मंगलवार, 4 जून 2019

किसानों से किसान संगठनों की चेतावनी अपील-पढें और पढाए


* विज्ञान के नाम पर कम्पनियों के दलालों के झांसों में न आएं*


भारत के किसान एवं अन्नदाता मित्रों,


हमें नहीं मालूम कि आप में से कितने लोगों को आनुवंशिक रूप से संशोधित बीज या जीएम बीज के बारे में जानकारी होगी। 

भारत के कपास उगाने वाले क्षेत्रों में बीटी कपास के बीजों से किसान परिचित होंगे परन्तु शायद उन में से भी बहुतों को यह न मालूम हो कि ये बीज बनते कैंसे हैं।

जीएम (जेनेटिकली मोडीफाइड) उत्पाद यानी संशोधित या परिवर्तित जीन वाला उत्पाद वो नया जीव/बीज है जिसमें आमतौर पर विजातीय जीन डाले गए हों। बाह्य जीन घुसाने की प्रक्रिया एक तरह का जुआ है एवं यह सुनिश्चित सटीक प्रक्रिया नहीं है। इसलिए इस का प्रभाव अनिश्चित होता है। दूसरी और क्योंकि यह बदलाव बीज में होता है जिस का अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता है और जो प्रजनन कर सकता है। इसलिए एक बार बडे पैमान पर पर्यावरण में जारी हो जाने के बाद इन बीजों को नष्ट करना नामुमकिन है। इसलिए यक तकनीक बे-लगाम एवं अपरिवर्तनीय है एवं इस के कई दुष्प्रभाव सामने आए हैं।

इस प्रौद्योगिकी की प्रकृति एवं इस में प्रयोग किए गए विशेष तरह के जीन एवं कुछ जीएम फसलों, जिन्हें खरपतवारनाशी सहनशील फसलों कहा जाता है। (जैसे आरआरएफ कपास, बीजी-3 कपास, एचटी कपास जिसे वीडगार्ड के नाम से भी जाना जाता है, इत्यादि) के साथ प्रयोग किए जाने वाले रसायनों के चलते, इन बीजों के पर्यावरण एवं स्वास्थ्य पर कई प्रतिकूल असर पाए गए हैं। ऐसा केवल प्रायोगिक अध्ययनों में ही नहीं हुआ है बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ब्राजील, अर्जेन्टीना और भारत सहित अन्य देशों में वास्तव में ही हुआ है। इस के अलावा अधिकांश जीएम फसलों को बडी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा इस उद्देश्य से बनाया जाता है कि वो एकाधिकार विकसित कर के खतरनाक बीजों एवं विषैले रसायनों, दोनों के प्रयोग से मुनाफा कूट सकें, ताकि किसान की अपने विवेक से चुनने की स्वतन्त्रता खत्म हो जाए, उस के पास इस के अलावा कोई विकल्प न रहें कि वह इन जहरीले एवं महंगे बीजों को खरीदे।

भारत में, बीटी कपास को कपास के किसानों के संकट को दूर करने के लिए रामबाण के रूप में लाया गया था (हालांकि उसे भी कानूनी मंजूरी बडे पैमाने पर अवैध खेती शुरू हो जाने के बाद ही मिली थी)। बीटी कपास के 15 वर्षों के अनुभव ने तत्कालीन विरोध करने वाले किसान संगठनों एवं विशेषज्ञों की दुष्परिणामों की भविष्यवाणी को सही साबित कर दिया है-हालांकि कपास की लगभग पूरी खेती पर बीटी कपास का कब्जा हो गया है पर इस के बावजूद कपास पर इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों की मात्रा भारत में आज 2002, जब देश में बीटी कपास की अनुमति दी गई थी, से ज्यादा है। लक्षित कीट सूंडी ने बीज के अंदर पैदा होने वाले बीटी विष के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लिया है। पैदावार में बढोतरी नहीं हो रही और उत्पादकता बीटी कपास के आने से पहले के स्तर पर या उस से भी कम हैं। वास्तव में भारत में कपास की वृद्धि दर तब सब से ज्यादा थी जब बीटी ज्यादा प्रचलन में नहीं थी। कपास में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग भी काफी बढ गया है जो यह इंगित करता है कि यह प्रौद्योगिकी टिकाऊ नहीं है। भारत में कपास का अधिकांश बीज बाजार बहुराष्ट्रीय कमपनी बायर, जिस ने हाल ही में मोन्सेंटो को खरीद लिया है, के कब्जे में है। यह रेखांकित करना आवश्यक है कि मोन्सेंटों ने इस दावे के बावजूद कि वह किसानों के हित में काम करती है, किसानों पर कई मुकदमें चलायें है और उन्हें जेल भेजा है। इस मोन्सेंटों ने अपने खरपतवारनाशी ग्लाइफोसेट की सुरक्षा के बारे में भी झूठ बोल कर यह छिपाया था कि ग्लाइफोसेट से कैंसर होता है। अब मोन्सेंटों को अमरीका की अदालतों के निर्देश पर अरबों रूपये कैंसर के मरीजों को मुआवजे के तौर पर देना पड रहा है। फिलहाल 14000 ऐसे मामले अमरीका की अदालतों में लंबित हैं।

