रविवार, 13 अक्तूबर 2019

मेरे पिता रहे कुंवारे, हास्य कविता-करणीदानसिंह राजपूत।


मेरे पिता रहे कुंवारे,
किसी से प्यार नहीं किया।
मैं भी हूं कुंवारा,
किसी से प्यार नहीं किया।
और यही रीत आगे भी चलाने को,
औलाद से कहूंगा
कुंवारे रहें किसी से प्यार ना करें।
उनकी औलादें भी
आगे से आगे यही रीत चलाएगी।
सभी रहेंगे कुंवारे
कोई प्यार नहीं करेगा।
और कोई चल कर आए
प्यार करने को तो
फिर इन्कार नहीं करेगा,
आने वाले को निराश नहीं करेगा।
यह रीत भी पुरखों से चली
निभानी होगी,
कोई खंडित नहीं करेगा।
**
करणीदानसिंह राजपूत,
स्वतंत्र पत्रकार,
विजयश्री करणी भवन,
सूर्यवंशी स्कूल के पास,
मिनि मार्केट, सूरत गढ।
94143 81356.
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