मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

राज्यपाल न चल पाए न अभिभाषण पढ पाए



राज्यपाल अभिभाषण नहीं सरकार का झूठ पढ रहे हैं-हनुमान बेनीवाल

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5 फरवरी को राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार का अंतिम बजट सत्र शुरू हुआ। माना कि लोकतंत्र में वो ही होता है जो चुनी सरकार चाहती है। इसलिए बजट सत्र की शुरुआत में राज्यपाल कल्याण सिंह के अभिभाषण में भी वहीं हुआ जो भाजपा की सरकार ने चाहा। लेकिन यह भी सही है कि इसी लोकतंत्र में राज्यपाल और उनके द्वारा पढ़ा जाने वाला अभिभाषण महत्वपूर्ण होता है। लेकिन 5 फरवरी को विधानसभा परिसर में न तो राज्यपाल सही ढंग से चल पाए और न ही अभिभाषण को पढ़ पाए। स्वास्थ्य ठीक नहीं होनेू की वजह से कल्याण सिंह को चलने में भी परेशानी होती है, यही वजह है कि 5 फरवरी को विधानसभा के परिसर में रेड कारपेट पर चलते समय भी एक अधिकारी ने राज्यपाल का हाथ पकड़ रखा था। बड़ी मुश्किलसे राज्यपाल सदन के अंदर तक पहुंचे। राज्यपाल ने जैसे ही अभिभाषण पढ़ना शुरू किया, वैसे ही निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल ने ऊंची आवाज में बोलना शुरू कर दिया। बेनीवाल ने आरोप लगाया कि राज्यपाल कोई अभिभाषण नहीं बल्कि सरकार के झूठ को पढ़ रहे हैं। इस हंगामे में कांग्रेस के विधायकों ने भी बेनीवाल का साथ दिया। इधर हंगामा और उधर बड़ी मुश्किल से पढ़ा जाने वाला अभिभाषण ऐसी स्थिति को देखते हुए ही संसदीय मंत्री राजेन्द्र सिंह राठौड़ ने प्रस्ताव रखा कि अभिभाषण को पढ़ा हुआ मान लिया जाए। इससे राज्यपाल कल्याण सिंह को भी राहत मिल गई। बाद में कुछ समय के लिए सदन को स्थगित कर दिया गया। जिस तरह से राज्यपाल विधानसभा में आए अभिभाषण पढ़ा और चले गए, इससे लोकतंत्र पर भी सवाल उठता है। क्या हमें ऐसा लोकतंत्र, ऐसे राज्यपाल और ऐसी सरकार चाहिए? जहां तक विपक्ष का सवाल है तो प्रतीत होता कि विपक्ष भी लोकतंत्र में भरोसा नहीं रखता। यदि सदन में राज्यपाल को अभिभाषण ही नहीं पढ़ने दिया जाए तो फिर जनता की आवाज सदन में कैसे उठेगी? यह माना कि सदन में राज्यपाल तो वो ही भाषण पढ़ते हैं जो सरकार तय करती है। लेकिन फिर भी राज्यपाल का भाषण तो सुना ही जाना चाहिए। विपक्ष इस भाषण को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा कर सकता है।

एस.पी.मित्तल) (05-02-18)




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