रविवार, 27 मई 2018

सूरतगढ से कौन लड़ेगा-हाथ या हाथी?


 - करणीदानसिंह राजपूत -

 * राजस्थान और मध्यप्रदेश में भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस और बसपा में समझौता संभव की मीडिया चर्चाएं* 

* कर्नाटक में भाजपा को सत्ता से दूर करने की सफलता से संभावनाएं अधिक मजबूत हुई हैं।*

राजस्थान और मध्य प्रदेश में इसी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को पुनः सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के समझौते की संभावना मीडिया में व्यापक चर्चा और समाचार आ रहे हैं। ।

राजस्थान और मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है दोनों प्रदेशों में जनता सत्ताधारी पार्टी के विरुद्ध मानस बनाए हुए है।

ऐसी स्थिति में यह माना जा रहा है कि दोनों प्रदेशों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का पुनः सत्ता में आना बहुत ही मुश्किल है।इन परिस्थितियों में भी दोनों प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की कांटे की टक्कर ही मानी जा रही है। कांग्रेस पार्टी सत्ता में आने के लिए हर संभव प्रयास करेगी और भारतीय जनता पार्टी अपनी सत्ता को को बचाने के लिए कोई भी कसर नहीं रखेगी। इस कारण से दोनों प्रदेशों में कांटे की टक्कर संभावित है।

दोनों प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी की सत्ता को रोकने के लिए कांग्रेस पार्टी जीत का दावा कर रही है लेकिन इस दावे के साथ ही यह समाचार भी मीडिया में आ रहे हैं कि भाजपा को हर हालत में रोकने के बहुजन समाज पार्टी के लिए कुछ सीटें समझौते में छोड़ी जा सकती हैं।

 उच्च स्तर पर यह हलचल है कि है कि कांग्रेस से छोटे दल यदि कुछ सीटें मांगते हैं तो उन्हें कुछ सीटें देने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। 

राजस्थान के लिए माना जा रहा है कि 200 विधानसभा सीटों में कांग्रेस पार्टी बहुजन समाज पार्टी के लिए 10- 15 सीटों पर समझौता कर सकती है।

 मतलब 10- 15 सीटों पर  समझौता समझौता होता है तो  सूरतगढ सीट पर कौन लड़ेगा ? कांग्रेस या बसपा?

 सूरतगढ़ की सीट पर बहुजन समाज पार्टी को मिलने का प्रबल दवा संभावित है। इसका कारण यह है कि पिछले सन 2013 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी दूसरे क्रम पर रही और कांग्रेस पार्टी तीसरे क्रम पर पर रही थी। इससे पहले बहुजन समाज पार्टी यहां से 2008 का चुनाव भी लड़ चुकी है। ऐसी स्थिति में यह सीट बसपा के लिए छोड़ी जा सकती है। सन 1972 में कांग्रेस पार्टी ने सूरतगढ़ सीट भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लिए छोड़ी थी और इस सीट से योगेंद्र नाथ हांडा ने रिकॉर्ड मतों से चुनाव जीता था। कांग्रेस पार्टी इस सीट पर पर सन 1952 से चुनाव लड़ रही है इसलिए वह इस दावे पर भी भी अपना  अधिकार जताते हुए संभव है कि यह सीट अब नहीं भी छोड़े। अगर यह सीट कांग्रेस छोड़ती है तो बसप पार्टी डूंगरराम गेदर की जीत संभव मानेंगे।

 लेकिन राजनीति सीटों के बंटवारे के बावजूद जरूरी नहीं होता कि सारे पार्टी सदस्य व समर्थक मतदाता बसपा के साथ चलेंगे।

 मतलब कांग्रेस पार्टी का हर कार्यकर्ता और समर्थक डूंगरराम को वोट नहीं भी दे। यदि होता है तो वोटों का बंटवारा कुछ भारतीय जनता पार्टी के हक में जा सकता है और अधिक संख्या किसी निर्दलीय के साथ जा सकती है। चुनावों में ऐसा होता आया है कि जब पार्टी किसी व्यक्ति को टिकट दे और वह पसंद का नहीं हो तब कार्यकर्ता और समर्थक दुश्मन पार्टी को तो वोट नहीं देते लेकिन किसी निर्दलीय के साथ जुड़ जाते हैं। यह जुड़ाव खुला कम और पर्दे के पीछे अधिक होता है जिसे दूसरी भाषा या शब्दों में भीतरघात भी कहते हैं। फिलहाल कांग्रेस पार्टी  बहुजन समाज पार्टी के साथ राजस्थान और मध्यप्रदेश में क्या समझौता करती है और कितनी सीटें तथा कौन कौनसी सीटें सीटें छोड़ती है? यह पर्दे के पीछे है।

 मीडिया चर्चाओं में में संभावनाएं व्यक्त हैं कि भाजपा को रोकने के लिए यह समझौता समझौता होगा।

इसी समझौते के कारण सूरतगढ़ पर हाथी लड़ेगा या हाथ लड़ेगा? बसपा से तो एक ही दावेदार डूंगरराम गेधर की तैयारियां चल रही हैं। अगर यह सीट उच्चस्तरीय समझौते में  बसपा के लिए छोड़ दी जाती है तब कांग्रेस में काफी समय से प्रबल दावेदारी कर रहे पूर्व विधायक स.हरचंदसिंह सिद्धु,पूर्व विधायक गंगाजल मील,अमित कड़वासरा,स.परमजीतसिंह रंधावा, बलराम वर्मा,गगनदीपसिंह विडिंग,राकेश बिश्रोई आदि का क्या होगा?



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