Monday, March 21, 2016

रेतमें जन्मा नया नेता राकेश बिश्रोई:पृथ्वीमील ने सवाल उठाए:


सिंगरासर माइनर आँदोलन शांतिपूर्ण चल रहा था तब राकेश बिश्रोई कानौर हैड पर क्यों चढ़ा?
राकेश बिश्रोई चुनाव लडऩा चाहता है:
पुलिस लाठी चार्ज पर नेता वहीं थे मगर लाठी वर्षा में फोटो किसको सूझती.
- करणीदानसिंह राजपूत -
सिंगरासर माइनर आँदोलन पर मेरे कई लेख व रपटें छपी हैं। एक लेख था-राकेश बिश्रोई रेत में जन्मा नया नेता। 
इस लेख को पढऩे के बाद पृथ्वीराज मील ने राकेश की कार्य प्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह चुनाव लडऩा चाहता है। पृथ्वीराज मील का यह फोन 21 मार्च को दोपहर में पौने दो बजे आया। इसमें जो सवाल उठाए गए हें। वे आँदोलनकारियों व इलाकें के लोगों को मालूम पड़े इसलिए सामने रखने में कोई संकोच नहीं है। मुझे ऐसा लगता है कि इस आँदोलन में भीतर ही भीतर कई प्रकार के विचार चल रहे हैं और इतने नेता व दल हैं तो सभी के विचार भी भिन्न होने लाजिमी है। आँदोलन में कई लोग जुड़े हैं जिनमें कुछ चुनाव लडऩे के ईच्छा रखते हैं। पृथ्वीराज भी चुनाव लडऩें के ईच्छुक हैं। पृथ्वीराज की सोच है कि राकेश बिश्रोई यह सब चुनाव लडऩे के लिए ही कर रहा है।
1. पृथ्वीराज मील का सबसे बड़ा सवाल है कि सिंगरासर माईनर आँदोलन शांतिपूर्ण चल रहा था। उस समय राकेश बिश्रोई बिना किसी को बतलाए बिना सलाह किए कानौर हैड पर चढ़ा और धमकी देने लगा जिसके बाद हिंसा भड़की। मील का मानना है कि लोगों की पिटाई इस कारण से हुई। 
मील ने कहा कि राकेश बिश्रोई चुनाव लडऩा चाहता है। 
मेरा जवाब था- किसी को चुनाव लडऩा है तो उसे रोका तो नहीं जा सकता। राकेश ने चुनाव लडऩे के लिए यह किया या वहां की परिस्थितियां ऐसी बनी हो जिसके कारण अचानक निर्णय लिया हो। यह मैं नहीं कह सकता।
2. पृथ्वी मील ने कहा कि लाठी चार्ज के वक्त नेता भागे नहीं थे।
 मैंने कहा कि- लाठी चार्ज की एक भी फोटो नहीं आई न छपी। 
 मील ने कहा कि पत्रकारों के कैमरे छीन लिए गए थे।
 मैंने कहा कि नेता अपने मोबाइल कैमरों से फोटो ले लेते। तब मील ने कहा कि जब लाठियां पड़ रही हो तब फोटो की किसे सूझती। 
 मेरी सोच है कि लाठियां लोगों पर पड़ी थी किसी नेता के ऊपर नहीं पड़ी। नेता ये फोटो ले सकते थे जो मुकद्दमें में काम आती।
 मैंने कहा कि गाडिय़ों के तोड़े जाने की भी कोई फोटो नहीं ली गई। जो पुलिस का चेहरा बतलाती।
 मील ने कहा कि- लोगों ने खुद ने तो तोड़ी नहीं।
ऐसा लग रहा है कि यह आँदोलन शुरू चाहे किसी भी रूप में हुआ हो लेकिन उसमें नेता लोग भविष्य के चुनाव का लाभ तो देखते ही हैं। लोग भावी नेता की छवि अपने दिल दिमाग में लेकर चलें तो भी कोई हर्ज नहीं है। आँदोलनों में नए नेता नए वक्ता सामने आते ही हैं जो जनता में छा भी जाते हैं। इस प्रकार के आंदोलनों में किसी को अपनी जमीन खिसकती लगती है तो किसी को जमीन बनती हुई लगती है। ऐसे नेता भी हैं जो इस आँदोलन से दूर हैं और उनकी सोच सबसे अलग है। 
वैसे एक सवाल अभी दबा हुआ पड़ा है जो राकेश बिश्रोई के कानौर हैड पर चढऩे से संबंधित ही है। पृथ्वीराज मील और अन्य सभी आँदोलनकारी नेताओं से है कि कानौर हैड पर 11 मार्च को कब्जा करने की घोषणा की हुई थी और हैड पर चढ़े बिना वह घोषणा पूरी कैसे होती? राकेश बिश्रोई ने तो वह संकल्प पूरा किया जो सभी नेताओं ने किया था। अब पृथ्वीराज मील ही बता सकते हैं कि कानौर हैड पर चढ़े बिना ही कब्जा करने की घोषणा पूरी कैसे हो सकती थी? सवाल तो अन्यों पर होता है कि वे घोषणा को पूरी करने के लिए हैड पर क्यों नहीं चढ़े?
पृथ्वीराज मील की तरह संभव है अन्य कोई नेता भी अपनी अलग सोच रखता हो इसलिए चर्चा हो तो अच्छा है। 

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