रविवार, 22 सितंबर 2019

कांग्रेस की खराब हवा में कैसे जिताएंगे चेयरमैन?

* चेयरमैन का चुनाव पार्षदों के द्वारा कराने की अधिसूचना आ सकती है* 


^^ करणीदानसिंह राजपूत ^^


राजस्थान में कांग्रेस की सरकार को आए हुए 10 माह होने आए हैं मगर कहीं भी कांग्रेस सरकार के चलने के और जनता के काम होने के संकेत नहीं मिल रहे। सरकारी कार्यों जनता के साथ हो रहे व्यवहार और बढ़ रही रेप की घटनाओं को लेकर प्रदेश में भारी असंतोष है। वहीं ग्रुपों में बंटी कांग्रेस अपनी स्थिति को सुधारने में बहुत पीछे है। 

राजस्थान में 52 स्थानों पर नगरीय निकाय के चुनाव नवंबर में होने वाले हैं जिनकी मतदाता सूचियां आदि की प्रक्रिया पूरी होने वाली है। वार्डों की संख्या में बढोतरी और पुनर्गठन हो चुके हैं। 

प्रदेश में कांग्रेस की खराब हवा के चलते चेयरमैन पद पर सीधे चुनाव में कांग्रेस की जबरदस्त हार होने की संभावना पर चर्चाएं गरम हैं। 

52 स्थानों पर चुनाव होने वाले हैं और करीब 48 स्थानों पर कांग्रेस का चेयरमैन सीधे चुनाव से आने की संभावना नहीं है। इन चर्चाओं को लेकर यह संभावना मानी जा रही है कि चेयरमैन के सीधे चुनाव की प्रक्रिया बदल दी जाए और पार्षद गण ही चेयरमैन पद के लिए चुनाव करें। 

कांग्रेस को आशा है कि इस बदलाव से नगर निकाय चुनाव में कांग्रेस के बोर्ड बनाए जा सकेंगे। अभी हालात भाजपा के पक्ष में मजबूत हैं। 

कश्मीर में धारा 370 में बदलाव होने के बाद भारतीय जनता पार्टी और मोदी का नाम जनता में और ज्यादा प्रभावी हो गया है। मोदी के नाम पर नगर पालिका चुनाव में भी वोट मांगे जाएंगे इससे कांग्रेस में भय व्याप्त है। यदि 52 निकायों के चुनाव में कांग्रेश को केवल चार पांच स्थानों पर ही जीत मिलने की संभावना हो तब नियम बदलना सरकार के लिए कठिन नहीं आसान कार्य है। 

कांग्रेस का प्रदेश में इक्का-दुक्का बोर्ड ही बन पाये और भारतीय जनता पार्टी का ध्वज लहराए तब सरकार के लिए नियमों का बदलना कोई बड़ी बात नहीं। अधिसूचना के जरिए यह कार्य तुरंत हो सकता है।

 इस नियम के बदलाव की चर्चाओं में पार्षदों का चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों में खुशी की लहर है। पहले यह था कि चैयरमैन सीधे चुनाव से जीत कर आएगा जो पार्षदों की कम सुनेगा और उसे दबाकर नहीं रखा जा सकेगा।

उसे हटाया नहीं जा सकता क्योंकि तीन चौथाई पार्षद अविश्वास के लिए जुटाने बहुत मुश्किल होते हैं। एक बार जो जीत गया वह जीत गया हालांकि पार्षदों के द्वारा चुने गए चेयरमैन को हटाने के लिए भी तीन चौथाई पार्षदों का होना आवश्यक है।

चैयरमैन पद पर  चुनाव के लिए पार्षदों का बहुमत जरूरी होगा इसलिए पार्षदों की पूछ होगी। इसी के लिए पार्षद खुश हो रहे हैं कि 5 साल तक स्थानीय निकाय में उनका वर्चस्व भी

 रहेगा। 

चेयरमैन को पार्षदों की खुशामद भी करते रहना पड़ेगा। अब देखते हैं कि सरकार कि नियम बदलने की यह अधिसूचना कब आती है? 

इसके बावजूद भी यह गारंटी नहीं होगी कि अधिकांश चैयरमैन पदों पर जीत प्राप्त करले। 

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