शनिवार, 30 जून 2018

सूरतगढ सीट बसपा को छोड़ने से कांग्रेस देखने को भी नहीं बचेगी


^वर्तमान में कांग्रेस नेता और संगठन बेहद कमजोर*


* करणीदानसिंह राजपूत *


राजस्थान में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए कांग्रेस पार्टी अन्य दलों से गठबंधन करने के लिए तैयार हो रही है।

वर्तमान में टिकटार्थियों में अधिक पुराने नेताओं में पूर्व विधायक स.हरचंदसिंह सिद्धु( जो करीब 30 साल से भी अधिक अवधि से कांग्रेस में है ) पूर्व विधायक गंगाजल मील,बलराम वर्मा,परमजीतसिंह रंधावा की राजनीति पर गहरा असर पड़ेगा। इनके अलावा युवक कांग्रेस के गगनदीप सिंह विडिंग, राकेश बिश्नोई,अमित कड़वासरा,विमल पटावरी( जैन) भी टिकटार्थियों में हैं,जिनके राजनीतिक कैरियर पर दौड़ शुरू होने से पहले ही रोक लग जाएगी। इनके अलावा भी टिकट की चाहत वाले हैं।

क्या कांग्रेस अपने नेताओं का राजनीतिक जीवन धुमिल करना चाहेगी जिसके बाद खुद काग्रेस भी बाद में शायद खड़ी न हो पाए। कांग्रेस के उच्च पदाधिकारियों को कोई भी समझौते वाला निर्णय लेने से पहले स्थानीय नेताओं और संगठन से राय लेनी ही चाहिए। 

सूरतगढ़ से विगत चुनाव 2013 में कांग्रेस पार्टी तीसरे क्रम पर और बहुजन समाज पार्टी दूसरे क्रम पर रही इसलिए बहुजन समाज पार्टी का समझौते में इस सीट पर प्रबल दावा होने के समाचार छन छन कर कर आ रहे हैं। 


राजस्थान में किसी भी तरह से भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में पुनः आने से रोकने के लिए कांग्रेस पार्टी 2018 के चुनाव को हर हालत में जीतना चाहती है।

 अगर समझौते में सूरतगढ़ सीट बहुजन समाज पार्टी को छोड़ी जाती है तो कांग्रेस के दिग्गज टिकटार्थी नेताओं का और आगे बढ़ रहे युवा कार्यकर्ताओं का हौसला पस्त हो जाएगा।

 हालांकि पिछले चुनाव में कांग्रेस के पतन का मुख्य कारण  दुबारा चुनाव लड़ रहे  विधायक गंगाजल मील का कार्यकाल ही रहा जिसमें जमकर भ्रष्टाचार हुआ था और लोग नाखुश थे।  कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को भी खुश नहीं रखा गया। मील के नजदीकी लोगों ने एक घेरा बनाया और नाराज होते प्रमुख कार्यकर्ताओं को साथ में लाने की कोशिश ही नहीं की गई। मील के नजदीकी समझी जाने वाली प्रेस ने चश्मा चढाया जो मील ने उतारा नहीं। इस तरह से नाराज कांग्रेस के ही लोगों ने सहयोग नहीं किया जिसके कारण कांग्रेस पार्टी सूरतगढ़ सीट पर तीसरे क्रम पर रही। अनेक कांग्रेसियों ने कांग्रेस का साथ नहीं दिया और कांग्रेस की कब्र खोदने में लगे रहे व भारतीय जनता पार्टी को साथ दिया तथा उसके प्रत्याशी राजेंद्र भादू को मित्र बनाया और जिताया। 

अब आगे सूरतगढ सीट बसपा को समझौते में दी जाती है तो क्या संभावनाएं बन सकती हैं।  इसके लिए सन 2013 के चुनाव परिणाम पर नजर डालें।

भाजपा( राजेंद्र भादू) को 66,766 मत मिले थे। 

इंडियन नेशनल कांग्रेस ( गंगाजल मील) 34,173 मत और अमित कड़वासरा को मिले 18275 मतों को जोड़ कर देखा जाए तो 52,448 ही बनते हैं,जो भाजपा से14,318 मत कम ठहरते हैं। दोनों के मत जोड़ कर भी मुकाबले में नहीं पहुंचते। यह आंकड़े कांग्रेस की हालत को बहुत कमजोर साबित करते हैं।2013 के चुनाव के बाद कांग्रेस ने अपनी हालत सुधारने की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। राजनीतिक नजरिये से देखा जाए तो कांग्रेस के टिकट चाहने वालों में से किसी ने भी धरती पर कार्य नहीं किया। पार्टी संगठन ने भी खाली सा छोड़ दिया और आगे अधिक मत मिल जाए ऐसा कार्य नहीं किया। कांग्रेस ने कभी भूले भटके प्रदर्शन किया और ज्ञापन दिया तो संख्या 25-30 से अधिक नहीं हो पाई।नेता अकेला आया या दो तीन कार्यकर्ताओं को साथ लाया। कभी सुधारने की कोशिश ही नहीं की गई। कांग्रेस को रसातल में पहुंचा कर टिकट की मांग करना अचंभित लगता है।


इस कमजोर नाजुक हालत में मील और कड़वासरा को मिले मतों 52,448 में बसपा( डुंगर गेदर) के 39,987 मतों को

और जोड़ा जाए तो 92,435 बनते हैं।

यानि भाजपा को मिले मतों से 25,669 मत अधिक हो जाते हैं और हालात को मजबूत भाजपा को पछाड़ने वाली बनाते हैं। लेकिन इस हालत में बसपा से गठबंधन होता है। भाजपा को हराने के लिए इस हालत में बसपा के लिए सीट छोड़नी पड़ेगी। बसपा मानलो सीट जीत जाती है तब कांग्रेस के ये नेता और कार्यकर्ता आगे क्या करेंगे और इनकी पावर क्या रहेगी? कांग्रेस की राजनीति का खात्मा हो जाएगा। 

इन नेताओं और संगठन की ओर से बसपा से समझौते को रोकने के लिए अभी तक ऊपर कोई आवाज नहीं पहुंचाई गई है।


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