Tuesday, January 20, 2015

शौच जाना है - घटना कथा


सूरतगढ़ का पुराना बस स्टेंड परिसर जहां कुछ खाली जगह है जहां पर लोग लघु शंका करते रहते हैं। झाड़ी और दुकानों की ओट में लोग शौच भी कर लेते हैं। वहीं प्राईवेट चलने वाली जीपों का जमावड़ा भी रहता है। यात्री स्त्री पुरूष चढ़ते उतरते रहते हैं। दिन भर यह पुराना बस अड्डा परिसर जीवित रहता है।
यहीं पत्रकारों का जमावड़ा भी रहता है। मनोज स्वामी राजस्थानी साहित्यकार और पत्रकारिता के सजग प्रहरी के यहां बहस पर बहस चलती रहती है। कई बार संसद में भी जो मुद्दे नहीं आते वैसे मुद्दों पर भी बहस हो जाती है। कई बार कह भी दिया जाता है कि जिसकी कोई नहीं सुन रहा हो तो वह अपनी पीड़ा अपनी बात मनोज के यहां सुना सकता है या चलती बहस में भागीदारी भी कर सकता है।
कई बार तो मुद्दे आ जाते हैं आम घरों में होने वाली कलह के या फिर बर्तन खड़कने के। ऐसे मुद्दों पर भी सांगोंपांग बहस चल निकलती है। कई बार बहस में यह भी लगने लगता है कि झगड़ा हो रहा है,लेकिन जो झगड़ा करने वाले से लगते हैं वे एक दिन भी दूर नहीं रह पाते।
इसी कुटिया रूपी संसद में ब्याह शादियों की बातें और लड़कियां लड़के देखने दिखलाने तक के मामले आ जाते हैं और लोगों की गाड़ी आगे निकल जाती है मतलब कि उनकी बात तक पक्की हो जाती है। ब्याह शादियों के लिए गाडिय़ां तय करने तक के मामले कहानी की तरह तय हो जाते हैं। बड़ा रस आता है ऐसी बातें सुनते और उनमें भाग लेते हुए।
पुराने बस स्टैंड परिसर में रोजाना ही कहानियां बनती रहती है। किसी न किसी के मिलने का स्थान भी बनता रहा है यह परिसर। यानि कि प्रेम कहानी का जन्म।
अनजान लोग भी दुखड़ा सुनाते हुए मनोज को घर का सदस्य सा मानते हुए रोते हुए देखे गए हैं और मनोज उनके आँसू पोंछता हुआ और चाय पिलाता हुआ भी दीख जाता है। रोटी खाते वक्त आवाज देता है आओ रोटी जीम लो।
वाह मनोज स्वामी लेखक पत्रकार कम और जनता के जीवन से जुड़ा भाई सग्गे से भी बढ़ कर।
मनोज के आगे एक वृद्ध और एक वृद्धा आकर खड़े हो जाते हैं।
वृद्ध अपने सिर पर से गठरी उतार कर पूछता है।
शौच जाना है। कोई जगह है?
मनोज समझ जाता है कि साथ वाली वृद्धा दूर खड़ी सिमटती सी परेशान हो रही है और उसे ही शौच जाना है।
बेचारी साठ सत्तर साल की वृद्धा के चेहरे पर परेशानी झलकती दिखाई पड़ती है। वह परेशानी से दोलड़ी सी होती झुकती जाती है।
मनोज कहता है। बाबाजी आप गठरी सामान यहां रख दो और पास की गली से सीधे स्टेशन मुसाफिर खाने में चले जाओ। वहां पर शौच स्थान बना हुआ है। कहने को तो मनोज झाड़ी के पीछे शौच करने का कह सकता था। लेकिन वृद्ध के पूछने से भी लग रहा था कि वे खुले में शौच नहीं करने वाले। ग्र्र्र्र्र्र्रामीण थे मगर सलीका था।
मनोज का उत्तर सुनते ही उन्होंने सामान रखा तथा स्टेशन की ओर चले गए।
मनोज से रहा नहीं गया। उसके गुस्से का उफान था।
नगरपालिका के बोर्ड पर और समाजसेवी संस्थाओं पर कि शहर में जरूरत वाले स्थानों पर एक भी शौच स्थान नहीं है।
यह एक घटना नहीं है। यह एक कहानी नहीं है।
ऐसी कहानियां रोजाना घटती हैं और यहां के निवासी, पार्षद और समाजसेवी बहरे हो जाते हैं या.....।

घटना कथा- करणीदानसिंह राजपूत,
वरिष्ठ पत्रकार,
सूरतगढ़।
94143 81356

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