रविवार, 28 जुलाई 2019

अतिक्रमण के आरोप और हटाने के नारे लगाते रहें - टारगेट नहीं बताएंगे

^^ करणीदानसिंह राजपूत ^^


सूरतगढ़ में अतिक्रमण और सफाई के मुद्दे पर जोरदार हल्ला मचा है। अतिक्रमण हटाने की मांग करने वालों में जनता के साथ विधायक और प्रशासन भी शामिल हैं। 

विधायक रामप्रताप कासनिया ने विधानसभा में सूरतगढ़ नगर पालिका क्षेत्र में अतिक्रमण होने और उसमें नगर पालिका प्रशासन के शामिल होने पर आरोपों की झड़ी लगाई। जिला प्रशासन की 27 जुलाई 2019 को हुई नगर पालिका अधिकारियों की बैठक में जिला कलेक्टर शिवप्रसाद नकाते ने स्पष्ट रूप से कहा कि अतिक्रमण हटाए जाएं और सफाई की जाय और उसके बाद फोटोग्राफ्स भिजवाएं। 

 सूरतगढ़ की जनता में से कुछ उंगलियों पर गिने जाने वाले लोग सोशल साईटों पर अतिक्रमण होने और नगर पालिका अधिकारियों के शामिल होने का आरोप लगाते रहे हैं। सोशल इंटरनेट साईटों पर यह भी आरोप रहा है कि नगर पालिका अतिक्रमण हटाने में भेदभाव अपना रही है। कुछ लोगों के अतिक्रमण हटाते हैं और जिन लोगों के अतिक्रमण को कायम रखना है वहां पर कार्यवाही नहीं होती। नगर पालिका की नीतियों पर विधायक कासनिया ने भी विधानसभा में यह आरोप लगाए जो सोशल नेटवर्क साईटों पर लगते रहे है। विधायक ने और जनता ने आरोप लगाए हैं, उनमें अनेक खामियां रही हैं। ये खामियां क्यों रही है? विधायक और अन्य लोग भलीभांति जानते ही होंगे। लोगों की बात में दम है कि विधायक चाहे तो क्या नहीं हो सकता।

तीरंदाजी और निशानेबाजी  सिखलाई जाती है तो एक टारगेट दिया जाता है जिस पर तीर या गोली चलाई जाती है। तीरंदाजी और निशानेबाजी बिना टारगेट को फिक्स किए कभी भी सिखलाई नहीं जा सकती। बिना टारगेट के शुरुआत ही नहीं होती। यही स्थिति अतिक्रमण हटाने के लिए आधार होती है। 

लोग अतिक्रमण हटाओ का नारा और हल्ला चाहे जहां मचायें। नारा आरोप बैठकों में लगाएं,अखबारों में लगाएं चाहे सोशल नेटवर्क पर लगाएं अतिक्रमण कभी भी हटाया नहीं जा सकता। उसके लिए अतिक्रमण का टारगेट तो बताना ही पड़ेगा की कौन सा अतिक्रमण है जिसे हटाया जाना है। आज तक हल्ला ही होता रहा है लेकिन किसी ने भी उस अतिक्रमण को चिन्हित करके शिकायत नहीं की कि यह अतिक्रमण है और इसे हटाया जाए। नगर पालिका में ऐसी शिकायतें नहीं हैं। विधायक ने भी शायद ऐसी शिकायत नहीं की है। अतिक्रमणओं  को बताया नहीं है कि फला फला अतिक्रमण हटाए जाएं।  जब ऐसी स्थिति है तब नगर पालिका के अधिकारी अतिक्रमण किसका हटाएं  और किसका नहीं हटाएं। अधिशासी अधिकारी मनमर्जी करते हैं। जब मनमर्जी की जाती है तो मनमर्जी करने वाले अधिकारी के विरुद्ध भी कोई लिखित में शिकायत नहीं होती। नगर पालिका प्रशासन शब्द का इस्तेमाल होता है। 

नेता और जनता दिल से अतिक्रमण हटाना चाहती है शक्ति से अतिक्रमण हटाना चाहती है तो स्थान और अतिक्रमण चिन्हित करके बताने में भय क्यों महसूस होता है। जब अतिक्रमण हटवाना ही है तो साफ-साफ लिख कर के ही शिकायत की जाए। यहां हल्ला मचाने वाले अधिकांश की स्थिति यह है कि वह केवल सोशल साइटों पर लिखने के अलावा लिखित में शिकायत नहीं करना चाहते।  सीधे रूप से कहा जाए कि उनका यहां पर मानस होता है कि अतिक्रमणकारी से सीधी लड़ाई करके पंगा क्यों लिया जाए? कुछ समय पहले वाट्सअप के एक ग्रुप पर नई बनाई गई चारदिवारी की फोटो लगातार कुछ दिन दी गई और लिखा गया की पालिका के अधिकारी का कब्जा है। अधिकारी का नाम नहीं दिया। वह चारदीवारी किस वार्ड में कहां बनी है का भी उल्लेख नहीं किया गया।

यही कारण है कि जब अतिक्रमण हो जाता है तब आने वाले कुछ वर्षों में सरकार की ओर से पट्टे बनाने की कार्यवाही शुरू हो जाती है। 

जो लोग अतिक्रमण हटाने का नारा लगाते हैं आरोप लगाते हैं वे भी सभी के लिए समान कार्यवाही नहीं चाहते।  कुछ के लिए चाहते हैं कुछ के लिए नहीं चाहते। इसलिए टारगेट सहित शिकायत करने से दूर रहते हैं।

राजस्थान उच्च न्यायालय ने अतिक्रमण हटाने के लिए सरकार को नगर पालिकाओं को निर्देशित किया था लेकिन नगर पालिका के अधिकारी अतिक्रमण हटाने में पीछे रहे।  किसी ने टारगेट सहित शिकायत नहीं की कि फलां अतिक्रमण नहीं हटाया गया। अधिशासी अधिकारी आदि ने इसलिए कार्य नहीं किया कि उन्हें नगर पालिकाओं में कुछ महीने रहना है और बाद में किसी और में। वे कार्रवाई में हाथ क्यों डालें? 

बड़े पावर वाले नेता लोग भी जब अतिक्रमण का स्थल बताने में अतिक्रमण कारी का नाम बताने में पीछे रहें तब आम जनता में से कोई भीम बन कर सामने कैसे आए? खुद शिकायत नहीं करना चाहे तब नेता के पास एक भी चेला कार्यकर्ता नहीं होता है जिसके मार्फत ही शिकायत करवा दे। 

जो अतिक्रमण हटवाने की चाह रखते हैं  आरोप लगाते हैं तब उन्हें खुद के घर और कोठी की गली से ही सड़क के अतिक्रमण की नाप जोख करके कार्यवाही शुरू करवानी चाहिए लेकिन इतनी हिम्मत जनता में कैसे दिखाएं।

जब राजनेताओं में भी इतनी हिम्मत नहीं होती। राजनेताओं के सामने गलियां रूकती है। वे खुद देखते हैं लेकिन फिर भी चुप रहते हैं। गलियों पर कब्जा करने वाले उनके खास मित्रों में जानकारों में परिचितों में रिश्तेदारों में और साथी नेता हों तो दूसरों पर चाहे जितने आरोप लगाते रहें,अतिक्रमण हटाए नहीं जा सकते। इसलिए केवल जोर शोर से नारा लगाया जाता रहना चाहिए अतिक्रमण हटाओ अतिक्रमण हटाओ।

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