रविवार, 14 जुलाई 2019

पहली बार पहुंचेगा भारत का चंद्रयान-2 जहां कोई देश नहीं पहुंचा-अद्भुत जानकारी

  

श्रीहरिकोटाः भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चंद्रमा पर भारत के दूसरे मिशन चंद्रयान-2 के प्रक्षेपण का रिहर्सल शुक्रवार को पूरा कर लिया। चंद्रयान का प्रक्षेपण 22 जुलाई को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया जायेगा। इसके छह सितंबर को चंद्रमा पर पहुंचने की उम्मीद है। इस मिशन के लिए जीएसएलवी-एमके3 एम1 प्रक्षेपणयान का इस्तेमाल किया जायेगा। इस जगह पर इससे पहले किसी भी देश का कोई यान नहीं पहुंचा है। विक्रम लैंडर के अलग हो जाने के बाद, यह एक ऐसे क्षेत्र की ओर बढ़ेगा जिसके बारे में अब तक बहुत कम खोजबीन हुई है।


इसरो ने बताया कि मिशन के लिए रिहर्सल आज पूरा हो गया है। इस मिशन के मुख्य उद्देश्यों में चंद्रमा पर पानी की मात्रा का अनुमान लगाना, उसके जमीन, उसमें मौजूद खनिजों एवं रसायनों तथा उनके वितरण का अध्ययन करना और चंद्रमा के बाहरी वातावरण की ताप-भौतिकी गुणों का विश्लेषण है। उल्लेखनीय है चंद्रमा पर भारत के पहले मिशन चंद्रयान-1 ने वहाँ पानी की मौजूदगी की पुष्टि की थी। इस मिशन में चंद्रयान के साथ कुल 13 स्वदेशी पे-लोड यान वैज्ञानिक उपकरण भेजे जा रहे हैं।


इनमें तरह-तरह के कैमरा, स्पेक्ट्रोमीटर, रडार, प्रोब और सिस्मोमीटर शामिल हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का एक पैसिव पेलोड भी इस मिशन का हिस्सा है जिसका उद्देश्य पृथ्वी और चंद्रमा की दूरी सटीक दूरी पता लगाना है। यह मिशन इस मायने में खास है कि चंद्रयान चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरेगा और सॉफ्ट लैंडिंग करेगा। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अब तक दुनिया का कोई मिशन नहीं उतरा है। चंद्रयान के तीन हिस्से हैं।



ऑर्बिटर चंद्रमा की सतह से 100 किलोमीटर की ऊंचाई वाली कक्षा में चक्कर लगायेगा। लैंडर ऑर्बिटर से अलग हो चंद्रमा की सतह पर उतरेगा। इसे विक्रम नाम दिया गया है। यह दो मिनट प्रति सेकेंड की गति से चंद्रमा की जमीन पर उतरेगा। प्रज्ञान नाम का रोवर लैंडर से अलग होकर 50 मीटर की दूरी तक चंद्रमा की सतह पर घूमकर तस्वीरें लेगा।

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चन्द्र यान -2: 1000 करोड़ लागत और माइनस 130 डिग्री ठंड नहीं, 

यह है मिशन की सबसे बड़ी चुनौती

चंद्रयान-2 के लैंडर और रोवर में ऊर्जा के लिए सोलर पैनल लगाए गए हैं। मिशन के दौरान चंद्रयान-2 के उपकरण 350 घंटे तक चंद्रमा के बेहद ठंडे तापमान में रहेंगे।

नई दिल्ली |  14 जुलाई 2019.

इसरो की तरफ से चंद्रयान-2 के लॉन्चिंग की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। इन सब के बीच चंद्रमा पर दिन और रात गुजारना चंद्रयान-2 की सफलता की सबसे बड़ी चुनौती है।

यदि सब कुछ ठीक रहा तो चंद्रयान-2 का लैंडर चंद्रमा के साउथ पोल एटकिन बेसिन पर उतरेगा। इसके बाद लैंडर विक्रम रोवर प्रज्ञान को आगे बढ़ने की राह प्रशस्त करेगा। रोवर बहुत धीरे-धीरे चंद्रमा की सतह पर गति करेगा। यह गति 1 सेमी/सेकंड होगी। लैंडर और रोवर दोनों पर एनर्जी जेनरेट करने के लिए सोलर पैनल लगे हैं।

रोवर को चंद्रमा पर 14 दिन रह कर प्रयोग करना है। इसकी इलेक्ट्रिक पावर जेनरेट करने की क्षमता 50 वॉट है। मिशन की अवधि, सभी जटिल पैंतरेबाजी और 1000 करोड़ रुपये की लागत इन सब के पीछे कारण है। चंद्रमा अपने अक्ष पर एक घूर्णन पूरा करने में 29 दिन का समय लेता है। इसका मतलब है कि 350 घंटे रात रहेगी।


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चंद्रमा की बहुत कम तापमान होता है। ऐसे में साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट और इलेक्ट्रोनिक का प्रयोग नहीं हो सकेगा। बैटरी ना तो चार्ज होगी और ना ही डिसचार्ज। ऐसे में कम्यूनिकेशन सिस्टम भी फेल रहेगा। चंद्रमा पर तापमान बहुत अधिक होता और बहुत कम भी हो जाता है। चंद्रमा में दिन में जहां तापमान 120 डिग्री सेल्सियस पहुंच जाता है वहीं रात में तापमान -130 डिग्री सेल्सियस रहता है।

