रविवार, 23 सितंबर 2018

भादू की टिकट कौन कटवा पाएगा? * भादू की राजनीति को समझ पाना आसान नहीं*


- करणीदानसिंह राजपूत -

23-9-2018. अपडेट 16-10-2018.


राजेंद्र भादू की  राजनीति को भेदने के प्रयास महीनों से हो रहे हैं मगर अभी तक कोई चेहरा ऐसा लग नहीं रहा है जो दम ठोक कर कह सके कि भादू की टिकट कटवाने की क्षमता और पर्याप्त दबाव डालने का जन मानस साथ है।

 भादू की राजनीति अपने आप में अनोखी आश्चर्यजनक और जबरदस्त चक्रव्यूह वाली है। 

भादू परिवार आजादी के बाद से 1952 से राजनीति कर रहा है। इस परिवार की राजनीति इसलिए अनोखी आश्चर्यजनक है कि यह जब जब जहां जहां सत्ता में रहा, किसी अन्य को अपने साथ नहीं रखा जो कोई भेद जान सके। सभी को उतना दूर  रखा जाता रहा है कि वह सत्ता में एक कदम या एक चाल अपनी नहीं चल सके,चाहे परिवार जन हो चाहे निकटतम मित्र परिचित हों।  सत्ता की बागडोर केवल और केवल अपने पास रखता है और शासन प्रशासन को जिसमें पुलिस राजस्व नगर पालिका सार्वजनिक निर्माण विभाग कृषि उपज मंडी समिति आदि  जिन में जनता का संपर्क अधिक है उन पर अपना नियंत्रण रखता है।

इस चक्रव्यू को 50 सालों से कोई भेद नहीं पाया इसका कारण यही है कि भादू ने अपने पास किसी को फटकने नहीं  दिया। जो लोग अपने आप को पास में होने का भ्रम रखते हैं वे भी 100 फिट दूर होते हैं। 


राजेंद्र सिंह भादू को यह राजनैतिक  शिक्षा ताऊ मनफूलसिंह भादू से और पिता बीरबल भादू से मिली। सूरतगढ़ पीलीबंगा क्षेत्र में मनफूलसिंह व बीरबल ऐसे वृक्ष थे जिन्होंने अपनी छाया में किसी को पनपने नहीं दिया जो कभी चुनौती दे दे। 

भादू अपने मतलब की राजनीति करते हैं व शासन और प्रशासन पर अपना ही नियंत्रण रखते हैं।  ठीक यही नीति वर्तमान विधायक राजेंद्र सिंह भादू की की है, शासन और प्रशासन पर सीधा नियंत्रण खुद का है और उसके बाद अगर कोई दखल है तो पुत्र अमित भादू का है। अन्य किसी का कहीं रत्ती भर भी दखल पिता पुत्र को पसंद नहीं।

यही कारण है कि भादू की राजनीति के भीतर जो कुछ होता है वह कोई भी व्यक्ति समझ नहीं पाता।

 कद्दावर समझे जाने वालेे नेता भादू की टिकट कटवाने का दावा करते हैं वे सच्चाई  के नजदीक नहीं है। फिलहाल तो उनकी स्थिति बहुत कमजोर है और सामान्य रूप से जन भाषा में कहा जाए तो उनके पास भादू की टिकट कटवाने जैसा सामान नहीं है। वे खुद चुनाव के समय जनता में अपनी डुगडुगी बजा रहे हैं और भादू का विरोध दबे शब्दों में करते हैं। उनकी हिम्मत भादू का नाम लेकर जनता के बीच भाषण देने की नहीं होती। जनता के बीच वे अपने आप को बचाते हुए यह कहते हैं कि व्यक्तिगत आरोप और लांछन नहीं लगाना चाहते। सच में वेे डरे हुए नेता हैं। राजनीति में साधुत्व नहीं चलता। अगर पास में पावरफुल हथियार हो तो मार सकते हैं। हथियार भी हो और उसमें जनसंपर्क की जनता के कार्य कराने की धार नहीं हो तो वह हथियार काम नहीं कर सकता। आश्चर्य यह मानना चाहिए कि राजेंद्र सिंह भादू सन 2008 में गंगाजल मील के सामने दूसरे क्रम पर रहे और इस शक्ति को भारतीय जनता पार्टी ने मानकर 2013 में भादू पर दांव खेला।रामप्रताप कसनिया और भादू में से एक को टिकट देना था।

भादू को टिकट मिला और चुनाव में जीतने के बाद भादू दूसरे क्रम का नेता नहीं रहा। अपने भादू परिवार की राजनीति के सबक और शिक्षा के हिसाब से जयपुर के राजनैतिक परिदृश्य में छा गया। मुख्यमंत्री,मंत्रियों व भाजपा संगठन में अच्छा तालमेल फिट कर लिया।

भादू काल की राजनीति पर गौर करें। विरोधी आरोप लगाते हैं कि विधायक ने कुटवाया। अगर ऐसा आरोप सच्च है तो भी भादू ने कुटवा कर भी बड़ाई में कहीं नहीं कहा कि उनकी भूमिका है। किसी का काम रुकवाने का आरोप लगा,लेकिन भादू ने कहीं नहीं कहा कि हमने सबक सिखाया है। जो विरोधी आरोप लगाते हैं वे भी नाम ले कर आरोप लगाने की हिम्मत नहीं रखते। समारोहों कार्यक्रमों में जनता से सीधी बातचीत में राजेन्द्र भादू एक ही बात कहते हैं कि आप लोगोंं की बदौलत ही इस विधायक पद पर हूं,आप लोगों ने ही मुझे इस पद पर बिठाया है। इसके अलावा विकास की बातें करते हैं। सरकारी बैठकों मेंं सर्वाधिक उपस्थिति है।

पिछले साढे चार सालों में किसी की हिम्मत नहीं हुई और अब बिना सामान के शानदार शो रूम खोलने का प्रचार दम नहीं रखता। 

जनता के पास ही पावर है जो कुछ निर्णय कर सकती है लेकिन वह भी तब हो सकता है जब सामने कोई पावरफुल दिखाई दे।










कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

यह ब्लॉग खोजें