे की भी आ चुकी है । इसके आलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओ में राजस्थानी से उर्दू कहिनियों के तजुर्मे आप करते रहे है ।
आपकी पहचान एक दीगर तनकीद निगार के रूप में भी है ।

जिस आँगन में अशफाक कादरी जैसे बोधि वृक्ष की छाँव हो तो उस आँगन का अहले अदब होना तय है ।
प्रसिद्ध लघुकथाकार अशफाक जी आपके बड़े भाई है जिनकी सोहबत मोहब्बत और सरपरस्ती सदा आपके साथ रही है ।

अब आज के कार्यक्रम पर मुख़्तसर सी टिप्पणी करता चलूँ ।

आदरणीय विधायक गोपाल जोशी की अध्यक्षता में शुरू हुए इस कार्यक्रम का आगाज ठीक 12 बजे अब्दुल वाहिद अशरफी के स्वागत भाषण के साथ हुआ जिसे आगे बढ़ाते हुए असद अली असद के संचालन में मेहमानो की गुलपोशी का दौर के बाद "रस्मे-इजरा" हुआ जिसके बीकानेर के तमाम मीडियाकर्मी और शहर के अदबी लोग साक्षी रहे ।

मौका ए रस्मे इजरा के बाद पुस्तक पर चार पर्चे पढ़े गए जो क्रमशः शायर जाकीर अदीब, सीमा भाटी, डॉ सईद अहमद सिद्दीकी एवम् शाहना ने पढ़े ।
जिसमे अदीब साहब ने जिया उर रहम्सन सिद्दीकी अलीगढ़ का, सीमा भाटी ने प्रो मोहम्मद नौमान खां भोपाल की भूमिका, डॉ अबुल फैज उस्मानी का पत्र सईद अहमद कादरी एवम् डॉ सादिक अली टोंक लिखा पत्र युवा रचनाकार शाहनां ने पढ़ा ।।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विधायक गोपाल जोशी साहिब ने पुस्तक के कुछ अनछुए पहलुओ की ओर इशारा करते हुए डॉ जिया के इस पुस्तक के काम की सराहना के साथ ही कहा कि ये पुस्तक शोधार्थियों के लिए डाइजेस्ट का काम करेगी ।

मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध शायर अब्दुल मुग़नी रहबर ने पुस्तक पर अपनी टिप्पणी में कहा कि ये पुस्तक आने वाली नस्लो के लिए विरासत है जो हमेशा समृद्ध होती रहेगी ।

टोंक से पधारे उर्दू साहित्यकार एवम् अंजुमन तरक्की ऐ उर्दू (हिन्द) शाख राजस्थान ने अपने पात्र वाचन में पुस्तक पर विस्तृत जायजा लिया विभिन्न दृष्टान्त देते हुए किताब की पुख्तगी को पेश किया और कहा कि अब तक मारवाड़ में उर्दू गद्य पर कोई पुस्तक नही लिखी गई थी डॉ जिया ने पहली बार मारवाड़ के उर्दू गद्य पर किताब लिखी है इसकी वजह से राजस्थान के उर्दू शेरो अदब का इतिहास मुकम्मल हो सकेगा ।

किताब पर पाठकीय टिप्पणी करते हुए राजकीय डूंगर महाविधालय की प्रोफेसर असमा मसऊद ने कहा कि डॉ जिया ने इस किताब के माध्यम में मारवाड़ में उर्दू के उन गुमनाम शायरो और लेखको से परिचित करवाया है । ये कार्य ठीक उतना ही जटिल रहा है जितना मरुस्थल के पाताल से पानी निकालना । इन्होंने अपनी मेहनत से मारवाड़ में मौजूद उर्दू के सरमाये को मंजरे आम पर लाने का अहम कार्य किया है ।

स्वयं लेखक डॉ जिया ने अपनी बात रखते हुए इस पुस्तक के लेखन से जुड़े तमाम पहलुओ और किस्सों पर चर्चा करते हुए इस पुस्तक के लेखन से जुडी कठिनाइयों का भी जिक्र किया तो उन सब का आभार भी व्यक्त किया जिन्होंने इस काम को अंजाम तक पंहुचाने में सहयोग किया ।

डॉ जिया ने आपनी बात में कहा कि यहां 900 वर्ष ही उर्दू के निशान नज़र आने लगे थे । 1857 की क्रांति के बाद मारवाड़ की रियासतो में उर्दू का तेजी से विकास होने लगा । उन्होंने शौकत उस्मानी साहिब की अदबी खिदमात का भी जिक्र किया जो आज तक गुमनाम अँधेरे में ही रहे और मजरे आम तक न हो पाये । इसी तरह 1927 में सिरोही से प्रकाशित होने वाली उर्दू पत्रिकाओ की खोज कर उसे सामने लाने का कार्य भी हुआ है ।।

संचालन करते हुए शायर असद अली असद ने भी इस पुस्तक से जुडी महत्वपूर्ण जानकारी साझा की और पूना के वरिष्ठ शाइर और आलोचक नजीर फतेहपुरी के भेजे सन्देश का भी वाचन किया तो नज़ीर साहब के शेर से श्रोताओ से दाद भी हासिल की ।

इस अवसर पर शब्द श्री संस्थान की तरफ से मोनिका गौड़ सीमा भाटी मनीषा आर्य सोनी रचना शेखावत सन्जु श्रीमाली ने डॉ जिया को सम्मानित भी किया ।
आजतक न्यूज़ के चीफ स्टोरी डायरेक्टर यजत भारद्वाज ने गुलदस्ता भेंट कर डॉ जिया का सम्मान किया ।

कार्यक्रम के आखिर में उर्दू सख्सियतो शमीम बीकानेरी, इरशाद अजीज, जाकीर अदीब, अब्दुल मुग़नी रहबर, असद अली असद, असमा मसऊद आदि को डॉ जिया ने अपनी पुस्तक भेंट की ।

अंत में वरिष्ठ साहित्यकार इंजी. निर्मल वर्मा ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए सब मेहमानो को चाय-नास्ते की दावत के साथ कार्यक्रम को विराम दिया ।

इस अवसर बीकानेर की साहित्यिक सख्सियतो के साथ गैर अदबी हजरात और डॉ जिया के घर के सदस्य भी उपस्थित रहे ।
अब्दुल जब्बार बिकाणवी,राजाराम स्वर्णकार, अजीनुद्दीन सवाई माधोपुर, डॉ जे डी बाहरठ, मुरली मनोहर माथुर, डॉ अजय जोशी, नदीम अहमद, वली गौरी, अनुप गोस्वामी, डॉ मन्जू कच्छावा, डॉ अख़लाक़, शाहना, नेमचंद जी, अहमद सिद्दीकी, अशफाक कादरी समी कादरी, नरपत सांखला, हरीश बी शर्मा, अकबर अली, प्रो नरसिंह बिनांनी, सुनील गज्जाणी,राजेन्द्र जोशी, डॉ सुलक्षणा दत्ता, इसरार कादरी,रफीक बेजिगर एवम् सोनू & पुन्नू एवम् अन्य की सादर उपस्थिति रही ।

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