Wednesday, November 8, 2017

जहरीले स्माग से लंदन में 1952 में मर गये थे हजारों लोग: अब दिल्ली पर खतरा

नई दिल्ली। दिल्ली को गैस चैंबर बताए जाने के बाद भी यह संभव है कि लोग देश की राजधानी और आसपास के इलाके में फैले प्रदूषण की गंभीरता न समझ पा रहे हैं, लेकिन सच यही है कि प्रदूषण सचमुच जानलेवा हो सकता है। 65 साल पहले लंदन में ऐसा हो चुका है। 1952 में दिसंबर के पहले हफ्ते में लंदन में स्मॉग में तब्दील हुए प्रदूषण ने करीब चार हजार लोगों की जान ली थी।

उस दौरान मौसम में तब्दीली के चलते लंदन की हवा में नमी बढ़ गई थी और वह ठहर सी भी गई थी। तब कारखानों के साथ घरों में खाना पकाने और सर्दी से बचने के लिए आग जलाने में कोयले का ही इस्तेमाल होता था। ज्यादा ठंड का मतलब होता था, घरों में कोयले का ज्यादा इस्तेमाल। कारखानों की चिमनियों और घरों से निकलने वाले धुएं ने पांच दिसंबर 1952 को लंदन के वातावरण को विषाक्त करना शुरु कर दिया। चूंकि तब हवाएं तेज नहीं चल रही थीं और तापमान में गिरावट भी जारी थी इसलिए छोटे-बड़े कारखानों और घरों से निकलने वाले धुएं ने लंदन के आसमान का रंग बदलना शुरु कर दिया। पीला और भूरा आसमान जल्द ही एक तरह की कालिमा से लैस होने लगा।


द ग्रेट स्मॉग


पहले पहल लोगों ने काले होते आसमान को मौसम की तब्दीली के रूप में देखा, क्योंकि लंदन के लिए धुंध नई बात नहीं थी, लेकिन जब विजिबिलिटी घटकर चंद मीटर रह गई, अस्थमा के रोगियों का दम घुटने लगा और लोग अस्पताल पहुंचने लगे तो शासन-प्रशासन के साथ आम लोगों को हालात की गंभीरता का अंदाजा हुआ, लेकिन जब तक कुछ किया जाता तब तक हालात बेकाबू हो चुके थे। चूंकि किसी भी यूरोपीय शहर में ऐसा पहली बार हुआ था इसलिए उस वक्त मीडिया भी लंदन के स्मॉग की सही तरह थाह लेने में नाकाम रहा। बाद में यह द ग्रेट स्मॉग नाम से दुनिया भर में जाना गया।


पांच दिन ठहरा रहा सब कुछ


लंदन के आसमान में धुंध में धुएं के कण मिल जाने से हवा तो जहीरीली हुई ही, दृश्यता भी बहुत कम हो गई थी। इसके चलते फ्लाइटों की उड़ान के साथ ही ट्रेनों का भी संचालन रोकना पड़ा। तमाम अन्य सार्वजनिक आयोजनों के साथ खेल प्रतियोगिताएं भी रद करनी पड़ीं। लोगों को घरों में रहने के लिए कहा गया। स्मॉग इतना घना था कि दिन में चोरियां होने लगी थीं और ट्रैफिक पुलिस रोशनी से लैस रहने लगी थी। पांच दिसंबर से नौ दिसंबर के बीच यानी महज पांच दिन में चार हजार से ज्यादा जो लोग स्मॉग की चपेट में आकर मरे उनमें बच्चे और वृद्ध अधिक थे।


गनीमत यह रही कि पांच दिन बाद 9 दिसंबर को तेज हवाओं ने लंदन को स्मॉग से निजात दिलाई। बाद में हुए तमाम अध्ययनों ने यह साबित किया कि स्मॉग से मरने वालों की वास्तविक संख्या आठ हजार से 12 हजार के बीच रही। चूंकि जो तमाम लोग स्मॉग के कारण गंभीर रूप से बीमार हो गए थे उनकी मृत्यु बाद में हुई इसलिए उनकी मौत का कारण स्मॉग के बजाय बीमारी कहा गया। 1952 के लंदन स्मॉग ने पहली बार दुनिया को शहरी इलाके के प्रदूषण की गंभीरता से परिचित कराया। इस जानलेवा स्मॉग का नतीजा यह रहा कि ब्रिटेन ने चंद साल बाद क्लीन एयर एक्ट बनाया और प्रदूषण रोकने के हर संभव किए।

(जागरण 8.11.2017.)

 

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