बुधवार, 14 अगस्त 2019

सूरतगढ़ पालिका में अध्यक्ष का महाघोटाला-जानें क्या हुआ?

* करणीदानसिंह राजपूत *

विधायक रामप्रताप कासनिया द्वारा विधानसभा में सीवरेज सिस्टम और नगर पालिका में हो रहे भ्रष्टाचारों का वक्तव्य देना और उसके बाद नगरपालिका बैठक में इन्हीं भ्रष्टाचारों को दोहराना बहुत गंभीर है। 

इसे भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी कलह और राजनैतिक लड़ाई बता कर छोड़ा नहीं जा सकता।

भारतीय जनता पार्टी के कुछ लोग कह रहे हैं के यह पार्टी के अंदर का गुटों का मामला है और इस पर कार्यवाही बचाव की की जाए क्योंकि कुछ दिनों के भीतर ही फिर से नगर पालिका बोर्ड के अध्यक्ष और पार्षदों के चुनाव में जनता के बीच जाना है।

जनता के बीच जाकर भ्रष्टाचार के मामले में सीवरेज के मामले में भारतीय जनता पार्टी के लोग वोट मांगते वक्त क्या वक्तव्य देंगे? क्या बात करेंगे? किस तरह से वोट मांगेंगे? यह भारतीय जनता पार्टी को सोचना है कि वह नगर पालिका बोर्ड बनने के बाद से अब तक चुप क्यों रही?

भारतीय जनता पार्टी के नगर मंडल का दायित्व था और अभी भी है कि वह जनता के बीच भ्रष्टाचार की उठ रही आवाजों को उच्च स्तरीय संगठन अधिकारियों तक पहुंचाता। विधायक द्वारा आरोप लगाए जाने के बाद तो हर हालत में पार्टी में यह हालात रखने चाहिए थे।

भ्रष्टाचार का मामला आगे भी जारी रहे यह जनता को स्वीकार नहीं है। रामप्रताप कासनिया के आरोपों पर केवल पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी कहकर छोड़ना अब संभव नहीं होगा। चुनाव सिर पर हैं और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर स्थानीय भाजपा को गंभीर निर्णय और अपना स्टैंड जनता के सामने स्पष्ट रूप से रखना ही पड़ेगा।

 रामप्रताप कासनिया ने चुनाव से पहले भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज लगाते हुए चुनाव लड़ा था। रामप्रताप कासनिया का यह स्टैंड बदला नहीं जा सकता। कासनिया का यह स्टैंड आगामी नगर पालिका चुनाव में भी कायम रहेगा। जनता भ्रष्टाचार मुक्त बोर्ड चाहती है।

 ऐसी स्थिति में जो लोग आज सीवरेज सिस्टम और अन्य भ्रष्टाचार के कार्यों में पालिका के सहयोगी बन करके खड़े हैं उनका अस्तित्व नगर पालिका चुनाव में खत्म हो जाएगा। वे नगर पालिका चुनाव में दो कदम भी चल नहीं पाएंगे।

 भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर ही 


अध्यक्ष का चुनाव होगा सीधे जनता करेगी। सभी पार्टियां अपने-अपने अध्यक्ष प्रत्याशी उतारेगी। भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष प्रत्याशी जो भी होगा उसमें वर्तमान विधायक रामप्रताप कासनिया का अन्य लोगों से अधिक प्रभाव रहेगा। एक प्रकार से कहना चाहिए कि विधायक की इच्छा ही सर्वोपरि रहेगी। पिछली बार विधायकों को फ्री हैंड रखा गया था ताकि नगर मंडल आदि में वे अपने हिसाब से संगठन को बना सके जिससे आपस में कोई विरोधाभास ने हो। अब भारतीय जनता पार्टी  प्रदेश में सत्ता नहीं है ऐसी स्थिति में इस निर्णय को नए सिरे से तो लागू नहीं किया जा सकता। वही पुराना सिद्धांत ही लागू होगा कि विधायक फ्री हैंड रहे। ऐसी स्थिति में अध्यक्ष के टिकट तय करने में चाहे अन्य पदाधिकारी पर्यवेक्षक रहेंगे लेकिन विधायक का निर्णय ही सर्वोपरि होगा। 

विधायक रामप्रताप कासनिया ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी आवाज ही नहीं उठाई है बल्कि एक प्रकार का जन जागरण शुरू किया हुआ है। इस जन-जागरण को अब वर्तमान पालिका अध्यक्ष वर्तमान पार्षद आदि अपने लाभ के लिए पलट सकने में कामयाब नहीं हो सकते। 

नगर पालिका की 10 अगस्त की बैठक स्थगित कर दी गई इस बारे में कुछ पार्षदों ने कहा है कि रामप्रताप कासनिया के कहने से उन्होंने विरोध किया। केवल 8 पार्षद इस वक्तव्य में शामिल हुए। नगर पालिका बैठक का सिस्टम है कि पिछली बैठक कार्यवाही का समर्थन और असमर्थ करने का प्रस्ताव प्रथम क्रम पर होता है।  इसी पर आरोप लगा कि जो बोलते हैं वह नहीं लिखा गया और पहले भी लिखा नहीं गया। बोर्ड की बैठक की कार्यवाही मनमर्जी से लिखी गई और पहले भी लिखी जाती रही। 

जो पार्षद अब कहते हैं कि शहर का विकास चाहते हैं उनसे सीधा सवाल है कि पिछले 4 साल बीत जाने के बाद भी उन्होंने शहर के विकास की बात के नाम पर केवल भ्रष्ट ठेकेदारी के मामले में अपने बात को साझेदारी के रूप में रखा। नगर पालिका के पार्षद बताएं कि आज वे नगर पालिका अध्यक्ष काजल छाबड़ा को ईमानदार होने की बताते हैं। इन्हीं पार्षदों में से अधिकांश ने लगातार मांग रखी थी कि नगरपालिका बोर्ड में नियमानुसार निर्माण समिति वित्त समिति का और अन्य समितियों का गठन कराया जाए लेकिन बार-बार की मांग पर काजल छाबड़ा ने समितियां गठित नहीं की और अपने मनमर्जी चलाई। पार्षद ही बताएं कि अध्यक्ष ईमानदार हो तो सबसे पहले वह नियमानुसार इन कमेटियों को गठित करवाया जाता ताकि नगर पालिका में ईमानदारी के साथ हर कार्य हो। 

 पार्षद विकास का कार्य कहते हैं पूरे 5 साल में इन कमेटियों का गठन नहीं हुआ। कमेटियों में पार्षद सदस्य होते हैं और उन कमेटियों की राय बोर्ड के अंदर रखी और मानी जाती है। निर्माण समिति और वित्त समितियां होती तो सिवरेज निर्माण व अन्य निर्माण में उनकी राय प्रमुख होती। पूरे 5 साल मनमर्जी चलाई जाती रही। अध्यक्ष की मनमर्जी को विकास नहीं माना जा सकता। जनता भ्रष्टाचार मुक्त नगरपालिका बोर्ड चाहती है।

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