बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

बड़ा अस्पताल- बड़ी लूट- सच्च मेंं रूह कांप जाती है

अपने परिजनों  को बचाने को अच्छे इलाज के लिए लोग आसपास के बड़े निजी अस्पताल पहुंचते हैं। वहां पर जिस प्रकार से ऊंची कीमत वसूली जाती है उसे जान लेने पर आदमी की रूह कांप जाती है।



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आपके आसपास बड़े निजी अस्पतालों 

में भी होती लूट पर नजर रखें 

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 निजी अस्पताल मरीजों से हजारों गुना ज्यादा मुनाफा कमाते हैं। यह सनसनीखेज खुलासा किया है नैशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) ने। एनपीपीए ने मशहूर निजी अस्पतालों के बिलों का अध्ययन किया जिससे पता चलता है कि ये निजी अस्पताल दवाओं, इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली चीजें और विभिन्न जांच के नाम पर 1737 फीसदी तक का मुनाफा कमाती है। यह तीन चीजें मरीज के बिल का करीब 46 फीसदी होती हैं। एनपीपीए ने 20-2-2018 को अध्ययन जारी किया और बताया कि यह मुनाफा दवा कंपनियों को नहीं बल्कि अस्पताल को होता है।  

एनपीपीए ने यह खुलासा किया है कि ज्यादातर दवाओं और डिस्पोजेबल चीजें अस्पताल के अंदर मौजूद फार्मेसी ( मेडिकल स्टोर ) से खरीदी जाती हैं। मरीज के पास इन्हें कहीं बाहर से खरीदने की छूट नहीं होती है, जहां यह सस्ते में मिल सकती हैं। 

एनपीपीए ने बताया है कि निजी अस्पताल अपनी खुद की फार्मेसी के लिए बहुत ज्यादा मात्रा में दवा खरीदते हैं और इन्हें बेचकर मुनाफा कमाते हैं।


यही नहीं निजी अस्पताल दवा कंपनियों पर दबाव डालकर दवा के डिब्बों में ज्यादा दाम छपवाते हैं जो बाजार मूल्य से कहीं ज्यादा होता है। और ज्यादा दाम छापने की शर्त के साथ वे दवा कंपनियों से बड़ी मात्रा में दवा खरीदते हैं।    


5.77 रुपये की सूई 106 में मिलती है!


एनपीपीए की रिपोर्ट में दिए गए कुछ उदाहरण


एनपीपीए के मुताबिक दवा कंपनियों को सामान्य मुनाफा ही होता है। इस खेल में असल फायदा निजी अस्पतालों का होता है। क्योंकि दवा के डिब्बे पर छपे कई गुना दाम का भुगतान तो मरीज की जेब से होता है और अस्पताल मालामाल होते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि अस्पताल कोई सूई अगर 5.77 रुपये में खरीदती है तो मरीज को वह 106 रुपए में बेचती है। यह सनसनीखेज खुलासे इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि कुछ दिनों पहले भी निजी अस्पतालों पर इलाज के नाम पर बेतहाशा बिल लेने के आरोप लगे थे।  एनपीपीए के अध्ययन में ऐसे कई उदाहरण दिए गए हैं जिससे पता चलता है कि निजी अस्पताल लोगों की जेब पर डाका डालते हैं। और उनपर लगाम लगाने वाली व्यवस्थाएं चुपचाप तमाशा देखती हैं


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गुरुग्राम के फोर्टिस अस्पताल में डेंगू मरीज के बिल में प्रति सिरिंज 1200 रुपये से ज्यादा की कीमतें लिखी मिली थीं। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने भी इसकी पुष्टि की है। इसके बाद सर्जिकल आइटम्स पर एक बार फिर सरकार के नियंत्रण की मांग होने लगी है।  जब दवा बाजार में इसकी पड़ताल की गई तो हकीकत चौकाने वाली थी। जिस सिरिंज की थोक में कीमत करीब 3 रुपये है। वह प्राइवेट अस्पताल पहुंचने तक 50 रुपये की हो जाती है।

दवा विक्रेताओं का कहना है कि सिरिंज के कारोबार में सबसे ज्यादा लाभ निजी अस्पतालों को होता है। निजी अस्पताल कम मूल्य में सिरिंज खरीदते हैं, लेकिन मरीजों से एमआरपी पर पैसा वसूलते हैं। बहरहाल, एनपीपीए ने हाल ही में सिरिंज निर्माता कंपनियों के साथ एक बैठक की है। इसमें कीमतें निर्धारण के लिए सभी कंपनियों ने सहमति दे दी है।