भारत में कुछ जीएम फसलों की अवैध खेती के हाल के घटनाक्रम को एइस पृष्ठभूमि के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हरियाणा में टिकाऊ, कर्ज एवं जहर मुक्त, स्वावलंबी खेती और खेती पर सिकानों के नियंत्रण के लिए काम कर रहे कुछ व्यक्तियों को पता चला कि फतेहाबाद जिले में एक किसान द्वारा अवैध बीटी बैंगन उगाया जा रहा है। बाद में पता चला कि और भी कई किसानों ने इस अवैध बीटी बैंगन को उगाया है। भारत में बिना अनुमति के जीएम फसलों/बीजों की बिक्री और जीएम फसलों की बुवाई अवैध है। यह कानून किसान विरोधी नहीं है। नागरिकों के स्वास्थय और पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ किसानों के हक में ही इसे अपनाया गया है।

भारत के किसानों को लंबे समय से आत्मनिर्भर या स्वायत्त जैविक कृषि का मार्ग दिखाने के बजाय, बडे निगमों और उनके समर्थकों द्वारा महंगी एवं गैर टिकाऊ खेती के रास्ते पर धकेला जा रहा है। इन बीजों को विकसित करने वाले एवं बेचने वाले ये मुनाफाखोर ही इन खतरनाक बीजों की अवैध  खेती के असली गुनहगार हैं परन्तु दिखाया ऐसे जा रहा है कि अपराधी किसान हैं। हम सदा किसानों के पक्ष में एवं उन के साथ खडें हैं और खडे रहेंगे। हम भारत के किसानों से अपील करते हैं कि वे ऐसे उद्योगें द्वारा वित्तपोषित ’’किसान यूनियनों’’ के जाल में न फंसे, जो किसानों को गुमराह कर के गैर-टिकाऊ खेती की ओर खींचने का कोशिश कर रहे हैं।

हम आपसे यह सुनिश्चित करने का भी आग्रह करते हैं कि आपका बीज/पौध जीएम नहीं है क्योंकि भारत में बीटी कपास की कुछ किस्मों के अलावा किसी भी अन्य फसल के लिए किसी भी जीएम बीज को बोने की अनुमति नहीं है। इसलिए अगर आप ने अवैध जीएम फसल बोई और कोई समस्या खडी हो गई, तो आप कुछ नहीं कर पाएंगे, कहीं शिकायत नहीं कर पाएंगे। हम यह भी चाहते है कि आप बीज हमेशा पक्के बिल, जिसमें किस्म का नाम स्पष्ट लिखा हो, के साथ ही खरीदें क्योंकि सभी गैर-कानूनी बीज बिना पक्के बिल के ही बेचे जाते हैं। कृप्या सामाजिक हित में काम करने वाले समूहों, स्वैच्छिक संस्थाओं, व्यक्तियों या किसान नेताओं से संपर्क करके उपयुक्त विकल्पों की जानकारी प्राप्त करें एवं सरकारों से भी ऐसी जानकारी की मांग करें। जहां तक बैंगन की बात है, कृप्या कृषि विश्वविद्यालयों एवं जैविक किसानों द्वारा कीट नियंत्रण के लिए विकसित किए गए गैर-रासायनिक एवं गैर-जीएम तरीकों का प्रयोग करें। कृप्या एचटी/आरआरएफ कपास से भी दूर रहें। हमें पता चला है कि दो अन्य जीएम फसलों, एचटी सोयाबीन एवं वाइरस प्रतिरोधी जीएम पपीते, की भी भरत में अवैध खेती हो रही है। इसलिए सोयाबीन एवं पपीते की खेती करने वाले किसान विशेष सावधानी बरतें।

जहां एक और हम इस बीज को विकसित करने वालों एवं इस बीज की बिक्री में शामिल लोगों, जो इस बीज को बिना अनुमति के पर्यावरण में प्रवेश कराने के लिए जिम्मेदार हैं, के खिलाफ कडी कारवाई की मांग करते हैं। वहां हम यह भी मानते हैं कि जिन किसानों ने अनजानें में इस अवैध बीज को प्रयोग किया है और जिन की खडी फसल को नष्ट किया गया है/किया जाएगा, उन के पूरे नुकसान की भरपाई होनी चाहिए। इस खर्च की इस अवैध कृत्य के लिए जिम्मेदार बीज विकसित करने वाले से वसूल किया जाना चाहिए।

हम किसानों से पुनः अपील करते है कि ऐसे स्वयंभू किसान नेताओं से सावधान रहें, जो ’’तकनीक के चयन की स्वतंत्रता’’ के नाम पर वास्तव में आप के असली हितों के खिलाफ काम कर रहें है। ऐसे स्वयंभू किसान नेताओं से बच कर रहे जो आप को गैर कानूनी रास्ते पर चलने की सलाह देकर कृषि प्रौद्योगिकी के टिकाऊपन और सुरक्षा के मुद्दे को नजरअंदाज कर रहें है। कृप्या जैव-तकनीकी उद्योग के झांसे में भी न आएं, उच्च पैदावार के दावों में फंसकर धोखा मत खा लेना। अपनी खेती, अपनी आजीविका, अपने स्वास्थय और पर्यावरण को बर्बाद न करें, अपनी आने वाली पीढियों के भविष्य को दाव पर न लगाएं और न ही विषाक्त भोजन खाएं या खिलाएं। जीएम बीजों से दूर रहें।

                                                         भवदीय

 चौ0 राकेश टिकैत                                युद्धवीर सिंह 

 (राष्ट्रीय प्रवक्ता भकियू-                          राष्ट्रीय महासचिव भाकियू)


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