रविवार, 13 अक्तूबर 2019

चैयरमेन पार्षद कितने कमीशन में करते हैं जनसेवा



** करणीदानसिंह राजपूत **


नगर पालिका चुनाव में खड़े होने की इच्छा रखने वाले अब हाथ जोड़े, नमस्कार करते,घरों और सड़कों पर  चरण स्पर्श करते,नए रिश्ते जोड़ते नजर आने लगे हैं।

अनेक ईच्छुकों  ने अपने व्हाट्सएप ग्रुप बना लिए हैं, और खुद को सबसे अधिक वोट मिलने का दावा भी करने लगे हैं। सर्वे भी बताने लगे हैं।

पहले पार्षद रह चुके हैं वे फिर से अपनी किस्मत आजमाने को दूसरे वार्ड में भटक रहे हैं। कुछ पुराने सभापति रहे भी फिर से चेयरमैन के ख्वाब देखते हुए सोशल साइटों पर अपनी अच्छाइयों का दावा कर रहे हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो अब अचानक धरना प्रदर्शनों आदि में दिखाई देते हुए अपने सजे धजे चित्रों को सोशल साइटों पर प्रचारित प्रसारित कर रहे हैं। 

जो लोग पहले पार्षद रह चुके हैं और चेयरमैन रह चुके हैं उन्हें जनता भली-भांति जान चुकी है परख चुकी है। वे फिर से सेवा का मौका चाहते हैं। उन्हें फिर मौका दिया जाना चाहिए या नहीं?उन्होंने कैसी किस प्रकार की सेवा जनता की और किस प्रकार की सेवा अपने घर में की। यह कोई छिपा हुआ नहीं है। 

हां,जनता में ऐसी भावना पैदा हो चुकी है कि किसी को भी मुंह पर मना नहीं किया जाए। सभी को कहा जाए कि वोट तुम्हारा है। हरेक को शब्दों से सम्मानित किया जाए।

 वे लोग जो फिर से चुनाव लड़ने का सपना ले रहे हैं,उन्हें अपन पिछले े रवैए का भलीभांति भान है लेकिन फिर भी वे सोचते हैं कि जनता अनजान है अपने दुखों को दर्दों को और भ्रष्टाचार ओं को भूल जाती है।

 जो लोग 15 - 20 वर्ष पहले पार्षद बने या चेयरमैन बने उनके तो दिमाग में पक्का है कि उनके किए पुराने कारनामों को नई जेनरेशन में किसी को मालूम ही नहीं है। बहुत बड़ी गलतफहमी ऐसे लोगों ने अपने दिल और दिमाग में पाल रखी है। हो सकता है कि नया मतदाता नहीं जानता हो लेकिन जो लोग अधेड़ हैं वृद्ध हैं बुजुर्ग हैं वे भी तो शहर में रहते हैं। ऐसे लोगों की गलतफहमी चुनावों में मात खाने के बाद ही दूर हो जाएगी।

 राजनैतिक दल विशेषकर बड़े दलों में भारतीय जनता पार्टी और अस्तित्व बचाते हुए कांग्रेस पार्टी यदि अपने पुराने पार्षदों में से और चेयरमैन में से किसी को खड़ा करती है तो वह उसके लिए बहुत बड़ी चोट हो सकती है।

भारतीय जनता पार्टी तो मोदी के नाम पर फिर से नगर पालिका पर कब्जा कर लेगी ऐसा सोचती है। 

 कांग्रेस पार्टी में कोई दिग्गज नजर नहीं आता जो जनता को साथ लेकर चले। जहां जहां कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी विधानसभा लोकसभा में पराजित हुए हैं वहां जनता से जातियों से समाज से उलाहना देते, आक्रोश से सरकारी कर्मचारियों से बदला लेने पर तुले हैं। बेइज्जती करने पर तुले हुए हैं। ऐसी स्थिति में पालिका में  कौन जिता पाएगा?लोग जवाब देने के लिए तैयार हो रहे हैं कि कब वोट हो और कब चोट दी जाए। कांग्रेस पार्टी में एक तरफ तो हारे हुए लोग जनता को चोट दे रहे हैं बेइज्जत कर रहे हैं वही अनेक कांग्रेस नेता अपने घरों में बैठे शहर की हवा पूछने में लगे हैं। 

कांग्रेस पार्टी के अलग-अलग गुट हैं और  अलग अलग  नेता हैं जिनकी  आपस में भी बातचीत नहीं हो पाती। वे किस प्रकार से जनता को भुलावे में रखकर पालिका पर कब्जा कर पाएंगे? 

चाहे पार्षद हो चाहे सभापति कोई सेवा करने की नीयत कितनी रखता है? यह जनता जानती है।

 अभी एक महिला पार्षद राजस्थान में रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों भ्रष्टाचार निरोधक विभाग की टीम द्वारा गिरफ्तार की गई। शिकायतकर्ता ठेकेदार ने कहा कि महिला पार्षद 3% कमीशन मांग रही थी। अब भली-भांति जान लें कि जब पार्षद का कमीशन 3% सामने आया है तब चेयरमैन का कमीशन कितना होता होगा? इससे अधिक चार या पांच प्रतिशत तो होता ही होगा। 

जहां नगर पालिकाओं में 5 साल में 600 -700 करोड़ का बजट होता है। उसमें सं डेढ़ सौ करोड़ रुपए वेतन आदि के निकालने के बाद में जो रकम बचती है,उसका कमीशन आकलन किया जा सकता है कि जनता की सेवा कितने करोड़ की होती है।

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