शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

संसद में राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता की मांग:निहालचंद बोले


- शून्य काल के दौरान राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता की मांग-

श्रीगंगानगर, 3 अगस्त2918.

 सांसद एवं पूर्व केन्द्रीय राज्यमंत्रा श्री निहालचंद ने शुक्रवार को संसद में शून्य काल के दौरान राजस्थानी भाषा को सवैधानिक मान्यता देने का मुद्दा सदन में उठाया। 

    श्री निहालचंद ने संसद में बोलते हुए कहा कि मैं आपके माध्यम से केंद्र सरकार का ध्यान राजस्थानी भाषा की तरफ दिलाना चाहुँगा, जिसको संवैधानिक मान्यता प्रदान कर आठवी सूची में सम्मिलित करने की मांग पुरे राजस्थान में विभिन्न माध्यमों से काफ़ी समय से की जा रही है। माँ, मातृभूमि और मातृभाषा, तीनों का स्थान अति महत्वनीय है, क्यूंकि ये तीनों हमें आकर, आधार और अस्तित्व प्रदान करती है। किसी भी देश या प्रदेश की संस्कृति को सहेजने में वहाँ की भाषा की अहम भूमिका होती है। बिना मातृभाषा के मौलिक चिंतन संभव नही है, यह चिंताजनक है कि सम्पूर्ण तत्वों और लगभग 10 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली ये प्राचीन राजस्थानी भाषा आज तक बस अपने अस्तित्व की ही तलाश कर रही है। 25 अगस्त, 2003 को राजस्थान विधानसभा से संकल्प प्रस्ताव पास होने के बाद केंद्र सरकार को भेजा गया था, परन्तु इस पर अभी तक कोई उचित कार्यवाही नही हो पाई। राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने से प्रदेश के प्रत्येक जिले की जनता को शिक्षा एवं रोजगार हासिल करने में भी मदद मिलेगी । 

    उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा को संवैधानिक दर्जा दिलाने को लेकर पहली दफा 1936 में मांग उठी थी, लेकिन राज्य की विधानसभा में इस भाषा पर 2003 में जाकर कोई एकराय बन पाई और तब इस आशय का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया, केंद्र ने ओडीशा के वरिष्ठ साहित्यकार एस.एस. महापात्रा की अगुआई में एक कमेटी बना दी और उसने दो साल बाद रिपोर्ट पेश की, जिसमें राजस्थानी और भोजपुरी भाषा को संवैधानिक दर्जे का पात्र बताया गया। 2006 में उस वक्त के गृह मंत्रा ने उसी चौदहवी लोकसभा के कार्यकाल में राजस्थानी भाषा को संवैधानिक दर्जा देने का भरोसा भी दिया था, बल्कि बिल भी तैयार कर लिया गया था, लेकिन उसे आज तक संसद में पेश नही किया गया है ।

    उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा का निर्माण छः प्रमुख बोलियों से हुआ है, इसमें मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूढाणी शेखावाटी, हाडौती व बागड़ी का समावेश है। भाषा वैज्ञानिकों का भी मानना है कि राजस्थानी भाषा, हिंदी से नही निकली बल्कि एक स्वतंत्रा अस्तित्व वाली भाषा है। भाषीय सर्वे में भी कहा गया है कि राजस्थान निर्माण के बाद इसका नामकरण राजस्थानी कर दिया गया। 

    मैं संसद के माध्यम से मेरा केंद्र सरकार से अनुरोध है कि करोड़ों लोगों की भावना को ध्यान में रखते हुये और राजस्थानी भाषा को सम्मान का दर्जा देते हुये राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिए जाने की दिशा में आवश्यक कार्यवाही करने पर जोर दिया। 

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