रविवार, 28 फ़रवरी 2016

नेता विहीन श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिले:


रेल बजट पर आई टिप्पणियों पर यह टिप्पणी- करणीदानसिंह राजपूत
अक्सर अभियान से सफलता मिलने का दावा करने वाले अखबारों ने रेल बजट पर अपने अभियान के फुस्स होने का सच्च नहीं छापा:
रेल बजट में श्रीगंगानगर हनुमानगढ़ जिलों हाथ कुछ नहीं आया-क्या हाथ हैं? दिखाई नहीं देते?
भाजपा नेता अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। भाजपा नेता ही नहीं हैं तो उनकी पीठ कहां से आ गई?
रेल बजट पर श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों के कई नेताओं की टिप्पणियां छपी है तो कई अखबारों ने लोगों के बयान छापे हैं मगर अधिकतर नेताओं के बयान ही हैं। रेल बजट को किसी ने अच्छा बताया है तो किसी ने साधारण कागजी तक बताया है।
मैं यहां पर मुख्य रूप में दो शीर्षकों पर छपी टिप्पणियों पर अपनी टिप्पणी कर रहा हूं।
1. पहली टिप्पणी का शीर्षक है कि श्रीगंगानगर हनुमानगढ़ जिलों के हाथ कुछ नहीं आया। क्या दोनों जिलों के हाथ हैं? मुझे या आम जनता को वे हाथ नजर क्यों नहीं आते? हमें क्यों लगता है कि इलाके के लोग या नेता लूले हैं। मतलब बिना हाथों के हैं। जब हाथ ही नहीं हैं तो हाथों में क्या आयेगाï?
2.पहली टिप्पणी का शीर्षक है कि भाजपा नेता अपनी पीठ थपथपा रहे हैं। दोनों ही जिलों में भाजपा के नेता ही नहीं है तो उनकी पीठ कहां से आ गई? कहीं नजर आते हों तो बतलाना कि यह सजीव मौजूद है।
एकेले भाजपा ही नहीं कोई नेता इन जिलों को कभी मिला ही नहीं जो नेतृत्व कर सके। चुनाव जीतना और छोटा बड़ा मंत्री बन जाना अलग बात है और इलाके का नेतृत्व करते हुए कुछ बना जाना अलग बात है। जब गंगानगर जिले के टुकड़े नहीं हुए थे तब भी कोई ऐसा नेता नहीं हुआ था।
मैं यह टिप्पणी कर रहा हूं तो बेवजह नहीं कर रहा हूं। इसकी वजह है।
इलाके में पानी का संकट आता रहा है नेता सिंचाई अधिकारियों पर रोष प्रगट करते रहे हैं लेकिन किसी ने भी पाकिस्तान जाते हुए पानी को रोकने के लिए सरकारों पर दबाव नहीं डाला। आज भी 7 हजार क्यूसेक पानी पाकिस्तान जा रहा है। यहां के लोगों को किसानों को पानी मांगने पर गोलियां और मुकद्दमें मिलते हैं जेलें मिलती हैं और आतंकवादी पाकिस्तान को बिना माँगे पानी का उपहार भेजा जाता है। इलाके में नेता होते तो क्या ऐसा होता? करीब 35 सालों में मैंने कई बार यह मुद्दा विभिन्न अखबारों में उठाया था। किसान नेता सहगल ने यह मुद्दा कई बार उठाया है।
हनुमानगढ़ में सहकारी क्षेत्र में स्पिनिंग मिल की स्थापना हुई तब नेताओं ने खूब प्रचार किया कि इससे कपास उत्पादकों को बहुत लाभ मिलेगा और हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा। पिछले कुछ सालों से यह मिल हमारे नेताओं की निष्क्रियता के कारण दम तोड़ रही है और कामगारों को वेतन  मिल को बचाने के लिए जूझना पड़ रहा है। कितने नेताओं ने इस मिल के लिए प्रयास किए हैं?
श्रीगंगानगर जयपुर की रेलें बंद पड़ी हैं। रेल लाइन बदलाव का भी निर्धारित अवधि थी जो कभी की पूरी हो गई। यहां तो सालों तक कोई काम नहीं हो तो भी नेता कहलाने वाले बोलते नहीं?
चिकित्सा व शिक्षा पर कभी किसी नेता को जनता के साथ खड़े नहीं देखा। श्रीगंगानगर के जिला चिकित्सालय में प्रसव के लिए पहुंचाई जाने वाली महिलाओं की दुर्गति होती है यहां तक की प्राण गंवाने पर भी किसी नेता की जमीर जागती नहीं।
भाजपा वाले तो यह मान लेते हैं कि यह हमारी सरकार का विरोध माना जाएगा। इसलिए वे चुप रहतें हैं मगर कांग्रेस का मुंह भी सिला हुआ मिलता है।
अब बात अखबारों की भी करली जाए।
इलाके में जब जब जनता संघर्ष करती है और मामली सी भी सफलता मिलने की खबर आती है तब तब अभियान चलाने का श्रेय अखबार लेता है और संवाददाता अपना नाम सहित छापता है। लेकिन रेलवे बजट पर पहले रपटें छापने वाले अखबार यह नहीं छापते कि हमारी रपटें फुस्स हो गई।
जनता बेचारी किसका विश्वास करे और किसका विश्वास न करे।
चुनाव के पूर्व में जो दावे कर राज लेता है वह राज मिलते ही मुकर जाता है। न किसी का धर्म न किसी का ईमान।

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