 


इस तरह करते हैं कमाई 


जानकारों के अनुसार, 10 एमएल सिरिंज का अस्पताल 21 रुपये तक मूल्य वसूलता है, जबकि थोक में इसकी कीमत 3.25 रुपये है। पांच एमएल की सिरिंज में करीब 600 प्रतिशत की मार्जिन होता है। थोक में पांच एमएल की सिरिंज 1.51 रुपये में मिलती है, जबकि खुदरा में 10.50 रुपये में बिकती है। अस्पताल में इसके 14 रुपये तक लिए जाते हैं। तीन एमएल की सिरिंज थोक में 1.25 रुपये में मिलती है, लेकिन खुदरा में 7.50 रुपये में बिकती है यानी इस पर 500 प्रतिशत की मार्जिन होती है। दो एमएल की सिरिंज थोक में 1.22 रुपये में मिलती है, जबकि खुदरा में यह 6.50 रुपये में बिकती है। अस्पताल में इसका 9.50 रुपये लिया जाता है।


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 अस्पतालों के साथ नर्सिंग होम में बड़े पैमाने पर हो रहा खेल

फार्मूूले में बदलाव कर महंगे दामों में बेंच रहे हैं दवाएं

आठ सौ से ज्यादा दवाएं हैं मूल्य नियंत्रण के दायरे में 


 दवा कंपनी-डॉक्टर गठजोड़ के चलते मरीजों को सस्ती दवाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। केंद्र सरकार ने लोगों को सस्ते रेट में दवा उपलब्ध कराने को हृदय रोग, कैंसर, मिर्गी समेत कई बीमारियों की दवाओं को ड्रग प्राइज कंट्रोल आर्डर (डीपीसीओ) में शामिल किया है। शुरूआती दौर में इससे दवा कंपनियों की मनमानी पर अंकुश तो लगा, लेकिन बाद में दवा कंपनियों ने फार्मूले में बदलाव कर नया खेल शुरू कर दिया। इस खेल में डॉक्टरों को भी शामिल किया गया, ताकि मनमाने दामों में दवाएं बेंची जा सके। 

सरकार आम लोगों के लिए दवाइयां सस्ती रखने के लिए 800 से ज्यादा दवाइयों को मूल्य नियंत्रण के दायरे में ला चुकी है। ड्रग प्राइस रेगुलेटर एनपीपीए ने दवाइयों के दाम में 4.8 फीसदी से 23.3 फीसदी तक कमी की है। इसके तहत पैरासिटामॉल, सिफोड्रोक्सिन, सेल्ब्युटामॉल व कैफेजोलिन जैसी एंटी बायोटिक्स को भी मूल्य नियंत्रण के दायरे में शामिल किया गया। इससे काफी हद तक दवा कंपनियों के मनमाने दामों पर दवा बेचने का एकाधिकार टूट गया, लेकिन यह सबकुछ ज्यादा दिन तक नहीं चल सका। दवा कंपनियों ने इस बंदिश से आजाद होने का नया तरीका ढूंढ निकाला। कंपनियों ने डीपीसीओ में शामिल दवाओं के साल्ट के साथ दवा बनाने में ऐसे साल्ट इस्तेमाल करने शुरू कर दिए जो डीपीसीओ के दायरे से बाहर हैं। इस तरह उनकी दवा मूल्य नियंत्रण दायरे से बाहर हो गई। बाजार में एक ही फार्मूले की दवाएं अलग-अलग रेट पर मौजूद हैं। खास बात यह है कि अंजान मरीज भी वहीं दवाएं खरीदते हैं जो डॉक्टर लिखते हैं। दवाओं के लिखने के पीछे बड़े पैमाने पर कमिशन का खेल होता है। इस खेल में सरकारी अस्पतालों के अलावा नर्सिंग होम के डॉक्टर बड़े पैमाने पर शामिल हैं। डॉक्टरों द्वारा लिखी गई दवाओं को खरीदने के लिए मरीज के तीमारदार विवश हैं।

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यह हैं दवाएं जिनमें होता है खेल

