बुधवार, 13 अक्तूबर 2021

सरकार वन जमीनों की परिभाषा बदलने की तैयारी में.सुझाव मांगे:विरोध शुरू वन खत्म हो जाएंगे

 

* करणीदानसिंह राजपूत *
वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पिछले सप्ताह वन संरक्षण कानून 1980  में संशोधन से जुड़े विवरण का प्रकाशन किया है. इस संशोधन का उद्देश्य वन भूमियों को परिवर्तन करने को आसान बनाना और विकास कार्यों के लिए कुछ श्रेणी को मंत्रालय से मंजूरी लेने की आवश्यकता से छूट देना है. मंत्रालय ने राज्य सरकारों और आम जनता से 15 दिन के भीतर इस विवरण पर विचार मांगा है. विचार (फीडबैक ) की समीक्षा के बाद सरकार संशोधन का नया विवरण तैयार करेगी, जिस पर एक बार फिर से लोगों की राय ली जाएगी और विवरण को विधेयक के रूप में फिर संसद में पेश किया जाएगा.
मौजूदा कानून के मुताबिक वन की परिभाषा के चलते पूरे देश में जमीनें लॉक हो गई हैं. यहां तक कि निजी मालिकाना हक वाले लोग भी अपनी संपत्ति का उपयोग नहीं पा रहे हैं. मौजूदा कानून के मुताबिक किसी भी उद्देश्य के लिए जंगली जमीन का किसी भी तरह परिवर्तन यहां तक कि लीज पर देने के लिए भी केंद्र सरकार की अनुमति लेनी होती है.
कानून में संशोधन क्यों किया जा रहा है?
इससे पहले वर्ष 1996 में टीएन गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत सरकार केस में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वन भूमि की परिभाषा और दायरे का विस्तार किया था, ताकि स्वामित्व, मान्यता और वर्गीकरण के बावजूद किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में वन के रूप में दर्ज सभी क्षेत्रों को शामिल किया जा सके. पहले ये कानून बड़े पैमाने पर वनों और राष्ट्रीय उद्यानों को आरक्षित करने के लिए लागू किया जाता था, लेकिन कोर्ट ने ‘जंगल के शब्दकोशीय अर्थ’ को शामिल करने के लिए वनों की परिभाषा का भी विस्तार किया, जिसका अर्थ है कि एक वनोच्छादित जगह स्वचालित रूप से ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ बन जाएगी, भले ही इसे संरक्षित जगह के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया हो, भले ही स्वामित्व निजी हो या सार्वजनिक. आदेश की व्याख्या यह मानने के लिए भी की गई थी कि यह अधिनियम गैर-वन भूमि में वृक्षारोपण पर लागू है.
मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि प्रस्तावित संसोधन मौजूदा कानून के नियमों को कारगर बनाने के लिए हैं. यह भी कहा जाता है कि वन भूमि की पहचान व्यक्तिपरक और मनमाना है और अस्पष्टता के चलते लोगों और संगठनों में इसे लेकर नाराजगी है और विरोध भी होता है. मंत्रालय ने यह भी कहा कि रेलवे, सड़क, यातायात और राजमार्ग मंत्रालय ने भी कड़ी आपत्तियां दर्ज कराई हैं. अधिकारियों का कहना है कि अलग-अलग मंत्रालयों को विकास योजनाओं के लिए स्वीकृति हासिल करने में कई साल लग जाते हैं. और परिणामस्वरूप इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में देरी होती है.
क्या हैं प्रस्तावित संशोधन
1. मंत्रालय ने प्रस्ताव दिया है कि 1980 से पहले रेलवे और सड़क मंत्रालय द्वारा अधिग्रहित की गई सभी जमीनों को अधिनियम से छूट दी जाएगी. कहा गया है कि इन जमीनों का अधिग्रहण सेवाओं के विस्तार के लिए किया गया था, लेकिन समय के साथ इन इलाकों में जंगल उग आए और फिर सरकार इन जमीनों का उपयोग नहीं कर पाई. अगर संशोधन लाए जाते हैं तो अलग-अलग मंत्रालयों को योजनाओं के लिए स्वीकृति की जरूरत नहीं पड़ेगी.
2. वहीं उन व्यक्तियों के लिए जिनकी भूमि राज्य-विशिष्ट निजी वन अधिनियम के अंतर्गत आती है या 1996 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में निर्दिष्ट वन के शाब्दिक अर्थ के तहत आती है, उन्हें आवासीय इकाइयों सहित ‘वास्तविक उद्देश्यों के लिए संरचनाओं के निर्माण’ की अनुमति देने का प्रस्ताव है. इसके तहत एकमुश्त छूट के रूप में 250 वर्ग मीटर तक निर्माण किया जा सकेगा.
3. वहीं, अंतरराष्ट्रीय सीमा के करीब रक्षा योजनाओं को भी निर्माण के लिए स्वीकृति की जरूरत नहीं होगी.