नासा के थर्मल इंजीनियर रोन क्रील का कहना है कि यहा तापमान बिल्कुल झरने के समान गिर जाता है। जहां लैंडर विक्रम लैंड करेगा वहां रात में तापमान -180 डिग्री के आसपास होगा। इसरो के प्लेनेटरी साइंस से जुड़े नरेंद्र भंडारी का कहना है कि अधिकतर इलेक्ट्रोनिक सेंसर और कैमरा इतने अधिक तापमान में काम करना बंद कर देते हैं।

भंडारी चंद्रयान-1 मिशन के प्रमुख सदस्य रह चुके हैं। अब तक केवल तीन मिशन ही लूनर नाइट में बच सके हैं। इनमें 1969-77 के दौरान अपोलो अल्सेप, यूएसएसआर का लूंकोहोड 1 और 2 और चाइना का साल 2013 और 2019 का यूतू रोवर।

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पहले 17 दिन पृथ्वी की कक्षा में ही रहेगा चंद्रयान

श्रीहरिकोटा 14 जुलाई (वार्ता) चंद्रमा पर भारत के दूसरे मिशन चंद्रयान-2 की सोमवार को तड़के 2.51 बजे लॉन्चिंग के बाद पहले 17 दिन यह पृथ्वी की कक्षा में ही रहेगा जहाँ से अगले पाँच दिन में इसे चाँद की कक्षा में स्थानांतरित किया जायेगा।

यह मिशन इसरो के इतिहास के सबसे कठिन मिशनों में से एक है। चंद्रयान का लैंडर छह सितंबर के आसपास चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर मैनजिनस सी और सम्पेलस एन क्रेटरों के बीच उतरेगा। आज तक दुनिया के किसी अन्य देश ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर मिशन नहीं भेजा है। 

इसरो के अनुसार, पहले 17 दिन पृथ्वी की कक्षा में रहने के बाद चंद्रयान को चंद्रमा की कक्षा में स्थानांतरित करने वाले वक्र पथ पर डाला जायेगा। बाइसवें दिन यानी छह अगस्त को यह चंद्रमा की कक्षा में पहुँच जायेगा।

वहाँ अगले 27 दिन तक चंद्रयान चंद्रमा की सतह से 100 किलोमीटर की ऊँचाई वाली कक्षा में चक्कर लगायेगा। पचासवें दिन लैंडर चंद्रमा की सतह पर उतरने के लिए अॉर्बिटर से अलग हो जायेगा जबकि ऑर्बिटर उसी कक्षा में चक्कर लगता रहेगा। इक्यावनवें दिन से लैंडर की गति कम की जायेगी और 54वें दिन वह चंद्रमा पर उतरेगा।

अपने दूसरे मिशन में इसरो ने सॉफ्ट लैंडिंग का लक्ष्य रखा है। लैंडर दो मीटर प्रति सेकेंड की बेहद धीमी गति से आहिस्ते से चंद्रमा पर उतरेगा। 

चंद्रयान के तीन हिस्से ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर हैं जिन्हें एक समेकित मॉड्यूल में रखा गया है। इस मॉड्यूल का वजन 3850 किलोग्राम है। यह 3.1 गुना 3.1 गुना 5.8 मीटर के आकार का है।

ऑर्बिटर का वजन 2379 किलोग्राम है। इसमें 1000 वाट बिजली उत्पन्न करने की क्षमता है। इसमें आठ वैग्यानिक उपकरण यानी पेलोड हैं जो विभिन्न आँकड़े जुटायेंगे। यह एक साल तक चंद्रमा की कक्षा में रहेगा।

लैंडर, जिसे भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के पितामह विक्रम साराभाई के नाम पर विक्रम नाम दिया गया है, चंद्रमा की सतह पर उतरेगा। यह एक चंद्र दिवस यानी करीब 14 दिन तक आँकड़े जुटाने का काम करेगा। इस पर चार पेलोड हैं। इसका वजन 1471 किलोग्राम है और यह 650 वाट बिजली उत्पन्न कर सकता है। 

रोवर को प्रग्यान नाम दिया गया है। इसका वजन 27 किलोग्राम है और इसमें छह पहिये लगे हैं। यह लैंडर से 500 मीटर के दायरे में चक्कर लगा सकता है। इस दौरान इसकी गति एक सेंटीमीटर प्रति सेकेंड होगी। इस पर दो पेलोड हैं।

ऑर्बिटर और लैंडर बेगलुरु के पास ब्यालालू स्थित इंडियन डीप सी नेटव्रक नामक इसरो के नियंत्रण कक्ष से सीधे संपर्क में रहेंगे। ये आपस में भी संवाद कर सकेंगे। रोवर लैंडर के साथ संवाद करेगा।

इस मिशन के मुख्य उद्देश्यों में चंद्रमा पर पानी की मात्रा का अनुमान लगाना, उसके जमीन, उसमें मौजूद खनिजों एवं रसायनों तथा उनके वितरण का अध्ययन करना, उसकी भूकंपीय गतिविधियों का अध्ययन, और चंद्रमा के बाहरी वातावरण की ताप-भौतिकी गुणों का विश्लेषण है। उल्लेखनीय है चंद्रमा पर भारत के पहले मिशन चंद्रयान-1 ने वहाँ पानी की मौजूदगी की पुष्टि की थी।

इस मिशन में तरह-तरह के कैमरा, स्पेक्ट्रोमीटर, रडार, प्रोब और सिस्मोमीटर शामिल हैं।

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का एक पैसिव पेलोड भी इस मिशन का हिस्सा है जिसका उद्देश्य पृथ्वी और चंद्रमा की  सटीक दूरी पता लगाना ।

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