दवा        सामान्य दाम    फार्मूला बदलने पर बढ़े दाम

पैरासिटामोल    1.00 रुपये         5.00 रुपये

सिफेकज्मि        7.00 रुपये        14.00 रुपये

सेलब्युटामॉल    9.00 रुपये        55.00 रुपये

सेट्राजिन      श  0.75 पैसे        7.00 रुपये

मेट्राजिल        7.00 रुपये        38.00 रुपये

डेक्सा        20.00 रुपये    120 रुपये

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ऐसे होता है खेल

डीपीसीओ में दर्ज दवाओं के दाम सरकार के नियंत्रण में रहते हैं। इन दवाओं के दाम बिना अनुमति नहीं बढ़ाए जा सकते। इन दवाओं को मनमाने दामों पर बेचने के लिए इनके फार्मूले में बदलाव कर नई दवा के तौर पर लांच कर दिया जाता है। सरकार का कॉबिनेशन वाली दवाओं पर नियंत्रण नहीं है। ऐसे में इस खेल को रोकने में सरकार भी नाकाम है। मसलन बुखार के लिए पैरासिटोमॉल की गोली एक रुपये में मिलती है, लेकिन इसमें एसीक्लोफिनेक का साल्ट बढ़ाकर यह गोली पांच रुपये में बेची जा रही है।

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ब्रॉड नेम से ही लिखते हैं दवा

दवा कंपनियों के इस खेल में डॉक्टर भी शामिल हैं। सरकार द्वारा डॉक्टरों को फार्मूले के नाम से दवा लिखने को कहा गया है लेकिन डाक्टर ऐसा न करके ब्रॉडनेम से ही दवा लिखते हैं। दवा विक्रेता मनीष अग्रवाल बताते हैं कि मरीज भी वे ही दवाएं लेने की बात करते हैं जो पर्चे में लिखी है। यदि उन्हें उसी साल्ट की सस्ती दवा देने का प्रयास किया जाता है तो वह लेने से ही इंकार कर देते हैं।

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सरकारी डॉक्टर भी शामिल हैं गठजोड़

सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों को बाहरी दवाएं लिखने पर रोक लगी है। अब जब डाक्टर बाहरी दवाएं नहीं लिख सकते हैं तो उनके पास मेडिकल रिप्रजेंटेटिव का क्या काम। लेकिन जिले के सरकारी अस्पतालों में ओपीडी के दौरान अक्सर एमआर बैठे देखे जा सकते हैं। कमिशन के लिए एमआर डॉक्टरों को पैकेज का तारगेट भी देते हैं। जैसा लक्ष्य, वैसा कमिशन, गिफ्ट पैक तय होता है। इससे साफ जाहिर होता है कि डॉक्टर बाहरी दवाएं लिख रहे हैं।

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एक दिन में होता है साढ़े छह लाख का कारोबार

जिले में करीब 1300 खुदरा मेडिकल स्टोर हैं। इन स्टारों के कारोबार का आकलन करें तो एक दिन में एक मेडिकल स्टोर पर कम से कम 50 लोग दवा लेते आते हैं। औसतन 500 रुपये की दवा खरीदी गई तो जिले के 1300 मेडिकल स्टोर पर एक दिन में दवा का कारोबार 6,50000 रुपये का होगा।

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सरकार नीति करें स्पष्ट

ड्रग प्राइज कंटोल आर्डर में जीवन रक्षक दवाओं को रखा गया है। इन दवाओं में जरूरत के हिसाब साल्ट मिलाकर कॉबिनेशन वाली दवाएं बेचीं जा रही हैं। इनके फंक्शन भी अलग-अलग होते हैं। सरकार को अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए तभी डीपीसीओ का फायदा मिल सकता है।

आलोक बंसल, थोक दवा विक्रेता

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सिंगल ड्रग पालिसी अपनाए सरकार

डीपीसीओ में जो दवाएं शामिल की हैं वह आम लोगों के लिए काफी हितकारी हैं, लेकिन विभिन्न बीमारियों के लिए उनमें कुछ साल्ट मिलाकर नए कांबिनेशन बनाए गए हैं ताकि मरीज को कम दाम में पूरा इलाज मिल सके। कांबिनेशन वाली दवाओं पर सरकार को कोई नियंत्रण नहीं है। ऐसे में सिंगल ड्रग पालिसी होनी चाहिए, तभी डीपीसीओ का लाभ मिल सकेगा।

राघवेंद्र नाथ मिश्रा, कैमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन

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बाहरी दवाएं लिखने व एमआर पर है पाबंदी

मैंने अभी करीब एक माह पहले ही यहां चार्ज लिया हैं। जिला अस्पताल में डॉक्टरों द्वारा बाहरी दवाएं लिखने व मेडिकल रिप्रेंजेटेटिवस के आने पर पूरी तरह से पाबंदी है। 

‌डॉ. रतनपाल सिंह सुमन, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, जिला अस्पताल


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