सोमवार, 19 मार्च 2018

माँ काली की छाया:रूकमादेवी मुंडा का नाच व गरजते बोल:अद्भुत रोमांचकारी रात थी।


नंगी तलवारों संग नाचते भक्तों के बीच छाया में डूबी रूकमा का नाच:
काली माँ की आस्था की अद्भुत रोमांचभरी रात:
डमरू की डमडम के रोमांच में डूबे नाचते गाते भक्त और आस्था के सन्नाटे में डूबे श्रद्धालु नर नारी:
प्रस्तुतकर्ता- करणीदानसिंह राजपूत

27-3-2015.
अपडेट 19-3-2018.
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काली माँ की आस्था की अद्भुत रोमांच भरी वह रात थी।
काली माँ का त्रिशूल लगा हुआ और उस पर ओढाई काली चुनरी। सबकी निगाहें उस ओर ही थी। पास में अपनी प्रबल्लता के साथ माँ की जोत  की ऊंची उठती लपट। श्रद्धालु नर नारियों की भीड़ की निगाहें त्रिशूल और जोत पर बार बार जाती तथा मुंह से जयकारे वाले बोल के साथ हाथ जुड़ जाते नमन की मुद्रा में।
माँ के भजन डमरू की डमडम में नाचते भक्त जोश से गाते और ढोल की जोरदार थाप पर पांव जमीन पर पड़ते तब उनमें बंधे घुंघरऊओं की घनघनाहट भी जोरदार होती।
अद्भुत लय इन सब के बीच में चल रही थी।
मोकलसर के माँ भक्त कृष्ण के हाथ में बजता डमरू तथा घेरदार लाल चोगा तथा भजनों के बोल की स्वर लहरियां।
आधी रात बीत गई थी।
माँ के भक्तों का नृत्य तेज और तेज होता जा रहा था।
एक भक्त सांकलों का भारी गुच्छा लहराता नाचने लगा।
एक भक्त नंगी तलवार लिए दिखाई दिया।
नंगी तलवारों के साथ दो भक्त हुए।
नंगी तलवारों के साथ तीन भक्त हुए और उनका नाच शुरू हुआ।
अद्भुत नजारा हो गया। बहुत बहुत तेज तलवारों का नृत्य हो गया।
उसी तेज नंगी तलवारों के नृत्य में अचानक एक महिला पहुंची और नाचने लगी।
अद्भुत रोमांचक नजारा। नंगी तलवारों में नाचते भक्तों में वह झूम झूम नाचने लगी।
उसे परवाह नहीं थी नंगी तलवारों की लेकिन देख रहे श्रद्धालुओं को झुरझुरी कंपकंपी छूट छूट जा रही थी।
उसकी नृत्य झूम बढ़ती जा रहा थी और जीभ निकलती जा रही थी।

आँखें अंगारों सी लाल धधकती सी हो चुकी थी।


मुंडा की रूकमाबाई सोनी थी वह।
नंगी तलवारों के बीच में।
सबकी निगाहें एकटक लगी थी रूकमाबाई सोनी पर।
रूकमा में माँ की छाया।
काली माँ की छाया उतरने का रोमांच भक्तों में और श्रद्धालु नर नारियों में भी उमडऩे लगा।
श्रद्धालु नर नारी भी तालियों में खोते गए।
रूकमाबाई का नाच और मुंह से बाहर लपलपाती लंबी लंबी दिखाई देती जीभ।
उसके तेज नाच के साथ ही केश राशि लहराने लगी। मुंह से फुंफकार सी आवाजें।
यह अद्भुत रोमांच पन्द्रह बीस मिनट तक चला और छाया उतरी रूकमा आगे बढ़ती हुई काली माँ के त्रिशूल जोत के पास हाथ जोड़ती हुई उनके आगे आँगन में लिट गई।
आगे क्या होने वाला था?
सब उसी तरफ ही देख रहे थे।
वह गरजने लगी।
माँ काली की छाया में डूबी रूकमा गरजने लगी।
उसके एक एक शब्द अँगारे जैसे गरम लेकिन सब चुप। सब मान रहे थे एक चमत्कार। क्या बोल रही है देवी की छाया?
देवी की छाया के गरजदार बोल करीब पन्द्रह बीस मिनट से अधिक निकलते रहे।
यह छाया का आदेश माना जा रहा था।
काली माँ की छाया का आदेश।
आधा घंटे के बाद स्थिति सामान्य होने लगी।
श्रद्धालु नर नारी आगे बढ़ बढ़ कर त्रिशूल और जोत को नमन करने लगे।
जोत में घी होमा जाने लगा। चढ़ावा अर्पण किया जाने लगा।
माँ के भजन डमरू की डमडम के साथ पुन: शुरू हो गए।
नजरें कभी त्रिशूल पर तो कभी जोत पर जाती और कभी रूकमा पर जाती जो सामान्य अवस्था में आ चुकी थी।
बड़ी अद्भुत रोमांचकारी रात थी।


















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