4. वन भूमि पर तेल और गैस की खुदाई को भी मंजूरी होगी, लेकिन इसके लिए Extended Reach Drilling तकनीक का ही उपयोग किया जाएगा.
5. मंत्रालय ने लीज के नवीनीकरण के दौरान गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए लेवी को हटाने का प्रस्ताव दिया है. मंत्रालय ने कहा है कि लीज देने और नवीनीकरण के समय डबल लेवी लगाना तर्कसंगत नहीं है.
6. अधिनियम के तहत आने वाली सड़कों के किनारे पट्टीदार वृक्षारोपण से भी छूट दी जाएगी.
क्या हैं चिंताएं
1. सामाजिक कार्यकर्ता और विपक्षी नेताओं का कहना है कि नियमों में छूट से वन भूमि पर कॉरपोरेट का मालिकाना बढ़ेगा और वन की कटाई बढ़ेगी, जिससे उनका दायरा भी घटेगा.
2. पूर्व वन अधिकारियों का कहना है कि निजी जमीन पर वनों की कटाई से जंगल तेजी से घटेंगे. उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में 4 फीसदी जमीन निजी वन के दायरे में आती है.
3. सीपीएम नेता बृंदा करात ने कहा कि आदिवासी और वनवासी समुदाय के लोगों को क्या होगा? – प्रस्तावित संशोधन उनकी चिंताओं को दूर नहीं करता है.
4. पर्यावरण के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि 1980 से पहले की जमीन पर रेलवे और सड़क मंत्रालय को निर्माण की अनुमति देने से पर्यावरण के साथ जंगली जीवों को काफी नुकसान होगा. खासतौर पर हाथी, टाइगर और तेंदुओं के लिए यह नुकसानदायक होगा.
5. पर्यावरणविदों का कहना है कि निजी वनों पर निजी आवासों के लिए एक बार की छूट से वनों का विखंडन होगा, और अरावली की पहाड़ी जैसे खुले क्षेत्रों में रियल एस्टेट का कब्जा हो जाएगा.
क्या पर्यावरणविदों को कुछ सकारात्मक भी मिला?
पर्यावरणविदों ने इस तथ्य का स्वागत किया है कि सरकार ने परामर्श पत्र सार्वजनिक कर दिया है, और संसदीय प्रक्रिया का उपयोग करके संशोधन के माध्यम से परिवर्तन करने का निर्णय लिया गया है.०0० (मीडिया)
सरकार वन जमीनों की परिभाषा बदलने की तैयारी में.सुझाव मांगे:विरोध शुरू वन खत्म हो जाएंगे
* करणीदानसिंह राजपूत *
वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पिछले सप्ताह वन संरक्षण कानून 1980  में संशोधन से जुड़े विवरण का प्रकाशन किया है. इस संशोधन का उद्देश्य वन भूमियों को परिवर्तन करने को आसान बनाना और विकास कार्यों के लिए कुछ श्रेणी को मंत्रालय से मंजूरी लेने की आवश्यकता से छूट देना है. मंत्रालय ने राज्य सरकारों और आम जनता से 15 दिन के भीतर इस विवरण पर विचार मांगा है. विचार (फीडबैक ) की समीक्षा के बाद सरकार संशोधन का नया विवरण तैयार करेगी, जिस पर एक बार फिर से लोगों की राय ली जाएगी और विवरण को विधेयक के रूप में फिर संसद में पेश किया जाएगा.
मौजूदा कानून के मुताबिक वन की परिभाषा के चलते पूरे देश में जमीनें लॉक हो गई हैं. यहां तक कि निजी मालिकाना हक वाले लोग भी अपनी संपत्ति का उपयोग नहीं पा रहे हैं. मौजूदा कानून के मुताबिक किसी भी उद्देश्य के लिए जंगली जमीन का किसी भी तरह परिवर्तन यहां तक कि लीज पर देने के लिए भी केंद्र सरकार की अनुमति लेनी होती है.
कानून में संशोधन क्यों किया जा रहा है?
इससे पहले वर्ष 1996 में टीएन गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत सरकार केस में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वन भूमि की परिभाषा और दायरे का विस्तार किया था, ताकि स्वामित्व, मान्यता और वर्गीकरण के बावजूद किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में वन के रूप में दर्ज सभी क्षेत्रों को शामिल किया जा सके. पहले ये कानून बड़े पैमाने पर वनों और राष्ट्रीय उद्यानों को आरक्षित करने के लिए लागू किया जाता था, लेकिन कोर्ट ने ‘जंगल के शब्दकोशीय अर्थ’ को शामिल करने के लिए वनों की परिभाषा का भी विस्तार किया, जिसका अर्थ है कि एक वनोच्छादित जगह स्वचालित रूप से ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ बन जाएगी, भले ही इसे संरक्षित जगह के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया हो, भले ही स्वामित्व निजी हो या सार्वजनिक. आदेश की व्याख्या यह मानने के लिए भी की गई थी कि यह अधिनियम गैर-वन भूमि में वृक्षारोपण पर लागू है.
मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि प्रस्तावित संसोधन मौजूदा कानून के नियमों को कारगर बनाने के लिए हैं. यह भी कहा जाता है कि वन भूमि की पहचान व्यक्तिपरक और मनमाना है और अस्पष्टता के चलते लोगों और संगठनों में इसे लेकर नाराजगी है और विरोध भी होता है. मंत्रालय ने यह भी कहा कि रेलवे, सड़क, यातायात और राजमार्ग मंत्रालय ने भी कड़ी आपत्तियां दर्ज कराई हैं. अधिकारियों का कहना है कि अलग-अलग मंत्रालयों को विकास योजनाओं के लिए स्वीकृति हासिल करने में कई साल लग जाते हैं. और परिणामस्वरूप इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में देरी होती है.
क्या हैं प्रस्तावित संशोधन
1. मंत्रालय ने प्रस्ताव दिया है कि 1980 से पहले रेलवे और सड़क मंत्रालय द्वारा अधिग्रहित की गई सभी जमीनों को अधिनियम से छूट दी जाएगी. कहा गया है कि इन जमीनों का अधिग्रहण सेवाओं के विस्तार के लिए किया गया था, लेकिन समय के साथ इन इलाकों में जंगल उग आए और फिर सरकार इन जमीनों का उपयोग नहीं कर पाई. अगर संशोधन लाए जाते हैं तो अलग-अलग मंत्रालयों को योजनाओं के लिए स्वीकृति की जरूरत नहीं पड़ेगी.
2. वहीं उन व्यक्तियों के लिए जिनकी भूमि राज्य-विशिष्ट निजी वन अधिनियम के अंतर्गत आती है या 1996 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में निर्दिष्ट वन के शाब्दिक अर्थ के तहत आती है, उन्हें आवासीय इकाइयों सहित ‘वास्तविक उद्देश्यों के लिए संरचनाओं के निर्माण’ की अनुमति देने का प्रस्ताव है. इसके तहत एकमुश्त छूट के रूप में 250 वर्ग मीटर तक निर्माण किया जा सकेगा.
3. वहीं, अंतरराष्ट्रीय सीमा के करीब रक्षा योजनाओं को भी निर्माण के लिए स्वीकृति की जरूरत नहीं होगी.
4. वन भूमि पर तेल और गैस की खुदाई को भी मंजूरी होगी, लेकिन इसके लिए Extended Reach Drilling तकनीक का ही उपयोग किया जाएगा.
5. मंत्रालय ने लीज के नवीनीकरण के दौरान गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए लेवी को हटाने का प्रस्ताव दिया है. मंत्रालय ने कहा है कि लीज देने और नवीनीकरण के समय डबल लेवी लगाना तर्कसंगत नहीं है.
6. अधिनियम के तहत आने वाली सड़कों के किनारे पट्टीदार वृक्षारोपण से भी छूट दी जाएगी.
क्या हैं चिंताएं
1. सामाजिक कार्यकर्ता और विपक्षी नेताओं का कहना है कि नियमों में छूट से वन भूमि पर कॉरपोरेट का मालिकाना बढ़ेगा और वन की कटाई बढ़ेगी, जिससे उनका दायरा भी घटेगा.
2. पूर्व वन अधिकारियों का कहना है कि निजी जमीन पर वनों की कटाई से जंगल तेजी से घटेंगे. उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में 4 फीसदी जमीन निजी वन के दायरे में आती है.
3. सीपीएम नेता बृंदा करात ने कहा कि आदिवासी और वनवासी समुदाय के लोगों को क्या होगा? – प्रस्तावित संशोधन उनकी चिंताओं को दूर नहीं करता है.
4. पर्यावरण के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि 1980 से पहले की जमीन पर रेलवे और सड़क मंत्रालय को निर्माण की अनुमति देने से पर्यावरण के साथ जंगली जीवों को काफी नुकसान होगा. खासतौर पर हाथी, टाइगर और तेंदुओं के लिए यह नुकसानदायक होगा.
5. पर्यावरणविदों का कहना है कि निजी वनों पर निजी आवासों के लिए एक बार की छूट से वनों का विखंडन होगा, और अरावली की पहाड़ी जैसे खुले क्षेत्रों में रियल एस्टेट का कब्जा हो जाएगा.
क्या पर्यावरणविदों को कुछ सकारात्मक भी मिला?
पर्यावरणविदों ने इस तथ्य का स्वागत किया है कि सरकार ने परामर्श पत्र सार्वजनिक कर दिया है, और संसदीय प्रक्रिया का उपयोग करके संशोधन के माध्यम से परिवर्तन करने का निर्णय लिया गया है.०0० (मीडिया)
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